कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
मनोगतं मम ह्यासीद्भीष्मद्रोणौ महारथौ |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
मनोजवगतिर्भूत्वा योगय़ुक्तो यथानिलः ||
२८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
मनोजवनमश्रान्तं कालचक्रं प्रवर्तते ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः |
८७ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
मनोजवा कण्टकिनी प्रघसा पूतना तथा |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
मनोजवे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ||
७८ ख
वन पर्व
अध्याय
९७
अगस्त्य उवाच
मनोजवौ वाजिनौ च दित्सितं ते महासुर |
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
मनोज्ञं सर्वभूतेभ्यः सर्वं तत्र प्रदृश्यते |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
मनोज्ञमशनं भुक्त्वा विविशुः शरणान्यथ |
३५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
मनोज्ञा दर्शनीय़ा च तां भवान्वोढुमर्हति ||
१२७ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
मनोज्ञाः सर्वतो गन्धाः सुखस्पर्शाश्च सर्वशः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
मनोज्ञे काननवरे सर्वभूतमनोरमे |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
मनोदृष्टिहरै रम्यैः सर्वतः संवृतं शुभैः ||
३७ ग
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मनोदेहसमुत्थाभ्यां दुःखाभ्यामर्दितं जगत् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२८१
यम उवाच
मनोनुकूलं वुधवुद्धिवर्धनं; त्वय़ाहमुक्तो वचनं हिताश्रय़म् |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
मनोनुकूलवादी च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
मनोनुकूलाः प्रमदा रूपवत्यः सहस्रशः |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
मनोनुगात्परश्चोष्णो देशः कुरुकुलोद्वह |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६६
सञ्जय़ उवाच
मनोभिः सह सावेगैः संस्मृत्य च पुरातनम् |
३९ क
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मनोभिरनुजग्मुस्ते कृष्णं प्रीतिसमन्वय़ात् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
मनोभिरामा मधुरा रमय़न्ति मदोत्कटाः ||
११८ ख
सभा पर्व
अध्याय
६९
वैशम्पाय़न उवाच
मनोभिरेव कल्याणं दध्युस्ते तस्य धीमतः ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
मनोभिस्ते मनुष्येन्द्र पूर्वं योधाः परस्परम् |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
मनोभूतास्ततो भूय़ः प्रद्युम्नं प्रविशन्त्युत ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
मनोरथं तु यो दद्यादेकस्मा अपि भारत |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३३
कृप उवाच
मनोरथप्रलापो मे न ग्राह्यस्तव सूतज |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८०
पराशर उवाच
मनोरथरथं प्राप्य इन्द्रिय़ार्थहय़ं नरः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
मनोरथा महाराज ये तत्रासन्युधिष्ठिर ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
मनोरमं महेष्वासो विवेश वनमुत्तमम् ||
७ ग
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
मनोरमां दर्शनीय़ामाशु कुर्वन्तु शिल्पिनः ||
४६ ख
वन पर्व
अध्याय
२५
वैशम्पाय़न उवाच
मनोरमां भोगवतीमुपेत्य; धृतात्मनां चीरजटाधराणाम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
मनोरिला |
७ घ
वन पर्व
अध्याय
२११
मार्कण्डेय़ उवाच
मनोरेवाभवद्भार्या सुषुवे पञ्च पावकान् ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
मनोर्महात्मनस्तात प्रजाधर्मेण शासतः |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
७०
वैशम्पाय़न उवाच
मनोर्वंशो मानवानां ततोऽय़ं प्रथितोऽभवत् |
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१००
पृथिव्यु उवाच
मनोर्वै इति च प्राहुर्वलिं द्वारे गृहस्य वै |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
मनोवाक्कर्मके धर्मे कुरु श्रद्धां समाहितः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
मनोवाक्कर्मभिर्देव त्वां प्रपन्नान्भजस्व नः ||
५१ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
मनोवाक्कर्मभिर्भक्तान्पाति पुत्रानिवौरसान् ||
४२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
मनोवाक्कर्मभिर्भक्तैर्नित्यमाराधितश्च यैः |
४२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
मनोवाचि तथास्वादे दोषा ह्येषु प्रतिष्ठिताः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
९१
वैशम्पाय़न उवाच
मनोविशुद्धां वुद्धिं च दैवमाहुर्व्रतं द्विजाः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
५४
वृहदश्व उवाच
मनोविशुद्धिं वुद्धिं च भक्तिं रागं च भारत |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४५
व्यास उवाच
मनोवुद्धिपराभूतः स्वदेहपरदेहवित् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४६
व्रह्मो उवाच
मनोवुद्धिरथात्मानमव्यक्तं पुरुषं तथा ||
५२ ख
विराट पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
मनोहरं काञ्चनचित्रभूषणं; गृहं महच्छोभय़तामिय़ं मम ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
मनोहरतय़ा धीमान्पितुर्हृदय़तोषणः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
मनोहरवनोपेतास्तस्मिन्नतिरथोऽर्जुनः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
मनोहरा सुकेशी च सुमुखी हासिनी प्रभा |
२० क
सभा पर्व
अध्याय
३०
वैशम्पाय़न उवाच
मनोहराः प्रीतिकरा द्विजानां कुरुसत्तम ||
३१ ख