वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
भवानिन्द्रद्युम्नं राजानं प्रत्यभिजानातीति ||
११ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
भवानिन्द्रद्युम्नं राजानमभिजानातीति ||
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८
युधिष्ठिर उवाच
भवानिह महाराज वासुदेवसमो युधि |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
भवानुपेक्षां कुरुते सुशिष्यत्वाद्धनञ्जय़े ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
भवानुशनसा तुल्यो हितैषी च सदा मम |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
युधिष्ठिर उवाच
भवानेतादृशो लोके वेदवेदाङ्गपारगः |
१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
भवानेव तु नः शक्तो विजय़ाय़ न संशय़ः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
२५
अर्जुन उवाच
भवानेव महर्षीणां वृद्धानां पर्युपासिता |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
भवानेव विशिष्टो हि पतत्रिभ्यो विहङ्गम ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७६
भीष्म उवाच
भवानेवंविधोऽस्माकं संशय़ं छेत्तुमर्हति |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८
वैशम्पाय़न उवाच
भवान्कर्णस्य सारथ्यं करिष्यति न संशय़ः |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
भवान्कर्मपरो यत्र वुद्धिश्रेष्ठश्च भारत |
३९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
भवान्क्षत्ता च राजा च आचार्यो वा पितामहः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१२५
वैशम्पाय़न उवाच
भवान्गर्हय़ते नित्यं किं समीक्ष्य वलावलम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
भवान्तप्रभवप्रज्ञा आसते ये विपर्ययम् |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
भवान्दाता भवान्हर्तेत्यथ तौ मां तदोचतुः ||
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
भवान्देवासुरान्सर्वान्हन्यात्सहचराचरान् |
५४ क
वन पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
भवान्दैवतदैत्यानामृषीणां च महात्मनाम् |
२ क
वन पर्व
अध्याय
२७३
मार्कण्डेय़ उवाच
भवान्द्रक्ष्यति यस्मै च भवानेतत्प्रदास्यति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२९८
धर्म उवाच
भवान्धर्मः पुनश्चैव यथोक्तं ते भविष्यति ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
भवान्धर्मो धर्म इति सततं व्रतकर्शितः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८२
अर्जुन उवाच
भवान्निवेश्यः प्रथमं ततोऽय़ं; भीमो महावाहुरचिन्त्यकर्मा ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
भवान्नेता च गोप्ता च विधत्स्व यदनन्तरम् ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
भवान्पिता भवान्माता भवान्नः परमो गुरुः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
१०३
विदुर उवाच
भवान्पिता भवान्माता भवान्नः परमो गुरुः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
भवान्पिता भवान्माता भवान्भ्राता भवान्गुरुः |
१२ क
सभा पर्व
अध्याय
२३
अर्जुन उवाच
भवान्पितृसखा चैव प्रीय़माणो मय़ापि च |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
भवान्पितृसमो मह्यं धर्मराजसमोऽपि च |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
भवान्पौत्रसमोऽस्माकं यथा दुर्योधनस्तथा |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
भवान्प्रख्याय़ते लोके तस्मात्संशाम्य मा क्रुधः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
विश्वावसुरु उवाच
भवान्प्रवर्हः शास्त्राणां प्रगल्भश्चातिवुद्धिमान् ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०
वासुदेव उवाच
भवान्प्रसादं कुरुतां स्वर्गादेशाय़ मे प्रभो ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
भवान्प्राज्ञतमो नित्यं मम चैव परा गतिः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जय़ः |
८ क
वन पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
भवान्मनुष्यलोकाय़ गमिष्यति न संशय़ः |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
अर्जुन उवाच
भवान्मातृसमोऽस्माकं तथा पितृसमोऽपि च |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
६१
दमय़न्त्यु उवाच
भवान्मृगाणामधिपस्त्वमस्मिन्कानने प्रभुः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
द्रुपद उवाच
भवान्वा विधिवत्पाणिं गृह्णातु दुहितुर्मम |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
भवान्वात्र क्षमं कार्यं पुरा चार्थोऽतिवर्तते ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
भवान्विधत्तां तत्सर्वं क्षिप्रं जेष्यामहे परान् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
ऋषय़ ऊचुः
भवान्विसृजते लोकान्भवान्संहरते पुनः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५
वासुदेव उवाच
भवान्वृद्धतमो राज्ञां वय़सा च श्रुतेन च |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
भवान्व्यवस्यतां क्षिप्रं द्रवते हि वरूथिनी ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
भवान्सञ्चरते लोकान्सदा नानाविधान्वहून् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
अर्जुन उवाच
भवान्समर्थस्तान्सर्वान्निहन्तुं नात्र संशय़ः |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
भवान्सेनापतिर्मह्यं वासुदेवेन संमतः |
३३ क
आदि पर्व
अध्याय
१८७
युधिष्ठिर उवाच
भवान्हि गुरुरस्माकं परमं च पराय़णम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
युधिष्ठिर उवाच
भवान्हि नो गतिः कृष्ण भवान्नाथो भवान्गुरुः ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
भवान्हि नो वधोपाय़ं व्रवीतु स्वय़मात्मनः |
५९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पुत्र उवाच
भवान्हि परिपाल्यो मे सर्वय़त्नैर्द्विजोत्तम |
३१ क