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शान्ति पर्व
अध्याय १२२
वसुहोम उवाच
भूय़ः स भगवान्ध्यात्वा चिरं शूलवराय़ुधः |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
भूय़ः संवर्धय़ामास तद्वर्षं देवराडथ ||
४५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
भूय़ः संहर्षय़ां चक्रुर्दुर्योधनममर्षणम् ||
४२ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
दुर्योधन उवाच
भूय़ः संहर्षय़ामासू राजन्दुर्योधनं नृपम् ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
भूय़ः समाद्रवन्वीराः सात्यकिप्रमुखा रथाः ||
६७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
भूय़ः सृजसि योगास्त्रं विषामृतमिवैकधा ||
६८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८
भीष्म उवाच
भूय़ः स्यादुभय़ं दत्तं व्राह्मणाद्यदकोपनात् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय २४३
वैशम्पाय़न उवाच
भूय़श्च चारै राजेन्द्र प्रवृत्तिरुपपादिता |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५३
सञ्जय़ उवाच
भूय़श्च चिन्तय़िष्यामि नीतिमात्महिताय़ वै |
३० क
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
भूय़श्च तद्वय़सो नानुरूपं; तस्मात्पापं पाण्डव मा प्रसार्षीः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११०
गालव उवाच
भूय़श्च तान्सुरान्द्रष्टुमिच्छेय़मरुणानुज ||
३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १६१
वैशम्पाय़न उवाच
भूय़श्च तैस्तैः प्रतिवोधितानि; मोक्षं प्रशंसन्ति न तं च विद्मः ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय २३०
वैशम्पाय़न उवाच
भूय़श्च योधय़ामासुः कृत्वा कर्णमथाग्रतः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय ३३
द्रौपद्यु उवाच
भूय़श्च विलपिष्यामि सुमनास्तन्निवोध मे ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २८६
कर्ण उवाच
भूय़श्च शिरसा याचे प्रसाद्य च पुनः पुनः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
भूय़श्च श्रोतुमिच्छामि परेषां रथसत्तमान् |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
भीष्म उवाच
भूय़श्चाचिन्तय़त्सिद्धो यत्परं सोऽभ्यपद्यत ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
भूय़श्चाञ्जलिकेनाथ समार्गणगणं महत् |
७८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
भूय़श्चाञ्जलिकेनास्य मार्गणेन महाप्रभम् |
९३ क
सभा पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
भूय़श्चाद्भुतवीर्यौजा धर्ममेवानुपालय़न् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
भूय़श्चापि निवोध त्वं तवापनय़जं क्षय़म् |
८६ क
वन पर्व
अध्याय २९८
वैशम्पाय़न उवाच
भूय़श्चाश्वासय़ामास कौन्तेय़ं सत्यविक्रमम् ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
भूय़श्चैनं महावाहुः शरैः शीघ्रमवाकिरत् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३७
वैशम्पाय़न उवाच
भूय़श्चैनं वचः प्राह सृजेमा विविधाः प्रजाः ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
भूय़श्चैव चिकीर्षन्तौ द्रोणपुत्रस्य तौ प्रिय़म् |
१०३ क
वन पर्व
अध्याय १६४
अर्जुन उवाच
भूय़श्चैव तु तप्तव्यं तपः परमदारुणम् |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
भूय़श्चैव प्रशासिष्ये निहत्य त्वां सवान्धवम् ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
भूय़श्चैव महाराज सविशेषमहं ततः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
भूय़श्चैव महावाहुः शरवर्षैरवाकिरत् ||
२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
युधिष्ठिर उवाच
भूय़श्चैवानुशास्योऽहं भवता पार्थिवर्षभ ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
भूय़श्चैवापरं प्राह वचनं मधुरं स्म सः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १४७
भीष्म उवाच
भूय़श्चैवाभिनङ्क्षन्ति निर्धर्मा निर्जपा इव ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
भूय़श्चोवाच मतिमान्माधवो धर्मनन्दनम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८३
राजो उवाच
भूय़सा परिवर्हेण सत्कारेण च भूय़सा |
५५ क
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
भूय़सी मम पृथ्वीय़ं यथा पार्थस्य नो तथा ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
भूय़सीं वर्तते वृत्तिं न शमे कुरुते मनः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
भूय़स्ततो दशगुणाः सहस्रज्योतिषः सुताः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७२
युधिष्ठिर उवाच
भूय़स्तु मे समुत्पन्ना वुद्धिरव्यक्तदर्शनात् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८
धृतराष्ट्र उवाच
भूय़स्तु लव्धसञ्ज्ञस्त्वा परिप्रक्ष्यामि सञ्जय़ ||
३९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
भूय़स्तु शृणु मे व्रह्मन्सम्पदं धर्मसङ्ग्रहे ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
भूय़स्तु श्रोतुमिच्छामि धर्मार्थसहितं नृप |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५८
भीष्म उवाच
भूय़स्ते यत्र सन्देहस्तद्व्रूहि वदतां वर ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
भीष्म उवाच
भूय़स्तेनापि हर्तव्यं पितृवित्ताद्युधिष्ठिर ||
४५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
भूय़स्तेषां वलं मन्ये यथा राज्ञस्तपस्विनः |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
भूय़स्त्वय़ा समेष्यामि क्षिप्रमेव जनार्दन |
७० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
भूय़ांसं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
भूय़ांसं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५२
युधिष्ठिर उवाच
भूय़ांसो हृदय़े ये मे प्रश्नास्ते व्याहृतास्त्वय़ा |
२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
भूय़ांस्ते हीय़ते धर्मो मा पुत्रक वृथा कृथाः ||
७२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
भूय़ांस्ते हीय़ते धर्मो मा पुत्रक वृथा कृथाः ||
५ ख