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भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
भीष्मो विनिहतो युद्धे देवैरपि दुरुत्सहः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ९९
वैशम्पाय़न उवाच
भीष्मो वुद्धिमदान्मेऽत्र धर्मस्य च विवृद्धय़े ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
धृतराष्ट्र उवाच
भीष्मो हि समरे क्रुद्धो हन्याल्लोकांश्चराचरान् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
भीष्मोऽग्रतः सर्वसैन्यस्य वृद्धः; श्वेतच्छत्रः श्वेतधनुः सशङ्खः |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
भीष्मोऽपि रथिनां श्रेष्ठः प्रतिजग्राह तां चमूम् |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
भीष्मोऽपि समरे जित्वा पाण्डवान्सह सृञ्जय़ैः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
भीष्मोऽपि समरे पार्थं विव्याध त्रिंशता शरैः ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
भीष्मोऽपि समरे राजन्पाण्डवानामनीकिनीम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
भीष्मोऽव्रवीन्महाराज धार्तराष्ट्रमिदं वचः ||
३ ग
वन पर्व
अध्याय ८०
नारद उवाच
भीष्मोऽहमस्मि भद्रं ते दासोऽस्मि तव सुव्रत |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
भीषय़न्तो द्विषत्सैन्यं यमवैश्रवणोपमाः ||
३५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
भीषय़न्नेव दंष्ट्राभिर्दुर्निरीक्ष्यो रविर्यथा ||
६६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
भीषय़न्सर्वसैन्यानि कौरवेय़ाणि दुर्मते |
५३ ख
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
भुक्तं प्रिय़ाण्यवाप्तानि धर्मश्च चरितो मय़ा |
३१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १९
व्राह्मण उवाच
भुक्तं भुक्तं कथमिदमन्नं कोष्ठे विपच्यते |
३७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
नारद उवाच
भुक्तं मे तिष्ठ तावत्त्वमित्युक्त्वा भगवान्ययौ |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २३
कुन्त्यु उवाच
भुक्तं राज्यफलं पुत्रा भर्तुर्मे विपुलं पुरा |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
भुक्तं व्राह्मणकामाय़ कथं तत्सुकृतं भवेत् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
भुक्तपूर्वां स्त्रिय़ं ये च निन्दतामघशंसिनाम् |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय ३८
शिशुपाल उवाच
भुक्तमेतेन वह्वन्नं क्रीडता नगमूर्धनि |
१० क
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
भुक्तवत्यसुरोऽऽह्वानमकरोत्तस्य इल्वलः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ४
वैशम्पाय़न उवाच
भुक्तवत्सु च विप्रेषु भोजय़ित्वानुजानपि |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
भुक्तवन्तं च तं विप्रं प्रीतात्मानं महामनाः |
६ क
सभा पर्व
अध्याय ४८
दुर्योधन उवाच
भुक्ताभुक्तं कृताकृतं सर्वमाकुव्जवामनम् |
४१ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
भुक्ताश्च विविधा भोगास्त्रिवर्गः सेवितो मय़ा |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
भुक्ते परिजने पश्चाद्भोजनं धर्म उच्यते |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
यम उवाच
भुक्तेऽप्यथ प्रदेय़ं ते पानीय़ं वै विशेषतः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८२
वैशम्पाय़न उवाच
भुक्त्वा च सह तैः सर्वैरवसत्तां क्षपां सुखम् ||
२९ ख
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
भुक्त्वा चान्नं ततः सर्वमुच्छिष्टेनात्मनस्ततः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
भुक्त्वा चान्नानि दुष्प्रज्ञ कथमस्माञ्जिहीर्षसि ||
१४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
पितो उवाच
भुक्त्वा तानपि सक्तून्स नैव तुष्टो वभूव ह |
४० क
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
भुक्त्वा तृप्तावुभौ भूमौ सुप्तौ तावन्नमोहितौ ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११७
कर्ण उवाच
भुक्त्वा दुर्योधनैश्वर्यं न मिथ्या कर्तुमुत्सहे ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०४
नारद उवाच
भुक्त्वा प्रीतोऽस्मि विप्रर्षे तमुक्त्वा स मुनिर्गतः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
भुक्त्वा लव्धवलाः सन्तस्तय़ोक्तेन पथा ततः ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
भुक्त्वा सभार्यो रजनीमुवास स महीपतिः ||
६७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
भुक्त्वाश्रमेऽश्वमेधस्य फलं फलवतां शुभा |
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
भुङ्क्त एवार्जुनो भक्तं न चास्यास्याद्व्यमुह्यत |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
भुङ्क्ते धर्मसुतो राजा त्वय़ा गुप्तः कुरूद्वह ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
भुङ्क्ते स तस्य पापस्य चतुर्भागमिति श्रुतिः |
१७ ख
वन पर्व
अध्याय २१९
मार्कण्डेय़ उवाच
भुङ्क्ते सा तत्र तं गर्भं सा तु नागं प्रसूय़ते ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
नकुल उवाच
भुङ्क्तेऽन्यस्मिन्कदाचित्स षष्ठे काले द्विजोत्तमः ||
४ ग
आदि पर्व
अध्याय १२६
दुर्योधन उवाच
भुङ्क्ष्व भोगान्मय़ा सार्धं वन्धूनां प्रिय़कृद्भव |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३८
वासुदेव उवाच
भुङ्क्ष्व राज्यं महावाहो भ्रातृभिः सह पाण्डवैः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११२
भीष्म उवाच
भुङ्क्ष्व शौचं परित्यज्य यद्धि भुक्तं तदस्ति ते ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २२६
वैशम्पाय़न उवाच
भुङ्क्ष्वेमां पृथिवीमेको दिवं शम्वरहा यथा ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
भुजगविषसमप्रभै रणे; पुरुषवरं समवास्तृणोत्तदा ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
भुजगा इव वेगेन वल्मीकं क्रोधमूर्छिताः |
३८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
भुजगा इव सङ्क्रुद्धा लेलिहाना विषोल्वणाः |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
भुजगानां सुपर्णानां रुद्राणां मरुतां तथा |
५२ क