आदि पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
भृशमुत्पतितं घोरं कुन्ती शुश्राव भारत ||
९ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
९
वैशम्पाय़न उवाच
भृशमुद्विग्नमनसस्ते पौराः कुरुसङ्क्षय़े |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
भृशमुद्विग्नमनसो द्रोणपुत्रमुपागमन् ||
१ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
भृशमुद्विग्नमनसो नाभ्यनन्दन्त तद्वचः ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
भृशमुद्विग्नमनसो हीना देवव्रतेन ते ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११
डुण्डुभ उवाच
भृशमुद्विग्नहृदय़स्तमवोचं वनौकसम् ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
भृशमुद्वेजितः सङ्ख्ये शरजालैरनेकशः ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
भृशाहतः पपातोर्व्यां न त्वेनमजहात्स्मृतिः ||
१७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३
सञ्जय़ उवाच
भृशोद्विग्नेषु सैन्येषु दृष्ट्वा पार्थस्य विक्रमम् ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
भृशोपहतसङ्कल्पा नहृष्टमनसोऽभवन् ||
४९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
भेजिरे पुरुषव्याघ्रा वृष्ण्यन्धकमहारथाः |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
भेजे दश दिशस्तूर्णं न्यपतच्च गतासुवत् ||
४७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
भेजे दिशो महाराज प्रणुन्ना दृढधन्विभिः |
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२४
वैशम्पाय़न उवाच
भेजे सर्वात्मना चैव प्रद्युम्नजननी तथा |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
भेतव्यं हि सदा राज्ञां प्रजानामधिपा हि ते |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
भेतव्यमरिशेषाणामेकाय़नगता हि ते ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२६
सूत उवाच
भेत्तारं गिरिशृङ्गाणां नदीजलविशोषणम् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२६०
मार्कण्डेय़ उवाच
भेत्तारो गिरिशृङ्गाणां शालतालशिलाय़ुधाः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
भेदं च प्रथमं युञ्ज्यात्तूष्णीन्दण्डं तथैव च |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय
५४
सूत उवाच
भेदं राज्यविनाशं च कुरुपाण्डवय़ोस्तदा ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०१
याज्ञवल्क्य उवाच
भेदः परुषता चैव कामक्रोधौ मदस्तथा |
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
युधिष्ठिर उवाच
भेदमूलो विनाशो हि गणानामुपलभ्यते |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
भेदाच्चैव प्रमादाच्च नाम्यन्ते रिपुभिर्गणाः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
भेदाद्गणा विनश्यन्ति भिन्नाः सूपजपाः परैः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
८२
नारद उवाच
भेदाद्विनाशः सङ्घानां सङ्घमुख्योऽसि केशव |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
भेदिते च त्वय़ि विभो लोको द्वैधमुपेष्यति |
१७ क
सभा पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
भेदे विनाशो राज्यस्य तत्पुत्र परिवर्जय़ ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
भेदेनोपप्रदानेन संसृजन्नौषधैस्तथा |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
भेदैर्ये व्यपकर्षन्ति ते वै निरय़गामिनः ||
६८ ख
आदि पर्व
अध्याय
५५
वैशम्पाय़न उवाच
भेदो राज्यविनाशश्च जय़श्च जय़तां वर ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
भेदय़ामास कपिभिर्महान्ति च वहूनि च ||
५१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२
भीष्म उवाच
भेदय़ामास तान्गत्वा नगरं वै नृपात्मजान् ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२६८
मार्कण्डेय़ उवाच
भेदय़ामास लङ्काय़ाः प्राकारं रघुनन्दनः ||
२३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४८
वासुदेव उवाच
भेदय़ित्वा नृपान्सर्वान्वाग्भिर्मन्त्रेण चासकृत् ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५६
वैशम्पाय़न उवाच
भेरीपणवशङ्खानां मृदङ्गानां च निस्वनः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
भेरीपणवशव्दैश्च पटहानां च निस्वनैः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
भेरीमृदङ्गनिनदैः शङ्खवैणवनिस्वनैः |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
भेरीमृदङ्गपणवान्नादय़न्तश्च पुष्करान् |
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
भेरीमृदङ्गपणवान्नादय़ेय़ुश्च कुञ्जरान् ||
४७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
भेरीमृदङ्गमुरजा हय़कुञ्जरनिस्वनाः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
भेरीमृदङ्गशङ्खांश्च दध्मुर्वीराः सहस्रशः |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
भेरीमृदङ्गशङ्खानां दुन्दुभीनां च निस्वनैः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
भेरीशङ्खनिनादैश्च तुमुलः समपद्यत ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
भेरीशङ्खनिनादैश्च स शव्दस्तुमुलोऽभवत् ||
३ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
भेरीशङ्खमृदङ्गांस्ते झर्झरानकगोमुखान् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
भेरीशङ्खमृदङ्गाद्यांस्तन्त्रीशव्दांश्च पुष्कलान् |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
भेरीशङ्खमृदङ्गानामभवच्च स्वनो महान् |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
भेरीशव्दाश्च तुमुला विमिश्राः शङ्खनिस्वनैः |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२९
सञ्जय़ उवाच
भेरीशव्देन महता मृदङ्गानां स्वनेन च ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
भेरीश्च वादय़ामासुर्मृदङ्गांश्चानकैः सह ||
३७ ख