शान्ति पर्व
अध्याय
११९
भीष्म उवाच
भृत्यान्स्थापय़तेऽवुद्धिर्न स रञ्जय़ते प्रजाः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३
वैशम्पाय़न उवाच
भृत्याश्चैवोपजीवन्ति तान्भजस्व महीपते ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय
४८
दुर्योधन उवाच
भृत्यास्तु ये पाण्डवानां तांस्ते वक्ष्यामि भारत |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
ऋषय़ ऊचुः
भृत्यास्तेषां ततस्तानि प्रग्राहितुमुपाद्रवन् ||
२३ ख
मौसल पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
भृत्यास्त्वन्धकवृष्णीनां सादिनो रथिनश्च ये |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
भृत्येभ्यो विसृजेदर्थान्नैकः सर्वहरो भवेत् ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
भृत्यैः सन्दृश्यमानानां पुत्रदाराश्रितैस्तथा |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
भृत्यैर्वणिज्याचारं च पुत्रैः सेवेत व्राह्मणान् ||
१२ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
मातो उवाच
भृत्यैर्विहीय़मानानां परपिण्डोपजीविनाम् |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
वैशम्पाय़न उवाच
भृत्यो वा यदि वा पुत्रस्तपस्वी वापि कश्चन |
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
भृशं क्रुद्धश्च तेजस्वी नाराचेन समर्पय़त् |
११ क
शल्य पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
भृशं क्रोधविसृष्टेन व्रह्मतेजोभवेन च |
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१९७
मार्कण्डेय़ उवाच
भृशं क्रोधाभिभूतेन वलाका सा निरीक्षिता ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
भृशं क्रोधेन चाविष्टो रथस्थो राक्षसाधिपः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
२०७
मार्कण्डेय़ उवाच
भृशं ग्लानश्च तेजस्वी न स किञ्चित्प्रजज्ञिवान् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
भृशं च ताड्यमानापि न जगामाश्रमात्ततः ||
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
भृशं चित्रमय़ुध्येतामलम्वलघटोत्कचौ ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२१२
मार्कण्डेय़ उवाच
भृशं जज्वाल तेजस्वी तपसाप्याय़ितः शिखी |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
भृशं तस्य मनो रेमे महर्षेर्भावितात्मनः ||
३३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११५
सञ्जय़ उवाच
भृशं तूर्यनिनादेषु वाद्यमानेषु चानघ |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६८
सञ्जय़ उवाच
भृशं त्रस्ताश्च वहुधा स्वानेन ममृदुर्गजाः |
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
१४७
वैशम्पाय़न उवाच
भृशं दुःखपरीताङ्गी कन्या तावभ्यभाषत ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
भृशं दुःखपरीतात्मा विललाप वृकोदरः ||
१४ ग
वन पर्व
अध्याय
७३
वृहदश्व उवाच
भृशं दुःखपरीतात्मा सस्वरं प्ररुदोद ह ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
भृशं निजघ्नतुः पार्थमिन्द्रं वृत्रवलाविव ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
भृशं परिष्वज्य च भीमसेन; माश्वासय़ामास च शत्रुमध्ये ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
भृशं प्रदध्मुर्लवणाम्वुसम्भवा; न्परांश्च वाणासनपाणय़ोऽभ्ययुः ||
३९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२३
वैशम्पाय़न उवाच
भृशं प्रीतोऽस्मि भद्रं ते व्रह्मन्स्तोत्रेण ते विभो ||
२३ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
भृशं प्रीतोऽस्मि भवतश्चारित्रेण विचक्षण |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
भृशं भीतास्ततः शान्तिं चक्रुः स्वस्त्ययनानि च |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
भृशं मर्मण्यभिहतावुभावास्तां सुविह्वलौ ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
भृशं मुमुचुरश्रूणि पुत्रास्तव विशां पते ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
भृशं ववौ ज्वलनसखो विय़द्रजः; समावृणोन्मुहुरपि चैव सैनिकान् |
५९ क
शल्य पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
भृशं विक्षतगात्रश्च श्रान्तवाहनसैनिकः ||
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३१
दुर्योधन उवाच
भृशं विक्षतगात्रश्च हतवाहनसैनिकः ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३५
सञ्जय़ उवाच
भृशं विप्रहतां दृष्ट्वा स्कन्देनेवासुरीं चमूम् ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६२
सञ्जय़ उवाच
भृशं वेद महाराज यथा वेद वृहस्पतिः ||
९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
भृशं वैरमभूद्राजंस्तपःस्पर्धाकृतं महत् ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६७
धृतराष्ट्र उवाच
भृशं शोकाभितप्तेन पितुर्वधममृष्यता ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
भृशं शोकार्णवे मग्नो निराशः सर्वतोऽभवत् ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
भृशं स प्रहितो भ्रात्रा भ्राता भ्रातुः प्रिय़ङ्करः |
६३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
भृशं संविग्नहृदय़ः पपात च मुमोह च ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
भृशं संशितवाक्तात तपोवलसमन्वितः ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२०
वैशम्पाय़न उवाच
भृशं सन्तापय़ामास देवराजं स गौतमः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
भृशं सुदुःखितौ वृद्धौ वहुशः प्रीतिसंय़ुतौ ||
८५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
भृशमतिरुषितः परं वृषः; कुरुपृतनापतिराह मद्रपम् ||
७० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
भृशमभ्यहनत्क्रुद्धस्तोत्त्रैरिव महाद्विपम् ||
४५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
भृशमश्वैः प्रजवितैः प्रय़युर्यत्र ते रथाः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
भृशमाश्वासय़ामास वाग्भिरिष्टाभिरव्ययः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
भृशमाश्वासय़ेश्चैनां पुत्रशोकपरिप्लुताम् |
४१ क