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द्रोण पर्व
अध्याय १३०
धृतराष्ट्र उवाच
मन्येऽहं पाण्डवान्सर्वान्भारद्वाजशरार्दितान् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८५
धृतराष्ट्र उवाच
मन्येऽहं सर्वथा सूत दैवेनोपहता भृशम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
मन्योर्हि विजय़ं कृष्णे प्रशंसन्तीह साधवः |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
मन्वन्तराणि गावश्च चन्द्रमाः सविता हरिः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
श्रीभगवानु उवाच
मन्वन्तरेषु पुत्र त्वमेवं लोकप्रवर्तकः |
४१ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
मन्वादि भारतं केचिदास्तीकादि तथापरे |
५० क
वन पर्व
अध्याय ९०
लोमश उवाच
मन्वादिभिर्महाराज तीर्थय़ात्रा भय़ापहा ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २०५
व्याध उवाच
मन्वानस्तं मृगं चाहं सम्प्राप्तः सहसा मुनिम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
मन्वाना देवराजं मां संविग्ना दानवाभवन् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १६५
अर्जुन उवाच
मन्वाना देवराजं मां समाजग्मुर्विशां पते |
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
मन्वाना निहतं तत्र तव पुत्रं महारथाः |
३७ ख
वन पर्व
अध्याय २२२
वैशम्पाय़न उवाच
मम आचक्ष्व पाञ्चालि यशस्यं भगवेदनम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
मम कन्या महाव्रह्मन्पृथा नाम यशस्विनी |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
मम कन्या सनाम्नी या भैक्षवच्चोद्यता भवेत् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
मम कर्म च देवेन्द्रं मातलिर्विस्तरेण तत् |
६२ क
आदि पर्व
अध्याय ८०
यय़ातिरु उवाच
मम कामः स च कृतः पूरुणा पुत्ररूपिणा ||
२० ग
सभा पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
मम कार्यं जगत्कार्यं तथा कुरु नरोत्तम ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १८
अर्जुन उवाच
मम कोशादिति विभो मा भूद्भीमः सुदुर्मनाः ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
मम कौतूहलं त्वस्ति तेष्वर्थेषु पुनः प्रभो |
७ क
वन पर्व
अध्याय २८७
वैशम्पाय़न उवाच
मम गेहे मय़ा चास्य तथेत्येवं प्रतिश्रुतम् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ७४
वृहदश्व उवाच
मम च व्यवसाय़ेन तपसा चैव निर्जितः |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १६९
अर्जुन उवाच
मम चादृश्यत तदा तदद्भुतमिवाभवत् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८१
भीष्म उवाच
मम चापनय़ामास शल्यान्कुशलसंमतः ||
१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४३
कर्ण उवाच
मम चापप्रमुक्तानां शराणां नतपर्वणाम् |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
मम चापि पिता तात कथय़ामास शन्तनुः |
१११ क
आदि पर्व
अध्याय १७१
और्व उवाच
मम चापि भवेदेतदीश्वरस्य सतो महत् |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
मम चापि यथावुद्धि रुचितानि विनिश्चय़ात् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७७
भगवानु उवाच
मम चापि स वध्यो वै जगतश्चापि भारत |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
मम चापिण्डनाशाय़ पूर्वेषामपि चात्मनः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
मम चार्तप्रलापानां मा क्रुधः पाहि सैन्धवम् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
महेश्वर उवाच
मम चार्धं शरीरस्य मम चार्धाद्विनिःसृता |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
मम चासीन्मनुष्येन्द्र दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् |
६३ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
मम चास्त्राभिसंरम्भः प्रजानामशुभं ध्रुवम् ||
२१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
मम चैव निय़ोगेन विधेश्चाप्यनिवर्तनात् |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२०
भीष्म उवाच
मम चैव प्रभावेन व्रह्मतेजोमय़ः शुचिः ||
३४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८६
भीष्म उवाच
मम चैव समक्षं तां कन्यामाहूय़ भार्गवः |
३६ क
आदि पर्व
अध्याय ६७
शकुन्तलो उवाच
मम जाय़ेत यः पुत्रः स भवेत्त्वदनन्तरम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय ५७
वृहदश्व उवाच
मम ज्ञातिषु निक्षिप्य दारकौ स्यन्दनं तथा |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय ८०
यय़ातिरु उवाच
मम ज्येष्ठेन यदुना निय़ोगो नानुपालितः |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
मम तत्क्षमतां सर्वं भवान्कर्णश्च सर्वशः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
मम तत्राभवन्ये तु कौरवाः पार्श्वतः स्थिताः |
११ क
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
मम तस्य च भूतस्य वाहुय़ुद्धमवर्तत ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
वासुदेव उवाच
मम तात पिता राजञ्शन्तनुर्लोकविश्रुतः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
मम तात प्रतीपानि कुर्वन्पूर्वं विमानितः ||
२३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
मम तुल्यव्रते पुत्र नचिरं वर्तय़िष्यतः ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११९
व्यास उवाच
मम ते दर्शनं प्राप्तं तच्चैव सुकृतं पुरा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १५०
शल्मलिरु उवाच
मम तेजोवलं वाय़ोर्भीममपि हि नारद |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
भगवानु उवाच
मम तेजोवलार्धेन सर्वांस्तान्घ्नत शात्रवान् ||
६० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
मम त्वं नाभितो जातः प्रजासर्गकरः प्रभुः |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६३
राजधर्मो उवाच
मम त्वं निलय़ं प्राप्तः प्रिय़ातिथिरनिन्दितः |
२३ क