शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
युधिष्ठिर उवाच
मर्यादासु प्रभिन्नासु क्षुभिते धर्मनिश्चय़े |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
मर्यादास्थापनार्थं च ततो वचनमुक्तवान् |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
मर्यादाय़ां धर्मसेतुर्निवद्धो नैव सीदति |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२३
भीष्म उवाच
मर्यादाय़ां स्थितो धर्मः शमः शौचस्य लक्षणम् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३८
पञ्चचूडो उवाच
मर्यादाय़ाममर्यादाः स्त्रिय़स्तिष्ठन्ति भर्तृषु ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
मर्यादेय़ं कृता तेन मानुषेष्विति नः श्रुतम् |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
मर्षय़न्ति यथा क्लीवा वलवन्तोऽमितौजसः ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
मर्षय़ामि च तत्सर्वं दुर्योधनकृतेन वै ||
१० ग
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
मर्षय़िष्यामि गोविन्द पादस्पर्शमिवोरगः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१५
नारद उवाच
मलं पृथिव्या वाहीकाः स्त्रीणां कौतूहलं मलम् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
मलं पृथिव्या वाह्लीकाः स्त्रीणां मद्रस्त्रिय़ो मलम् ||
६८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
मलपङ्कधरो धीमान्वहून्वर्षगणान्मुनिः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
६५
सुदेव उवाच
मलपङ्कानुलिप्ताङ्गीं मृणालीमिव तां भृशम् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
मलिनाः प्राप्नुय़ुः शुद्धिं यथा पूर्णां नदीं नराः |
५२ क
वन पर्व
अध्याय
६६
सुदेव उवाच
मलेन संवृतो ह्यस्यास्तन्वभ्रेणेव चन्द्रमाः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
मलोपचितसर्वाङ्गीं जटिलां कृष्णवाससम् ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
मलोपचितसर्वाङ्गौ वाय़ुभक्षौ वभूवतुः ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
मल्ला इव समासाद्य निजघ्नुरितरेतरम् |
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
मल्लाः सुदेष्णाः प्राहूतास्तथा माहिषकार्षिकाः |
४५ क
सभा पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
मल्लानामधिपं चैव पार्थिवं व्यजय़त्प्रभुः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
मल्लिकाक्षाः पद्मवर्णा वाह्लिजाताः स्वलङ्कृताः |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
मलय़ं चापि पश्यामि पारिय़ात्रं च पर्वतम् ||
१०४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
मलय़प्रतिमं द्रौणिश्छित्त्वाश्वांश्चतुरोऽहनत् ||
३२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९९
नारद उवाच
मलय़ो मातरिश्वा च निशाकरदिवाकरौ ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९९
सञ्जय़ उवाच
मशकं समनुप्राप्तमूर्णनाभिरिवोर्णय़ा ||
३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४९
भीष्म उवाच
मशकीटपिपीलानां स्थिरो भव युधिष्ठिर ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
मशकेषु तु राजन्या धार्मिकाः सर्वकामदाः ||
३४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४८
व्रह्मो उवाच
मशकोदुम्वरे त्वैक्यं पृथक्त्वमपि दृश्यते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
वसिष्ठ उवाच
मशकोदुम्वरे यद्वदन्यत्वं तद्वदेतय़ोः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
मशकोदुम्वरौ चापि सम्प्रय़ुक्तौ यथा सदा |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४०
व्यास उवाच
मशकोदुम्वरौ चापि सम्प्रय़ुक्तौ यथा सह ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
४६
वैशम्पाय़न उवाच
मसारगल्वर्कमय़ैर्विभङ्गै; र्विभूषितं हेमपिनद्धचक्रम् ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
मसारगल्वर्कसुवर्णरूप्यै; र्वज्रप्रवालस्फटिकैश्च मुख्यैः |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
महच्च दण्डपारुष्यमर्थदूषणमेव च ||
७४ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
महच्च फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसन्धिषु ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
महच्च फलवैषम्यं दृश्यते कर्मसन्धिषु |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
महच्च श्रुत्वा निनदं कौरवाणां; मतिं दध्रे शक्तिमोक्षाय़ कर्णः ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५४
भीष्म उवाच
महच्चकाराकुशलं पृषध्रो गालभन्निव ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
९८
लोमश उवाच
महच्छत्रुहणं तीक्ष्णं षडश्रं भीमनिस्वनम् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३८
व्यास उवाच
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्परतोऽमृतम् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४९
व्रह्मो उवाच
महतः प्रधानभूतस्य गुणोऽहङ्कार एव च ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
महतः प्राप्नुवन्त्यर्थांस्तेष्वेषामभवत्स्पृहा ||
५३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
महतश्च शरौघांस्तान्नैवाव्यथत वीर्यवान् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९८
याज्ञवल्क्य उवाच
महतश्चाप्यहङ्कार उत्पद्यति नराधिप |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
भीष्म उवाच
महतस्तपसो व्युष्ट्या पश्यँल्लोकौ परावरौ |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४७
वैशम्पाय़न उवाच
महतस्तमसः पारे पुरुषं ज्वलनद्युतिम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
महतस्तमसस्तात पारे तिष्ठन्नतामसः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
महतस्तमसो मध्ये स्थितं ज्वलनसंनिभम् ||
२५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
महतस्तस्य सैन्यस्य खुरनेमिस्वनेन च |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६७
असित उवाच
महतस्तेजसो राशीन्कालषष्ठान्स्वभावतः ||
६ ख