वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
मणिप्रवालप्रस्तारां पादपैरुपशोभिताम् ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
मणिप्रवेकान्सुमनोहरांश्च; यथा भवेय़ुर्धनदस्य राज्ञः ||
६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
कृष्ण उवाच
मणिप्रवेकोत्तमवज्रहाटकै; रलङ्कृतं चास्य वराङ्गभूषणम् |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
मणिभद्रं स तत्रस्थं देवतानां महाद्युतिम् |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
१०
नारद उवाच
मणिभद्रोऽथ धनदः श्वेतभद्रश्च गुह्यकः ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
मणिभूमौ निविष्टाश्च पुष्करिण्यस्तथैव च ||
३२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
मणिमण्डलकैश्चित्रं जातरूपसमावृतम् ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय
९४
लोमश उवाच
मणिमत्यां पुरि पुरा वातापिस्तस्य चानुजः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
मणिमन्तं समासाद्य व्रह्मचारी समाहितः |
१०९ क
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
मणिमानपि सङ्क्रुद्धः प्रगृह्य महतीं गदाम् |
५७ क
सभा पर्व
अध्याय
९
नारद उवाच
मणिमान्कुण्डलधरः कर्कोटकधनञ्जय़ौ ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
मणिमान्दण्डधारश्च राजानौ युद्धदुर्मदौ |
६६ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
मणिमान्नाम राजर्षिः स वभूव नराधिपः ||
४२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
मणिमुक्ताप्रवालं च सुवर्णं रजतं तथा |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
मणिमुक्ताप्रवालैश्च भूषितं वैद्युतप्रभम् |
६७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
मणिमुक्ताप्रवालैश्च महार्हैरुपशोभितम् ||
५२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
मणिमुक्तामय़ैश्चान्यैः पुण्यगन्धैस्तथौषधैः ||
३७ ख
सभा पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
मणिरत्नचितां तां तु केचिदभ्येत्य पार्थिवाः |
३० क
विराट पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
मणिरत्नमय़ाश्चान्याः प्रासादमुपधारय़न् ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय
५३
युधिष्ठिर उवाच
मणिर्हारोत्तरः श्रीमान्कनकोत्तमभूषणः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१२
वैशम्पाय़न उवाच
मणिविद्रुमचित्राणि ज्वलिताग्निप्रभाणि च ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५५
कुशिक उवाच
मणिविद्रुमपादानां पर्यङ्कानां च दर्शनम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२६५
मार्कण्डेय़ उवाच
मणिशेषाभ्यलङ्कारां रुदतीं च पतिव्रताम् ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
मणिस्तम्भसहस्राढ्यं गन्धर्वनगरोपमम् |
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०१
नारद उवाच
मणिस्वस्तिकचक्राङ्काः कमण्डलुकलक्षणाः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
मणिहेमविचित्राङ्गं सुध्वजं सुपताकिनम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
मणी वोष्ट्रस्य लम्वेते प्रिय़ौ वत्सतरौ मम |
१२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
मणी सूत्र इव प्रोतौ द्रष्टासि निहतौ मय़ा ||
६४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
मणीनष्टौ च वैडूर्यान्हेमवद्धान्महाप्रभान् ||
३९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
मणीन्हेम च विभ्रत्यः सर्वा वै सूक्ष्मवाससः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
मणीन्हेम च विभ्रत्यो नृत्यगीतविशारदाः ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११०
गालव उवाच
मणीव जात्यौ पश्यामि चक्षुषी तेऽहमण्डज ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
मण्डलं तु समालोक्य व्यूहं परमदारुणम् |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
मण्डलं मनुजश्रेष्ठ नानाशस्त्रसमाकुलम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
मण्डलं सर्वतः श्लिष्टं रथिनामुग्रधन्विनाम् |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
मण्डलः सुमहाव्यूहो दुर्भेद्योऽमित्रघातिनाम् |
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
मण्डलस्था च या चिन्ता राजन्द्वादशराजिका ||
७० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
मण्डलानां विभागेषु गतप्रत्यागतेषु च |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
मण्डलानि च वुध्येथाः परेषामात्मनस्तथा |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
मण्डलानि ततश्चक्रे गतप्रत्यागतानि च |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
मण्डलानि ततस्तौ च विचरन्तौ महारणे |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
मण्डलानि विचित्राणि गतप्रत्यागतानि च |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
मण्डलानि विचित्राणि गतप्रत्यागतानि च |
५३ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
मण्डलानि विचित्राणि चरतोर्नृपभीमय़ोः |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५७
वासुदेव उवाच
मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
मण्डलानि विचित्राणि यमकानीतराणि च |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
मण्डलानि विचित्राणि विचेरुस्ते मुहुर्मुहुः ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
मण्डलानि विचित्राणि स्थानानि विविधानि च ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५४
सञ्जय़ उवाच
मण्डलान्येव चापानि व्यदृश्यन्त जनाधिप ||
६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
मण्डलावर्तमार्गेषु गदाविहरणेषु च |
९ क