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आदि पर्व
अध्याय १४९
कुन्त्यु उवाच
एकस्तव सुतो वालः कन्या चैका तपस्विनी |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
एकस्तान्मन्त्रवित्प्रीतः सर्वानर्हति भारत ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
एकस्तु धार्तराष्ट्रेभ्यः पाण्डवान्यः समाश्रितः |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
एकस्तु न तथा राजंश्चक्रतुः कलहं ततः ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
एकस्तु शव्दोऽविरतः श्रुतोऽस्माभिरुदीरितः |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
एकस्तु सुखसंवृद्धो वाल्याद्दर्पाच्च निर्भय़ः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
एकस्थाः सर्ववर्णास्ते मण्डलं वहुय़ोजनम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६८
पिङ्गलो उवाच
एकस्थूणं नवद्वारमपिधास्याम्यगारकम् |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
एकस्थैर्वहुभिः क्रुद्धैरूष्मेव समजाय़त ||
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
एकस्थौ तु रणे शूरौ दृढे विक्षिप्य कार्मुके |
४७ क
विराट पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
एकस्मिन्नपि विज्ञाते प्रतिज्ञातं हि नस्तथा ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
एकस्मिन्नासने वीरावुपविष्टौ महावलौ |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
एकस्मिन्नेव आचार्ये शुश्रूषुर्मलपङ्कवान् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
एकस्मिन्नेव जाय़ेते कुले क्लीवमहारथौ |
३ क
विराट पर्व
अध्याय २३
वैशम्पाय़न उवाच
एकस्मिन्नेव ते सर्वे सुसमिद्धे हुताशने |
७ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
एकस्मिन्नेव पुरुषे सा सा वुद्धिस्तदा तदा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता ||
५६ ग
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
एकस्मिन्व्राह्मणे राजन्नावेश्योचुर्नराधिपम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
एकस्य च प्रसादेन कृत्स्नो लोकः प्रसीदति |
१० क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
एकस्य च वहूनां च तुमुलं लोमहर्षणम् ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५८
वासुदेव उवाच
एकस्य च वहूनां च पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
एकस्य च वहूनां च पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
एकस्य च वहूनां च पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
एकस्य च वहूनां च यथासीत्तुमुलो रणः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
एकस्य च वहूनां च रथनागनरक्षय़ः ||
३१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १००
सञ्जय़ उवाच
एकस्य च वहूनां च शृणुष्व गदतोऽद्भुतम् ||
२६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १००
धृतराष्ट्र उवाच
एकस्य च वहूनां च संनिपातो महाहवे |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
एकस्य च वहूनां च समेतानां रणाजिरे ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ८२
वासुदेव उवाच
एकस्य जय़माशंसे द्वितीय़स्यापराजय़म् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
एकस्य धर्मेण सतां मतेन; सर्वे स्म तं मार्गमनुप्रपन्नाः |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
एकस्य भूतं भूतस्य द्वय़ं स्थावरजङ्गमम् ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
एकस्य भूतं भूतस्य द्वय़ं स्थावरजङ्गमम् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
धृतराष्ट्र उवाच
एकस्य वहुभिर्युद्धं शत्रुभिर्वै महारथैः ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १८७
द्रुपद उवाच
एकस्य वह्व्यो विहिता महिष्यः कुरुनन्दन |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७१
भीष्म उवाच
एकस्य विद्धि देवस्य सर्वं जगदिदं वशे ||
२८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ४३
सनत्सुजात उवाच
एकस्य वेदस्याज्ञानाद्वेदास्ते वहवोऽभवन् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६७
भीष्म उवाच
एकस्य हि द्वौ हरतो द्वय़ोश्च वहवोऽपरे ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९७
धृतराष्ट्र उवाच
एकस्य हि न पर्याप्तं मत्सैन्यं तस्य सञ्जय़ |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
कण्व उवाच
एकस्या देहशाखाय़ास्तावद्भारममन्यत ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय १९४
कर्ण उवाच
एकस्यां ये रताः पत्न्यां न भिद्यन्ते परस्परम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १०४
लोमश उवाच
एकस्यां सम्भविष्यन्ति पत्न्यां तव नरोत्तम ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
विरूप उवाच
एकस्याः पुरुषव्याघ्र कः शुद्धः कोऽत्र दोषवान् ||
९५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९८
मनुरु उवाच
एकस्याद्या प्रवृत्तिस्तु प्रधानात्सम्प्रवर्तते |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३३
सञ्जय़ उवाच
एकस्याप्यसमर्थस्त्वं फल्गुनस्य रणाजिरे |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
एकस्यार्थे वहून्हत्वा पुत्रस्याधर्मविद्यथा |
३१ क
वन पर्व
अध्याय २३३
वैशम्पाय़न उवाच
एकस्यैव वय़ं तात कुर्याम वचनं भुवि |
१५ क
वन पर्व
अध्याय ८१
पुलस्त्य उवाच
एकहंसे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् |
१७ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
एकहाय़नवत्सांश्च वाहय़िष्यन्ति मानवाः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय २२०
मार्कण्डेय़ उवाच
एका तत्र विशाखस्य घण्टा स्कन्दस्य चापरा |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९५
भीष्म उवाच
एका तिष्ठसि का नु त्वं कस्यार्थे किं प्रय़ोजनम् |
२० क