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वन पर्व
अध्याय १०१
देवा ऊचुः
भ्रंशितश्च सुरैश्वर्याल्लोकार्थं लोककण्टकः ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ५५
वृहदश्व उवाच
भ्रंशय़िष्यामि तं राज्यान्न भैम्या सह रंस्यते |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
भ्रमं प्रमोहमावर्तमभ्यासाद्विनिवर्तय़ेत् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
भ्रमतश्च वराहस्य लोहस्य प्रमुखे समम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
भ्रमत्सु युधि नागेषु मनुष्या विललम्विरे ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
भ्रमद्भिर्निष्टनद्भिश्च घोरमाय़ोधनं वभौ ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
भ्रमद्रथाम्वुदे तस्मिन्दृश्यते स्म पुनः पुनः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
भ्रमन्त इव शूरस्य शरव्राता महात्मनः |
७ क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
भ्रमन्तं तत्र तत्रैव दैवेन विनिवारितम् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
भ्रममाणानपश्याम हतेषु रथिषु द्रुतम् ||
११० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
भ्रमराणामिव व्राताः फुल्लद्रुमगणे वने ||
१६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
भ्रमराणामिव व्राताः शलभानामिव व्रजाः |
२२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
भ्रमराणामिव व्रातास्तापय़न्तः स्म तावकान् ||
१०३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
भ्रमरैरिव चाविष्टा द्रोणस्य निशितैः शरैः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २९६
वैशम्पाय़न उवाच
भ्रमरैरुपगीतं च पक्षिभिश्च महाय़शाः ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
भ्रश्यते शीघ्रमैश्वर्यात्प्राणेभ्यः स्वजनादपि ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ७२
वृहदश्व उवाच
भ्रष्टराज्यं श्रिय़ा हीनं क्षुधितं व्यसनाप्लुतम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
भ्रष्टराज्यं श्रिय़ा हीनं श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २७९
द्युमत्सेन उवाच
भ्रष्टराज्यस्त्वहमिति तत एतद्विचारितम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
भ्रष्टश्रीर्विभवभ्रष्टो यन्न शोचसि दुष्करम् |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७०
भीष्म उवाच
भ्रष्टैश्वर्यं पुरा वृत्रमुशना वाक्यमव्रवीत् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४०
भीष्म उवाच
भ्रष्टैश्वर्यास्ततो देवाश्चेरुः पृथ्वीमिति श्रुतिः ||
३ ख
सभा पर्व
अध्याय ३१
वैशम्पाय़न उवाच
भ्राजते स्म तदा राजन्नाकपृष्ठमिवामरैः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय ७७
वृहदश्व उवाच
भ्राजमान इवादित्यो वपुषा पुरुषर्षभ ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय ९४
वैशम्पाय़न उवाच
भ्राजमानं यथादित्यमाय़यौ स्वपुरं प्रति ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६१
सञ्जय़ उवाच
भ्राजमानं श्रिय़ा युक्तं ज्वलन्तमिव तेजसा |
२३ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
भ्राजमानमिवादित्यं वीरलक्ष्म्याभिसंवृतम् |
५ क
सभा पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
भ्राजमाना तथा दिव्या वभार परमं वपुः ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
भ्राजमाना व्यदृश्यन्त जङ्गमाः पर्वता इव ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
भ्राजमाना व्यदृश्यन्त जाम्वूनदमय़ा ध्वजाः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
भ्राजमाना व्यदृश्यन्त मेघा इव सविद्युतः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
भ्राजसे वनमध्ये त्वं विद्युत्सौदामिनी यथा |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
भ्राजसे विद्यया चैव तपसा च दमेन च ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
भ्राजिष्मती दुष्प्रतिप्रेक्षणीय़ा; येषां चमूस्ते विजय़न्ति शत्रून् ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
भ्राजिष्मती दुष्प्रतिप्रेक्षणीय़ा; येषां चमूस्तेऽभिभवन्ति शत्रून् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
भ्राजय़न्तं रणोद्देशं वालसूर्यसमप्रभम् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय २४८
वैशम्पाय़न उवाच
भ्राजय़न्तीं वनोद्देशं नीलाभ्रमिव विद्युतम् ||
९ ख
विराट पर्व
अध्याय ५५
अर्जुन उवाच
भ्रातरं घातय़ित्वा च त्यक्त्वा रणशिरश्च कः |
१४ क
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
भ्रातरं च विगर्हस्व ज्येष्ठं दुर्द्यूतदेविनम् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय २८
काक उवाच
भ्रातरं च हतं दृष्ट्वा निर्जितः सव्यसाचिना |
५८ क
आदि पर्व
अध्याय ४९
जरत्कारुरु उवाच
भ्रातरं चैव मे तस्मात्त्रातुमर्हसि पावकात् ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
अर्जुन उवाच
भ्रातरं धार्मिकं ज्येष्ठं नातिक्रमितुमर्हति ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा भीमसेनेन संय़ुगे |
९१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा राजन्कर्णो व्यथां यय़ौ ||
५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
भ्रातरं निहतं दृष्ट्वा सुषेणः क्रोधमूर्छितः |
४० क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
भ्रातरं पितरं पुत्रं सखाय़ं च जनाधिप ||
११ ग
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
भ्रातरं मातुरासाद्य शल्यं मद्रजनाधिपम् |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय ४९
सूत उवाच
भ्रातरं मे पुरस्कृत्य प्रजापतिमुपागमन् ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
भ्रातरं राजराजानं महेश्वरसखं प्रभुम् |
२३ क