chevron_left  एवंarrow_drop_down
अनुशासन पर्व
अध्याय ३७
भीष्म उवाच
एवं नरो वर्तमानः शाश्वतीरेधते समाः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ६३
वृहदश्व उवाच
एवं नलं समादिश्य वासो दत्त्वा च कौरव |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
एवं नलः सान्त्वय़ित्वा भ्रातरं सत्यविक्रमः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
एवं नवविधो ज्ञेय़ः पार्थिवो गन्धविस्तरः ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
एवं नातिमहान्कालः स तेषामभ्यवर्तत ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
एवं नामाभिनिर्वृत्तं तस्य देशस्य वै द्विजाः |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
काल उवाच
एवं नाहं न वै मृत्युर्न सर्पो न तथा भवान् |
६९ क
शल्य पर्व
अध्याय १
जनमेजय़ उवाच
एवं निपातिते कर्णे समरे सव्यसाचिना |
१ क
सभा पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं निर्जित्य तरसा सान्त्वेन विजय़ेन च |
५४ क
वन पर्व
अध्याय २००
व्याध उवाच
एवं निर्वेदमादत्ते पापं कर्म जहाति च |
५० क
शल्य पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं निश्चित्य भगवान्विश्वामित्रो महामुनिः |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०२
सञ्जय़ उवाच
एवं निश्चित्य मनसा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
एवं निहत्य समरे शाल्वं सौभं निपात्य च |
४० क
सभा पर्व
अध्याय ६०
द्रौपद्यु उवाच
एवं नूनं व्यदधात्संविधाता; स्पर्शावुभौ स्पृशतो धीरवालौ |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
एवं नूनं हते वृत्रे शक्रं नन्दन्ति वन्दिनः |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं नृशंसः परुषाणि पार्था; नश्रावय़द्धृतराष्ट्रस्य पुत्रः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६२
कपिल उवाच
एवं पक्वकषाय़ाणामानन्त्येन श्रुतेन च |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
एवं पञ्चत्रिका ह्येते गुणास्तदुपलव्धय़े |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
एवं परमसम्वोधात्पञ्चविंशोऽनुवुद्धवान् ||
३८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय २६
श्रीभगवानु उवाच
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षय़ो विदुः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
एवं परिमितं कालमाचरन्संशितव्रतः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
एवं परुषितस्तेन तदा शारद्वतेन सः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
एवं परैराचरितं पाण्डवेय़ैश्च संय़ुगे |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
एवं पर्याकुले लोके मर्यादा न भविष्यति |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं पर्याकुले लोके विपथे जर्जरीकृते |
५२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
एवं पश्यं प्रपश्यन्ति आत्मानमजरं परम् ||
२५ ख
मौसल पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
एवं पश्यन्हृषीकेशः सम्प्राप्तं कालपर्ययम् |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
एवं पश्यामि वार्ष्णेय़ चिन्तय़न्प्रज्ञय़ा स्वय़ा |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
एवं पाण्डोः सुताः पञ्च देवदत्ता महावलाः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
एवं पापैर्विमुक्तस्त्वं पूतः स्वर्गमवाप्स्यसि |
१६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
एवं पार्थो व्यपाय़ात्स निहतप्रार्ष्टिसारथिः |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
एवं पितामहः पूर्वमुक्तवान्मां सुरैः सह ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
एवं पितामहेनोक्तो धर्मात्मा स धनञ्जय़ः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
एवं पितुश्चापचितिं गतवांस्त्वं भविष्यसि |
१९१ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
एवं पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
व्राह्मण उवाच
एवं पुत्राश्च पौत्राश्च ज्ञातय़ो वान्धवास्तथा |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
एवं पुनरर्थचर्याप्रसक्तो; हित्वा धर्मं यः प्रकरोत्यधर्मम् |
९ क
सभा पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं पुरुषशार्दूलो महावुद्धिर्जनार्दनः |
५१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
एवं पूर्वं प्रसन्नात्मा लभते यद्यदिच्छति |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७
भीष्म उवाच
एवं पूर्वकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १८
व्राह्मण उवाच
एवं पूर्वकृतं कर्म सर्वो जन्तुर्निषेवते |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३१
युधिष्ठिर उवाच
एवं पूर्वापरान्क्लेशानतितिक्षन्त पाण्डवाः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
एवं पूर्वापरे रात्रे युञ्जन्नात्मानमात्मना |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
एवं पूर्वे पूर्वतराः प्रवृत्ताश्चैव मानवाः ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
एवं पृष्टस्तु वहुशो रक्षमाणश्च पाण्डवान् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १८४
मार्कण्डेय़ उवाच
एवं पृष्टा प्रीतिय़ुक्तेन तेन; शुश्रूषुमीक्ष्योत्तमवुद्धिय़ुक्तम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
एवं पृष्ट्वा तु राजानं कुमारान्पर्यपृच्छत |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
एवं पृष्ट्वा सूतपुत्रं हृच्छोकेनार्दितो भृशम् |
१ क
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
एवं प्रकारान्सुवहून्कुर्वन्ती गगनाच्च्युता |
१२ क