शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
भावाभावसमाय़ोगे जाय़ते वर्णसङ्करः ||
१७६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
भावाभावावभिजानन्गरीय़ो; जानामि श्रेय़ो न तु तत्करोमि |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४४
व्यास उवाच
भावाभावौ च कालश्च सर्वभूतेषु पञ्चसु ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
भावाभावौ तदात्वे च अय़ने दक्षिणोत्तरे ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२७
भीष्म उवाच
भावाश्च सर्वे न्यग्भूतास्तत्रैवासन्समागताः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
भावितं कर्मय़ोगेन जाय़ते तत्र तत्र ह |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
भावितैः कारणैः पूर्वमास्तिक्याच्छ्रुतिदर्शनात् |
९१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
भावित्वाच्च महाराज वक्तुं समुपचक्रमे ||
१०५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३११
भीष्म उवाच
भावित्वाच्चैव भावस्य घृताच्या वपुषा हृतः ||
६ ग
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
भावित्वादपि चार्थस्य सत्यवाक्यात्तथा मुनेः ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
भाविनः पश्चिमे काले मनुष्या नात्र संशय़ः ||
५२ ख
सभा पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
भाविन्यर्थे हि सत्स्त्रीणां वैक्लव्यं नोपजाय़ते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
भावे च भावो नित्यः स्यात्कस्तं न प्रतिपूजय़ेत् ||
३७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
भावेन तोषय़च्चैनं गुरुवृत्त्या परन्तपः ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
भावेन निय़तः कुर्वन्व्रह्मचारी प्रशस्यते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
भावेन यान्ति शुद्धा ये ज्ञानतृप्ता निराशिषः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
४०
सूत उवाच
भावेन रामा रमय़ां वभूव वै; विहारकालेष्ववरोधसुन्दरी ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
यतिरु उवाच
भावैरेतैर्विमुक्तस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२१
मार्कण्डेय़ उवाच
भावैस्तु विविधाकारैः पूजय़न्ति महेश्वरम् ||
२४ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
भावो भवामि तस्याहं स च मां नाववुध्यते ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
भावो योऽय़मनुप्राप्तो भवितव्यमिदं मम |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
पुरोहित उवाच
भाव्यं हि कारणेनात्र न ते हास्यमकारणम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
भावय़न्सर्वभूतानि पुनर्गच्छति मन्दरम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
भावय़ोरीप्सितं नित्यं प्रत्यक्षगमनं द्वय़ोः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
भाषतो वहु काकस्य वलिनः पततां वराः |
१९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२१
सञ्जय़ उवाच
भाषन्तो वाग्भिरुग्राभिः सर्वे कर्णवधे वृताः ||
२७ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
भाषमाणमकल्याणं शीघ्रं हन्यान्नराधमम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१५
वैशम्पाय़न उवाच
भाषमाणौ तदा वीरौ किमन्नं क्रिय़तामिति ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
लुव्धक उवाच
भाषसे किं वहु पुनर्वध्यः सन्पन्नगाधम ||
४० ख
विराट पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
भाषां चैषां समास्थाय़ विराटमुपय़ादथ ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य धीमतः ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
भाषितं तत्करिष्यामि तत्रागच्छेः परन्तप ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२९
उमो उवाच
भाषितो मर्त्यलोकस्य मार्गः श्रेय़स्करो महान् ||
३१ ख
सभा पर्व
अध्याय
११
नारद उवाच
भाष्याणि तर्कय़ुक्तानि देहवन्ति विशां पते ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५
व्यास उवाच
भासं च न रविः कुर्यान्मत्सत्यं विचलेद्यदि ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
भासं पश्यसि यद्येनं तथा व्रूहि पुनर्वचः |
६४ क
आदि पर्व
अध्याय
११५
वैशम्पाय़न उवाच
भासतस्तेजसात्यर्थं रूपद्रविणसम्पदा ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२३
द्रोण उवाच
भासमेतं समुद्दिश्य तिष्ठन्तां संहितेषवः ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३७
व्यास उवाच
भासा हंसाः सुपर्णाश्च चक्रवाका वकाः प्लवाः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
भासि विद्युदिवाभ्रेषु शंस मे कासि कस्य वा ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
भासितं ह्लादितं चैव कृष्णेनेदं सदो हि नः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
भासी भासानजनय़द्गृध्रांश्चैव जनाधिप ||
५५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१९
भीष्म उवाच
भास्करं समुदीक्षन्स प्राङ्मुखो वाग्यतोऽगमत् |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
भास्करप्रतिमं दिव्यं नाभ्यां पद्ममजाय़त ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
भास्करस्याभवद्राजन्प्रय़ाते वाहिनीपतौ ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
भास्करस्येव पतनं समुद्रस्येव शोषणम् |
७३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
भास्करस्येव पूर्वाह्णे सहस्रांशोर्विवस्वतः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
भास्कराभप्रभा भीम शारदाभ्रघनोपमाः |
७९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८
संवर्त उवाच
भास्कराय़ सुतीर्थाय़ देवदेवाय़ रंहसे ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
भास्कराय़ सुतीर्थाय़ देवदेवाय़ रंहसे |
२३ क