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स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
लोभाज्येन च संसिक्तो ज्वलितः पार्थपावकः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
भीष्म उवाच
लोभात्क्रोधः प्रभवति परदोषैरुदीर्यते |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रवर्तते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८८
हंस उवाच
लोभात्त्यजति मित्राणि सङ्गात्स्वर्गं न गच्छति ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
लोभात्प्रचारं चरतस्तासु वेलासु वै नरान् |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३१
व्राह्मण उवाच
लोभाद्धि जाय़ते तृष्णा ततश्चिन्ता प्रसज्यते |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३८
विदुर उवाच
लोभाद्भय़ादर्थकार्पण्यतो वा; तस्यानर्थं जीवितमाहुरार्याः ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
लोभाद्वा ते न जानीय़ुरस्मान्वा मोह आविशत् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७६
अर्जुन उवाच
लोभाद्वा धृतराष्ट्रस्य दैन्याद्वा समुपस्थितात् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
लोभाद्वा वुद्धिमोहाद्वा वलवीर्यार्थमेव च |
३३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
लोभानुगतदुर्वुद्धेः क्रोधेन विकृतात्मनः ||
५० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५२
भीष्म उवाच
लोभान्मोहश्च माय़ा च मानस्तम्भः परासुता ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
लोभान्मोहादनुक्रोशाद्भय़ाद्वाप्यवहुश्रुतः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
लोभान्वितो मदवलान्नष्टसञ्ज्ञो नराधिपः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
लोभाभिभूतैः कृपणैरनार्यैरकृतात्मभिः ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४५
व्रह्मो उवाच
लोभेप्सापरिसङ्ख्यातं विविक्तज्ञानसम्भवम् ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
लोभेऽतिप्रसृतान्पुत्रान्निगृह्णीष्व विशां पते ||
६० ख
सभा पर्व
अध्याय ६३
द्रौपद्यु उवाच
लोभो धर्मस्य नाशाय़ भगवन्नाहमुत्सहे |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५७
युधिष्ठिर उवाच
लोभो मात्सर्यमीर्ष्या च कुत्सासूय़ा कृपा तथा |
२ क
वन पर्व
अध्याय ११०
युधिष्ठिर उवाच
लोभय़ामास या चेतो मृगभूतस्य तस्य वै ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ६५
शकुन्तलो उवाच
लोभय़ित्वा वरारोहे तपसः संनिवर्तय़ ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
लोभय़ित्वाभिविश्वास्य विषय़ं मम शोभनाः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
लोमपाद इति ख्यातो अङ्गानामीश्वरोऽभवत् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
लोमपादश्च राजर्षिः शान्तां दत्त्वा सुतां प्रभुः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ११०
युधिष्ठिर उवाच
लोमपादश्च राजर्षिर्यदाश्रूय़त धार्मिकः |
९ क
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
लोमपादो दुहितरं सावित्रीं सविता यथा ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १२९
वैशम्पाय़न उवाच
लोमशं पाण्डवश्रेष्ठ इदं वचनमव्रवीत् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय १०९
वैशम्पाय़न उवाच
लोमशं पुनरेव स्म पर्यपृच्छत्तदद्भुतम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
लोमशं प्रहसन्वाक्यमिदमाह शचीपतिः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
लोमशं समनुज्ञाप्य धौम्यं चैव पुरोहितम् |
१६ क
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
लोमशः सिद्धमार्गेण जगामानुपमद्युतिः |
८ क
वन पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
लोमशः सुमहातेजा ऋषिस्तत्राजगाम ह ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ११५
वैशम्पाय़न उवाच
लोमशश्चास्य तान्सर्वानाचख्यौ तत्र तापसान् |
२ क
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
लोमशस्योपसङ्गृह्य पादौ द्वैपाय़नस्य च |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
लोमशेन च सुप्रीतस्त्रिरात्रं काम्यकेऽवसत् ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय १५३
वैशम्पाय़न उवाच
लोमशेनैव सहिताः प्रय़युः प्रीतमानसाः ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
लोमशो नाचिकेतश्च लोमहर्षण एव च |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
लोमशो नाम मार्जारः पक्षिसत्त्वावसादकः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय २६९
मार्कण्डेय़ उवाच
लोमसंहर्षणो घोरः पुरा देवासुरे यथा ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १
महाभारत कथा
लोमहर्षणपुत्र उग्रश्रवाः सूतः पौराणिको नैमिषारण्ये शौनकस्य कुलपतेर्द्वादशवार्षिके सत्रे ||
१ क
आदि पर्व
अध्याय ४
महाभारत कथा
लोमहर्षणपुत्र उग्रश्रवाः सूतः पौराणिको नैमिषारण्ये शौनकस्य कुलपतेर्द्वादशवार्षिके सत्रे ऋषीनभ्यागतानुपतस्थे ||
१ क
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
लोमहर्षणमत्युग्रं शक्रस्य वलिना यथा ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
लोम्नां प्रमाणेन समं व्रह्मलोके महीय़ते ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
लोम्नि लोम्नि महाभाग लोकाश्चास्याक्षय़ाः स्मृताः ||
३३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ११
भीष्म उवाच
लोलामचोक्षामवलेहिनीं च; व्यपेतधैर्यां कलहप्रिय़ां च |
१२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
लोलोद्धृतकरां चैव पूर्णाशां च महानदीम् ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
लोष्टकाञ्चनतुल्यार्थाः सुहृत्स्वशठवुद्धय़ः |
२३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३३
महेश्वर उवाच
लोष्टैः स्तम्भैरुपाय़ैर्वा जन्तून्वाधति शोभने |
३३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
लोहकुम्भीश्च तैलस्य क्वाथ्यमानाः समन्ततः ||
२४ ख