शान्ति पर्व
अध्याय
३२१
भीष्म उवाच
एका मूर्तिरिय़ं पूर्वं जाता भूय़श्चतुर्विधा ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
एका मूर्तिस्तपश्चर्यां कुरुते मे भुवि स्थिता |
२४ क
वन पर्व
अध्याय
६४
वृहदश्व उवाच
एका वालानभिज्ञा च मार्गाणामतथोचिता |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
एका सृग्वाशते घोरं तत्पराभवलक्षणम् ||
२२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
९६
अरुन्धत्यु उवाच
एका स्वादु समश्नातु या ते हरति पुष्करम् ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
अरुन्धत्यु उवाच
एका स्वादु समश्नातु विसस्तैन्यं करोति या ||
७० ख
वन पर्व
अध्याय
२५०
वैशम्पाय़न उवाच
एका ह्यहं सम्प्रति तेन वाचं; ददानि वै भद्र निवोध चेदम् |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
एकां च दशगुर्दद्याद्दश दद्याच्च गोशती |
१० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
श्वशुर उवाच
एकां दत्त्वा स पारक्यां नरकं समवाप्तवान् ||
७४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
एकां नाभिं सप्तशता अराः श्रिताः; प्रधिष्वन्या विंशतिरर्पिता अराः |
६४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
एकां रात्रिं विहृत्यैवं ते वीरास्ताश्च योषितः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
७८
वृहदश्व उवाच
एकाकिनैव सुमहन्नलेन पृथिवीपते |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
एकाकी प्रय़यौ तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः ||
६१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
एकाकी भरतश्रेष्ठ ततो दुर्योधनो नृपः |
२३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ||
१० ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
एकाकी वहुभिः क्षुद्रैराहवे शुद्धविक्रमः |
५७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
५
अश्वत्थामो उवाच
एकाकी वहुभिस्तत्र परिवार्य महारथैः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
एकाकी विद्यया सार्धं विहरिष्ये द्विजोत्तम |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
एकाकी व्यद्रवत्तत्र वने किम्पुरुषो यथा ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
एकाक्षं त्र्यम्वकं चैव विश्वरूपं शिवं तथा ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
एकाक्षरा सुकुसुमा कृष्णकर्णी च भारत |
२४ क
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
एकाक्षिवाहुचरणे अर्धोदरमुखस्फिजे |
३५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
एकाक्षो जाज्वलन्नास्ते सर्वतोक्षिमय़ोऽपि वा |
८७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
एकाक्षो द्वादशाक्षश्च तथैवैकजटः प्रभुः |
५४ क
आदि पर्व
अध्याय
५९
वैशम्पाय़न उवाच
एकाक्षो मृतपा वीरः प्रलम्वनरकावपि |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२९७
वैशम्पाय़न उवाच
एकाग्रं चिन्तय़िष्यामि पीत्वा वेत्स्यामि वा जलम् ||
४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
एकाग्रता च मनसः प्राणाय़ामस्तथैव च |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१९६
वैशम्पाय़न उवाच
एकाग्रमनसः सर्वे श्रद्दधानाः परस्य च ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
एकाग्रमनसो दान्ता मुनय़ः संय़मे रताः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
एकाग्रमनसो भूत्वा पाण्डवानां वरूथिनीम् |
३ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
एकाग्रमनसो मेऽद्य कुतो निद्रा कुतः सुखम् ||
२९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
एकाग्रमिव चासीद्धि ज्योतिर्भिः पूरितं नभः |
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३२
व्यास उवाच
एकाग्रश्चिन्तय़ेन्नित्यं योगान्नोद्वेजय़ेन्मनः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
एकाग्रां पृथिवीं सर्वां पुरा राजन्करोति सः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
एकाग्राश्चिन्तय़ेय़ुर्मां नैषां विघ्नो भवेदिति ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
एकात्मकमिमं लोके त्यक्त्वा गच्छत माचिरम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३९
व्रह्मो उवाच
एकात्मानं तथात्मानमपरेऽध्यात्मचिन्तकाः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
एकात्मानौ द्विधाभूतौ दृश्येते मानवैर्भुवि ||
४१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४५
व्राह्मण उवाच
एकात्मापि हि धर्मार्थौ कामं च न निषेवते |
२२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
एकादश च यान्याहुरिन्द्रिय़ाणि विशेषतः |
१२ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२२
गान्धार्यु उवाच
एकादश चमूर्जित्वा रक्ष्यमाणं महात्मना |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
एकादश तथा चैनं रुद्राणां वृषवाहनम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
एकादश ददद्भूमिं परित्रातीह मानवः ||
५६ ख
वन पर्व
अध्याय
१३४
वन्द्यु उवाच
एकादश प्राणभृतां विकारा; एकादशोक्ता दिवि देवेषु रुद्राः ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
एकादश समाख्याता अक्षौहिण्यश्च या मम |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
१६
सूत उवाच
एकादश सहस्राणि योजनानां समुच्छ्रितम् |
३ क
शल्य पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
एकादश सहस्राणि रथानां भरतर्षभ |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
एकादश सहस्राणि वर्षाणां ते जनाधिप |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
एकादश सहस्राणि वर्षाणां परमाय़ुषः ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
एकादश सहस्राणि श्लोकानां षट्शतानि च |
१२९ क