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शान्ति पर्व
अध्याय ३१०
भीष्म उवाच
मार्कण्डेय़ो हि भगवानेतदाख्यातवान्मम |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ३२
युधिष्ठिर उवाच
मार्कण्डेय़ोऽप्रमेय़ात्मा धर्मेण चिरजीविताम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
मार्गं विज्ञाय़ तत्त्वेन प्रलय़े प्रेक्षणं तथा ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
मार्गं संरुध्य संसुप्तं पद्मिन्याः सार्थमुत्तमम् |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०९
सुपर्ण उवाच
मार्गः पश्चिमपूर्वाभ्यां दिग्भ्यां वै मध्यमः स्मृतः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
मार्गज्ञाः कापिलाः साङ्ख्याः शृणु तानरिसूदन ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
मार्गणैरभिविव्याध घनं सूर्य इवांशुभिः ||
५१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
मार्गणैरभिविव्याध घनं सूर्य इवांशुभिः ||
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४९
युधिष्ठिर उवाच
मार्गन्नय़शतैरर्थानमार्गंश्चापरः सुखी ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
मार्गमाण इव प्राणान्सूतपुत्रस्य मारिष ||
२४ ख
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
मार्गमाणाः पदन्यासं तेषु तेषु तथा तथा ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १००
लोमश उवाच
मार्गमाणाः परं यत्नं दानवानां प्रचक्रिरे ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
मार्गमाणास्तु सङ्क्रुद्धास्तव पुत्रं जय़ैषिणः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
मार्गमावारितं दृष्ट्वा राज्ञा वङ्गेन धीमता |
८ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
मार्गमावृत्य तिष्ठन्तं साक्षात्पुरुषविग्रहम् ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
मार्गमावृत्य दैत्यानां गतिं चैषामवारय़म् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १९८
मार्कण्डेय़ उवाच
मार्गमाहिषमांसानि विक्रीणन्तं तपस्विनम् |
१० ख
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
मार्गमिच्छामि सैन्यस्य दत्तं नदनदीपते |
३६ क
वन पर्व
अध्याय १०२
लोमश उवाच
मार्गमिच्छाम्यहं दत्तं भवता पर्वतोत्तम |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
मार्गमित्रिर्हिरण्याक्षो जङ्घारिर्वभ्रुवाहनः |
५६ क
वन पर्व
अध्याय १६०
वैशम्पाय़न उवाच
मार्गमेतदसम्वाधमादित्यः परिवर्तते ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०९
अङ्गिरा उवाच
मार्गशीर्षं तु यो मासमेकभक्तेन सङ्क्षिपेत् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
मार्गशीर्ष्यामतीताय़ां पुष्येण प्रय़युस्ततः ||
२५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
मार्गांश्च चरतश्चित्रान्व्यस्मय़न्त रणे जनाः ||
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२४
भीष्म उवाच
मार्गागतो नृपश्रेष्ठस्तं देशं प्राप्तवान्वसुः |
६ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
मार्गाच्च राक्षसं मूढं कालोपहतचेतसम् |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
मार्गान्वहून्विचरता धावता च ततस्ततः |
७९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३५
वासुदेव उवाच
मार्गान्सर्वान्परिक्रम्य परिश्रान्ताः स्वकर्मभिः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
मार्गार्हस्य च ये मार्गं न यच्छन्त्यल्पवुद्धय़ः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
मार्गार्हाय़ ददन्मार्गं गुरुं गुरुवदर्चय़न् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
मार्गेणान्येन गच्छन्ति त्यक्त्वा सुकृतदुष्कृते ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
मार्गैः स कैशिकाद्यैश्च लाघवेन वलेन च |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
मार्गौ तावप्युभावेतौ संश्रितौ न च संश्रितौ ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
मार्जारचाषमण्डूकान्काकं भासं च मूषकम् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मार्जारमकृतप्रज्ञं वश्यमात्महितं वचः ||
८७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
मार्जारशशवक्त्राश्च दीर्घवक्त्राश्च भारत |
७६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मार्जारस्य च संवादं न्यग्रोधे मूषकस्य च ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
मार्जाराविव भक्षार्थे ततक्षाते मुहुर्मुहुः ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मार्जारो व्रीडितो भूत्वा मूषकं वाक्यमव्रवीत् ||
१७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मार्जारोरसि विस्रव्धः सुष्वाप पितृमातृवत् ||
८१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
महेश्वर उवाच
मार्तण्डजस्य धूमोर्णा ऋद्धिर्वैश्रवणस्य च ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
मार्तण्डश्च यमस्यापि पुत्रो राजन्नजाय़त ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
मार्तण्डस्य मनुर्धीमानजाय़त सुतः प्रभुः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०१
भीष्म उवाच
मार्ताण्डस्यात्मजावेतावष्टमस्य प्रजापतेः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
मार्तिकावतकं भोजं ततः कुञ्जरकेतनम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०४
भीष्म उवाच
मार्दवं दण्ड आलस्यं प्रमादश्च सुरोत्तम |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
मार्दवं सखितां चैव शाल्वादद्य व्यपाहर ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
मार्दवं सर्वभूतानामनसूय़ा क्षमा धृतिः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
मार्दवं सर्वभूतेषु व्यवहारेषु चार्जवम् |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
गौतम्यु उवाच
मार्दवात्क्षम्यतां साधो मुच्यतामेष पन्नगः ||
२० ख