सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
१७ ग
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
२० ग
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
२२ ग
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
२६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
२८ ग
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
७ ग
सभा पर्व
अध्याय
५३
युधिष्ठिर उवाच
एतद्राजन्धनं मह्यं प्रतिपाणस्तु कस्तव |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३३
भीष्म उवाच
एतद्राज्ञः कृत्यतममभिषिक्तस्य भारत |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्राज्ञो दिलीपस्य राजानो नानुचक्रिरे |
७० क
उद्योग पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
एतद्राज्ञो भीष्मपुरोगमस्य; मतं यद्वः शान्तिरिहोत्तमा स्यात् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
एतद्राज्ञो वचः श्रुत्वा विप्रास्ते भरतर्षभ |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३१
व्राह्मण उवाच
एतद्राज्यं नान्यदस्तीति विद्या; द्यस्त्वत्र राजा विजितो ममैकः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
कुशिक उवाच
एतद्राज्यफलं चैव तपश्चैतत्परं मम ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
२५८
मार्कण्डेय़ उवाच
एतद्रामस्य ते जन्म सीताय़ाश्च प्रकीर्तितम् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
एतद्रूपं विभर्त्युग्रं दण्डो नित्यं दुरावरः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्रूपमधर्मस्य भूतेषु च विहिंसताम् ||
३३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
एतद्रूपमुदानस्य परमं व्राह्मणा विदुः ||
१२ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
एतद्रूपमुदानस्य परमं व्राह्मणा विदुः ||
१४ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
एतद्रूपमुदानस्य परमं व्राह्मणा विदुः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
एतद्रूपमुदानस्य परमं व्राह्मणा विदुः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
एतद्रूपमुदानस्य परमं व्राह्मणा विदुः ||
१७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
एतद्रूपमुदानस्य परमं व्राह्मणा विदुः ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
एतद्रूपमुदानस्य परमं व्राह्मणा विदुः ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२४
नारद उवाच
एतद्रूपमुदानस्य हर्षो मिथुनसम्भवः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
व्यास उवाच
एतद्वः कथितं सर्वं यन्मां पृच्छथ पुत्रकाः |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
एतद्वः सर्वमाख्यातं तस्माच्छीघ्रं विधीय़ताम् ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
एतद्वः सर्वमाख्यातं मय़ा विप्रर्षिसत्तमाः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
एतद्वः सर्वमाख्यातं स्वाध्याय़स्य विधिं प्रति |
४९ क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्वचनमाज्ञाय़ भीमसेनोऽत्यमर्षणः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
एतद्वचनमाज्ञाय़ मम सत्यपराक्रम |
१०० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
एतद्वचनमाज्ञाय़ महर्षेर्व्यूह पाण्डव |
६ क
मौसल पर्व
अध्याय
९
व्यास उवाच
एतद्वचनमाज्ञाय़ व्यासस्यामिततेजसः |
३७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
एतद्वचो मद्रपतेर्निशम्य; स्वं चापनीतं मनसा निरीक्ष्य |
१३ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वृहन्नडो उवाच
एतद्वर्षसहस्रं तु व्रह्मा पूर्वमधारय़त् ||
३९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
एतद्वलं पाण्डवानामभवच्छेषमाहवे |
४० क
शल्य पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
एतद्वलमभूच्छेषं धार्तराष्ट्रस्य माधव |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
एतद्वलार्णवं तात वारय़िष्ये महारणे |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१४
भीष्म उवाच
एतद्वाक्यं गुरोः श्रुत्वा शिष्यास्ते हृष्टमानसाः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
एतद्वाक्यं विदुर यत्ते सभाय़ा; मिह प्रोक्तं पाण्डवान्प्राप्य मां च |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११६
सञ्जय़ उवाच
एतद्वाक्यं सौहृदादापगेय़ो; मध्ये राज्ञां भारतं श्रावय़ित्वा |
५१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८४
व्रह्मो उवाच
एतद्वाक्यमुपश्रुत्य ततो देवा महात्मनः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७६
अम्वो उवाच
एतद्विचार्य मनसा भवानेव विनिश्चय़म् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
एतद्विचार्य वहुशो वुद्ध्या वुद्धिमतां वर |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५८
भीष्म उवाच
एतद्विचिन्तितं तावत्पुत्रस्य पितृगौरवम् |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०८
सञ्जय़ उवाच
एतद्विचिन्तय़ानस्य प्रज्ञा सीदति मे भृशम् |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७३
इन्द्र उवाच
एतद्विज्ञातुमिच्छामि का नु तस्य गतिर्भवेत् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२०६
व्याध उवाच
एतद्विज्ञानसामर्थ्यं न वालैः समतां व्रजेत् ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१७
नारद उवाच
एतद्विज्ञानसामर्थ्यं न वालैः समतामिय़ात् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्विज्ञाय़ धर्मज्ञ ततस्त्वं धर्ममाचर ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्विज्ञाय़ धर्मज्ञ युक्तं मय़ि समाचर |
२४ क