आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
भार्या समभवद्यस्य नर्मदा सरितां वरा |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१४२
भीष्म उवाच
भार्या हि परमो नाथः पुरुषस्येह पठ्यते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१४
भीष्म उवाच
भार्यां गच्छन्व्रह्मचारी ऋतौ भवति व्राह्मणः |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१९९
मार्कण्डेय़ उवाच
भार्यां गच्छन्व्रह्मचारी ऋतौ भवति व्राह्मणः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
भार्यां गच्छन्व्रह्मचारी सदा भवति चैव ह |
११ क
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
भार्यां तथा व्युच्चरतः कौमारीं व्रह्मचारिणीम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
भार्यां पतिः सम्प्रविश्य स यस्माज्जाय़ते पुनः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
भार्यां पुत्रवतीं वृद्धां लालितां पुत्रवत्सलाम् |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
भार्यां प्रस्फुरमाणोष्ठ इदं वचनमव्रवीत् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५३
भीष्म उवाच
भार्यां वामे धुरि तदा चात्मानं दक्षिणे तथा ||
३१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
भार्याः पतिकृताँल्लोकानाप्नुवन्तीति नः श्रुतम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
भार्याचतुर्थे धर्मज्ञे ततोऽहं निःसृतो विलात् ||
८३ ख
वन पर्व
अध्याय
११५
अकृतव्रण उवाच
भार्यापती तमासीनं गुरुं सुरगणार्चितम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
भार्यापती मुनिश्रेष्ठो न च ताववलोकय़त् ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
भार्यापत्यृत्विगाचार्याः शिष्योपाध्याय़ एव च |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
भार्यापत्योर्हि सम्वन्धः स्त्रीपुंसोस्तुल्य एव सः |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
भार्याभिमन्योर्निहतो रणे यो; द्रोणादिभिस्तैर्विरथो रथस्थैः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५५
वैशम्पाय़न उवाच
भार्याभिहर्ता निर्वैरो यश्च राज्यहरो रिपुः |
४६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
भार्याभ्यां सह शत्रुघ्न मा भूत्तेऽत्र विचारणा ||
२७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
भार्याभ्यामभ्यनुज्ञातः प्राय़ाद्भरतसत्तमः ||
३२ ख
सभा पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
भार्यामभ्यहरन्मोहादकामां तामितो गताम् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
भार्यामित्राश्च पुरुषा भविष्यन्ति युगक्षय़े ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
भार्यार्थं तां च जग्राह पार्थः कामवशानुगाम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३९
वाय़ुरु उवाच
भार्यार्थे स च जग्राह विधिवद्भूरिदक्षिण ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
भार्यार्थेऽवरय़त्कन्यामृचीकस्तेन भाषितः ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
भार्यावन्तः क्रिय़ावन्तः सभार्या गृहमेधिनः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
भार्यावन्तः प्रमोदन्ते भार्यावन्तः श्रिय़ान्विताः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
भार्याविय़ोगाद्दुर्वुद्धिरेतत्साह्यं कुरुष्व मे ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६१
कपिल उवाच
भार्याव्रतं ह्यात्मनि धारय़ीत; तथास्योपस्थद्वारगुप्तिर्भवेत ||
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
भार्याश्चतस्रो विप्रस्य द्वय़ोरात्मास्य जाय़ते |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
भार्याश्चोढा मम प्राप्ते यौवने तेन केशव ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
भार्यासंरक्षणं कार्यं कथं स्यादित्यचिन्तय़त् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
देव्यु उवाच
भार्यासहस्राणि च षोडशैव; तासु प्रिय़त्वं च तथाक्षय़त्वम् ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
भार्याय़ां जनितं पुत्रमादर्शे स्वमिवाननम् |
४८ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
भार्याय़ां रक्ष्यमाणाय़ां प्रजा भवति रक्षिता |
६१ क
विराट पर्व
अध्याय
२०
द्रौपद्यु उवाच
भार्याय़ां रक्ष्यमाणाय़ां प्रजा भवति रक्षिता |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
भार्याय़ां व्यभिचारिण्यां निरुद्धाय़ां विशेषतः |
५८ ख
वन पर्व
अध्याय
६६
सुदेव उवाच
भार्येय़ं तस्य कल्याणी पुण्यश्लोकस्य धीमतः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
भार्यैवान्वेति भर्तारं सततं या पतिव्रता ||
४४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७५
भगवानु उवाच
भावं जिज्ञासमानोऽहं प्रणय़ादिदमव्रुवम् |
१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
भावतो गुणतश्चैव योनितश्चैव तत्त्वतः |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३७
भीष्म उवाच
भावतो विनिविष्टानि तत्पात्रं मानमर्हति ||
९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३६
हंस उवाच
भावमिच्छति सर्वस्य नाभावे कुरुते मतिम् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
भावशुद्धिर्दय़ा सत्यं संय़मश्चात्मसम्पदः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३९
श्रीभगवानु उवाच
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६०
सञ्जय़ उवाच
भावस्ते विदितोऽस्माभिर्दुर्वुद्धे कुलपांसन |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
भावाः कालात्मकाः सर्वे प्रवर्तन्ते हि जन्तुषु ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७५
समङ्ग उवाच
भावात्मकं सम्परिवर्तमानं; न मादृशः सञ्ज्वरं जातु कुर्यात् |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३६
सञ्जय़ उवाच
भावान्वहुविधांश्चक्रुस्ताडिताः शरतोमरैः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
भावान्सर्वान्यथावृत्तान्संवसेत यथाक्रमम् |
१६ क