शान्ति पर्व
अध्याय
२६९
भीष्म उवाच
मृदुः स्यादप्रतिक्रूरो विस्रव्धः स्यादरोषणः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
मृदुकुञ्चितकेशान्तं वालं वालमृगेक्षणम् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
मृदुत्वं च तनुत्वं च विक्लवत्वं तथैव च |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२९
प्रह्लाद उवाच
मृदुना मार्दवं हन्ति मृदुना हन्ति दारुणम् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
मृदुना सुमृदुं हन्ति मृदुना हन्ति दारुणम् |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय
१३०
दुर्योधन उवाच
मृदुनैवाभ्युपाय़ेन नगरं वारणावतम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
मृदुपूर्वं घातिनस्ते श्रेय़श्चाधिगमिष्यति ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
मृदुपूर्वं च राधेय़ो दृढपूर्वं च पाण्डवः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
मृदुपूर्वं च राधेय़ो भीममाजावय़ोधय़त् |
३८ क
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
मृदुपूर्वं ततश्चैनं त्रिभिर्विव्याध साय़कैः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
मृदुपूर्वं प्रय़त्नेन पाशानभ्यवहारय़ेत् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८९
वैशम्पाय़न उवाच
मृदुपूर्वं शठोदर्कं कर्णमाभाष्य कौरवः ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८१
वैशम्पाय़न उवाच
मृदुपूर्वमय़त्नेन प्रत्ययुध्यंस्तदाहवे ||
८ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
मृदुभावान्सत्यशीलान्सत्यधर्मानुपालकान् |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
मृदुमप्यवमन्यन्ते तस्मादुभय़भाग्भवेत् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
मृदुमप्यवमन्यन्ते तीक्ष्णादुद्विजते जनः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३८
भीष्म उवाच
मृदुरित्यवमन्यन्ते तीक्ष्ण इत्युद्विजन्ति च |
६४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
मृदुर्दान्तो देवपराय़णश्च; सर्वातिथिश्चापि तथा दय़ावान् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
८६
यय़ातिरु उवाच
मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्तः; स्वाध्याय़शीलः सिध्यति व्रह्मचारी ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९
द्रौपद्यु उवाच
मृदुर्भवत्यवज्ञातस्तीक्ष्णादुद्विजते जनः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
मृदुर्भवत्यहङ्कारः प्रसीदत्यार्जवं च यत् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३७
सञ्जय़ उवाच
मृदुर्भूत्वा महाराज दारुणः समपद्यत |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२५४
द्रौपद्यु उवाच
मृदुर्वदान्यो धृतिमान्यशस्वी; जितेन्द्रिय़ो वृद्धसेवी नृवीरः |
१२ क
विराट पर्व
अध्याय
१
अर्जुन उवाच
मृदुर्वदान्यो ह्रीमांश्च धार्मिकः सत्यविक्रमः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
मृदुर्हि राजा सततं लङ्घ्यो भवति सर्वशः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
मृदुश्च सुकुमारश्च धार्मिकश्च प्रिय़श्च मे ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
मृदून्सतः सत्यशीलान्सत्यधर्मानुपालिनः |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
मृद्नतः सर्वसैन्यानि युगान्तमिव कुर्वतः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
मृद्नतस्तान्यनीकानि निघ्नतश्चापि साय़कैः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
मृद्नन्तः स्वान्यनीकानि विनदन्तः शरातुराः ||
७६ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
मृद्नन्तः स्वान्यनीकानि सम्पेतुः सर्वशव्दगाः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४३
सञ्जय़ उवाच
मृद्नन्ति च नरव्याघ्रा भीमसेनव्यपाश्रय़ात् |
६१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
मृद्नन्रथेभ्यो रथिनो गजेभ्यो गजय़ोधिनः |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
मृद्नीय़ात्तद्वदाय़स्तः पार्थोऽमृद्नाच्चमूं तव ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
मृद्यमानानि पाणिभ्यां तेन पुष्पाणि तान्यथ ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
मृद्यमानाश्च दृश्यन्ते पार्थेन नरय़ूथपाः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२०५
गुरुरु उवाच
मृन्मय़ं शरणं यद्वन्मृदैव परिलिप्यते |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
मृन्मय़स्येव भग्नस्य तस्य सन्धिर्न विद्यते ||
६५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
मृन्मय़े भाजने पक्वे यथा वै न्यस्यते द्रवः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९४
वामदेव उवाच
मृषावादं परिहरेत्कुर्यात्प्रिय़मय़ाचितः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
मृषावादं परिहरेत्कुर्यात्प्रिय़मय़ाचितः |
४० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
भीष्म उवाच
मृषावादे भवेद्दोषः सत्ये दोषो न विद्यते ||
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३७
व्रह्मो उवाच
मृषावादो मृषादानं विकल्पः परिभाषणम् |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४४
भीष्म उवाच
मृषोक्ते दण्डमर्हन्ति नेत्याहुरपरे जनाः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२९३
वैशम्पाय़न उवाच
मृष्टकुण्डलय़ुक्तेन वदनेन विराजता ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
मृष्टतप्ताङ्गदधरा विमानैरनुय़ान्ति तम् ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६२
नारद उवाच
मृष्टमृष्टान्नदाय़ी तु स्वर्गे वसति सत्कृतः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
मृष्टहाटकसञ्छन्नो भूषणैरर्कसंनिभैः |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
मृष्यन्ते कुरवश्चेमे मन्ये कालस्य पर्ययम् |
७ क
सभा पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
मृष्यन्ते चार्हणां कृष्णे तद्वत्त्वं क्षन्तुमर्हसि ||
४ ख