chevron_left  भेरीश्चाभ्यहनन्हृष्टाarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १६६
सञ्जय़ उवाच
भेरीश्चाभ्यहनन्हृष्टा डिण्डिमांश्च सहस्रशः |
५८ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
भेर्यश्च तूर्याणि च वारिजाश्च; वेषैः परार्ध्यैः प्रमदाः शुभाश्च ||
२७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
भेषजं कुरुते योगात्प्रशमार्थमिहाभिभो ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
भेषजैः स चिकित्स्यः स्याद्य उन्मार्गेण गच्छति ||
३४ ग
आदि पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
भैक्षं च न तथा वीर लभ्यते कुरुनन्दन ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय १८४
वैशम्पाय़न उवाच
भैक्षं चरित्वा तु युधिष्ठिराय़; निवेदय़ां चक्रुरदीनसत्त्वाः ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
भैक्षं नाश्नासि न चान्यच्चरसि |
४७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १३०
कुन्त्यु उवाच
भैक्षं विप्रतिषिद्धं ते कृषिर्नैवोपपद्यते |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२८
भीष्म उवाच
भैक्षचर्या न विहिता न च विट्शूद्रजीविका ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
भैक्षचर्या न विहिता न च विट्शूद्रजीविका |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय ६३
भीष्म उवाच
भैक्षचर्यां न तु प्राहुस्तस्य तद्धर्मचारिणः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
भैक्षचर्यापदेशेन ददर्श मिथिलेश्वरम् ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
महेश्वर उवाच
भैक्षचर्यापरो धर्मो धर्मो नित्योपवासिता |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६९
भीष्म उवाच
भैक्षचर्यामनापन्नो न गच्छेत्पूर्वकेतितः ||
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
भैक्षचर्यामन्धकवृष्णिराज्ये; श्रेय़ो मन्ये न तु युद्धेन राज्यम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
भैक्षचर्यास्वधीकारः प्रशस्त इह मोक्षिणः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १५५
व्राह्मण उवाच
भैक्षमुच्छिष्टमन्येषां भुङ्क्ते चापि सदा सदा |
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय १३
जरत्कारुरु उवाच
भैक्षवत्तामहं कन्यामुपय़ंस्ये विधानतः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय ३४
एलापत्र उवाच
भैक्षवद्भिक्षमाणाय़ नागानां भय़शान्तय़े |
१८ क
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
भैक्षहोमव्रतैर्हीनास्तथैव गुरुवासिनाम् ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
भैक्षेण वृत्तिं कल्पय़ामीति ||
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११३
वृहस्पतिरु उवाच
भैक्षेणान्नं समाहृत्य विप्रो वेदपुरस्कृतः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३२
नारद उवाच
भैक्ष्यचर्यासु निरताः कृशा गुरुकुलाश्रय़ाः |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १०
भीम उवाच
भैक्ष्यमेवाचरिष्याम शरीरस्या विमोक्षणात् |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
भैमसेनिं रणे तूर्णं सर्वमर्मस्वताडय़त् ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
भैमसेनिं रथस्थं तु तत्रापश्याम भारत |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
भैमसेनिः सुसङ्क्रुद्धः प्रत्यमित्रमवारय़त् ||
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४०
सञ्जय़ उवाच
भैमसेनिमथाय़ान्तं माय़ाशतविशारदम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
भैमसेनिर्धनुश्छित्त्वा सौमदत्तेर्महात्मनः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
भैमसेनिर्महामाय़ो माय़या कुरुसत्तम |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १६९
भीष्म उवाच
भैमसेनिर्महाराज हैडिम्वो राक्षसेश्वरः |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
भैमसेनिस्ततो राजन्केकय़ाश्च महारथाः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
भैमसेनी रणे क्रुद्धः सर्वसैन्यान्यभीषय़त् ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
भैमि धर्मभृतां श्रेष्ठं द्रक्ष्यसे विगतज्वरम् ||
८८ ख
वन पर्व
अध्याय ७४
वृहदश्व उवाच
भैमी किल स्म भर्तारं द्वितीय़ं वरय़िष्यति ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय ७५
दमय़न्त्यु उवाच
भैमीमपि नलो राजा भ्राजमानो यथा पुरा |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ५२
सूत उवाच
भैरवो मुण्डवेदाङ्गः पिशङ्गश्चोद्रपारगः ||
१५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २
विदुर उवाच
भैषज्यमेतद्दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तय़ेत् |
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
भैषज्यमेतद्दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तय़ेत् |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
भो आरुणे पाञ्चाल्य क्वासि |
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
भो उत्तङ्क यत्किञ्चिदस्मद्गृहे परिहीय़ते तदिच्छाम्यहमपरिहीणं भवता क्रिय़माणमिति ||
८६ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
भो उपमन्यो क्वासि |
५४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
भो एतासां गवां पय़सा वृत्तिं कल्पय़ामीति ||
४४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
भो जनमेजय़ पुत्रोऽय़ं मम सर्प्यां जातः |
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७०
सञ्जय़ उवाच
भो भो कौरवदाय़ाद सहास्माभिर्महावल |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४९
भीष्म उवाच
भो भो क्षाम्याभिभाषे त्वां न रोषं कर्तुमर्हसि |
३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
भो भो धर्मज राजर्षे पुण्याभिजन पाण्डव |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ५१
वृहदश्व उवाच
भो भो नैषध राजेन्द्र नल सत्यव्रतो भवान् |
२९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
भो भो पश्यत मे वीरं पितरं व्राह्मणा भुवि |
८ क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
भो भो पाण्डुसुता वीराः पावकं मां विवोधत ||
३४ ख