शान्ति पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
भास्करेण च देवेन पित्रा धर्मभृतां वर ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
भास्करोऽप्यनय़न्नाशं समीपोपगतान्घनान् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
भास्वती मानुषेष्वस्य तनुर्घोराग्निरुच्यते ||
९६ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
भास्वन्तः कामसम्पन्ना लोकास्तेजोमय़ाः शुभाः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
भास्वरं दिव्यमजितं लोकसंनादनं महत् ||
४५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
भास्वरं देहमास्थाय़ विहरन्त्यमरा इव ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
भास्वरं व्योम चक्राते वह्न्युल्काभिरिव प्रभो ||
३४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२५
गान्धार्यु उवाच
भासय़न्ति महीं भासा ज्वलिता इव पावकाः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
भासय़ामास तत्सैन्यं दिवाकर इवोदितः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२८६
कर्ण उवाच
भिक्षते वज्रिणे दद्यामपि जीवितमात्मनः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
भिक्षवे वहुपुत्राय़ श्रोत्रिय़ाय़ाहिताग्नय़े |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
भिक्षस्व तस्य क्षत्रिय़या पिनद्धे कुण्डले |
१०० ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
भिक्षां वलिमदत्त्वा च स्वय़मन्नानि भुञ्जते |
५६ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
भिक्षाभुजां व्राह्मणानां महात्मनां; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
१०८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
भिक्षामन्यां भिक्ष मा ते मनोऽस्तु; श्वभक्षणे श्वा ह्यभक्षो द्विजानाम् ||
६४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
भिक्षामन्यामाहरेति न चैतत्कर्तुमर्हसि |
६८ क
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
भिक्षामादाय़ विप्राय़ निर्जगाम यशस्विनी ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
भिक्षामिच्छाम्यहं भोक्तुं तव गेहे विमत्सर ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
भिक्षामुपागतो भोक्तुं तमहं पर्यतोषय़म् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
भिक्षार्थं पृथिवीपाल चञ्चूर्यन्ते द्विजैर्दिशः ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
भिक्षावलिश्राद्धमिति स्थालीपाकाश्च पर्वसु |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८४
भृगुरु उवाच
भिक्षावलिसंविभागाः प्रवर्तन्ते ||
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
भिक्षावृत्तिः क्रिय़ावांश्च स राजन्केतनक्षमः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३५
व्यास उवाच
भिक्षिते पारदार्यं च न तद्धर्मस्य दूषकम् ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
भिक्षितो व्राह्मणेनेह जन्म वान्नं प्रय़ाचितः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
भिक्षुकांश्चाक्रिकांश्चैव क्षीवोन्मत्तान्कुशीलवान् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२१
भीष्म उवाच
भिक्षुकाः प्राड्विवाकाश्च मौहूर्ता दैवचिन्तकाः |
४५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
भिक्षुकौ विचरिष्येते शोचन्तौ पृथिवीमिमाम् ||
२९ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१२३
वैशम्पाय़न उवाच
भिक्षुकौ विचरिष्येते शोचन्तौ पृथिवीमिमाम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
भिक्षुश्च भिक्षुरूपश्च विषाणी मृदुरव्ययः ||
६९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१५
वैशम्पाय़न उवाच
भिक्षे वार्ष्णेय़पार्थौ वामेकां तृप्तिं प्रय़च्छताम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
विश्वावसुरु उवाच
भिक्षोः पञ्चशिखस्याथ कपिलस्य शुकस्य च |
५८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
भिक्षोः पञ्चशिखस्याहं शिष्यः परमसंमतः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०७
भीष्म उवाच
भिक्षोः पञ्चशिखस्येह संवादं जनकस्य च ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
भिण्डिपालांस्तथा प्रासान्मुद्गरान्मुसलानपि ||
३४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७२
धृतराष्ट्र उवाच
भिण्डिपालेषु शक्तीषु मुसलेषु च सर्वशः ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८७
सञ्जय़ उवाच
भिण्डिपालैस्तथा शूलैर्मुद्गरैः सपरश्वधैः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
भित्त्वा गिरिमश्विनौ गामुदाचरन्तौ; तद्वृष्टमह्ना प्रथिता वलस्य ||
६६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वा चास्य तनुत्राणं शरेणोरस्यताडय़त् ||
२६ ग
विराट पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
भित्त्वा तां महतीं सेनां त्रिगर्तानां नरर्षभ ||
२५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वा तानहनत्पाण्ड्यः शत्रूञ्शक्र इवासुरान् ||
६४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
भित्त्वा तु पृथिवीं यानि जाय़न्ते कालपर्ययात् |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वा देहं गता भूमिं ज्वलन्त इव पन्नगाः ||
२९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वा देहांस्तथा तेषां शरा जग्मुर्महीतलम् ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वा प्रहरतां श्रेष्ठो विदेहासूंश्चकार सः ||
६३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वा भल्लेन राजानं विद्ध्वा षष्ट्यानदन्मुदा ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वा रथं जगामोग्रा धरणीं दारुणस्वना ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वा राजन्महाव्यूहं प्रविवेश सखा तव ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
भित्त्वा व्यूहं प्रविष्टोऽसौ गोमध्यमिव केसरी ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३
सहदेव उवाच
भित्त्वा शरीरं भूतानां न हिंसा प्रतिपत्स्यते ||
६ ख