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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
सञ्जय़ उवाच
भारद्वाजो रणे विद्धो युय़ुधानेन सत्वरम् |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९३
सञ्जय़ उवाच
भारद्वाजोऽन्तरप्रेक्षी प्रेषय़ामास संय़ुगे ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
भारद्वाजोऽपि सर्वेषामाचार्यः कृप एव च |
१४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
भारद्वाजोऽव्रवीद्वाक्यं तावकानां महारथान् ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
भीष्म उवाच
भारभृत्कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः |
१०४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
भारमेतं विनेष्यामि पाण्डवानां महात्मनाम् ||
६९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २८
सञ्जय़ उवाच
भारश्चाप्यतिभारश्च शल्यानां च प्रतिक्रिय़ा ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०२
भीष्म उवाच
भारार्तामपकृष्टां च दुःखितां संनिमज्जतीम् ||
१० ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३२८
श्रीभगवानु उवाच
भारावतरणार्थं हि प्रविष्टौ मानुषीं तनुम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
भारुण्डसदृशा ह्येते निपतन्ति प्रमाद्यतः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९४
वामदेव उवाच
भारुण्डसदृशा ह्येते निपतन्ति प्रमाद्यतः ||
३६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
भारुण्डा नाम शकुनास्तीक्ष्णतुण्डा महावलाः |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
भारो हि धार्तराष्ट्रेण त्वय़ि सर्वः समर्पितः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९२
उतथ्य उवाच
भारो हि सुमहांस्तात राज्यं नाम सुदुष्करम् ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४१
भीष्म उवाच
भार्गवं परिपप्रच्छ प्रणतो भरतर्षभ ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
भार्गवः प्रददौ यस्मै परमास्त्रं महात्मने |
३७ क
आदि पर्व
अध्याय १७०
गन्धर्व उवाच
भार्गवस्तु मुनिर्मेने सर्वलोकपराभवम् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
भीष्म उवाच
भार्गवस्तु समुत्तस्थौ स्वय़मेव तपोधनः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२४
धृतराष्ट्र उवाच
भार्गवस्त्वाह धर्मज्ञः प्रह्रादस्य महात्मनः |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
भार्गवस्य मय़ा सार्धं पुनर्युद्धमवर्तत ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
भार्गवा वारुणाः सर्वे येषां वंशे भवानपि ||
३७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८५
अग्निरु उवाच
भार्गवाङ्गिरसौ लोके लोकसन्तानलक्षणौ ||
३४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
भार्गवाच्च्यवनाच्चापि वेदानङ्गोपवृंहितान् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय २४
व्रह्मो उवाच
भार्गवाणां कुले जातो जमदग्निर्महातपाः |
१३१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
भार्गवास्त्रं च पश्यामि विचरन्तं समन्ततः |
६ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
भार्गवास्त्रं महाघोरं दृष्ट्वा तत्र सभीरितम् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५३
भीष्म उवाच
भार्गवेणापि राजेन्द्र जनकस्य निवेशने |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २०३
गुरुरु उवाच
भार्गवो नीतिशास्त्रं च जगाद जगतो हितम् ||
१८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २३
गान्धार्यु उवाच
भार्गवो वा महावीर्यस्तथा द्रोणोऽपि माधव ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २४
दुर्योधन उवाच
भार्गवोऽप्यददात्सर्वं धनुर्वेदं महात्मने |
१५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९५
वैशम्पाय़न उवाच
भार्यया तु स संमन्त्र्य सह रात्रौ सुधर्मय़ा |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १०९
वैशम्पाय़न उवाच
भार्यया सह तेजस्वी मृगरूपेण सङ्गतः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
भार्या कल्माषपादस्य भर्तुः प्रिय़चिकीर्षय़ा ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
भार्या च पतिशुश्रूषां न करिष्यति काचन ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
भार्या च मे सभां नीता प्राणेभ्योऽपि गरीय़सी ||
३३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
युधिष्ठिर उवाच
भार्या चास्य महाभागा तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४२
भीष्म उवाच
भार्या चित्ररथस्याथ वभूवाङ्गेश्वरस्य वै ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
भार्या चोढा त्वय़ा राजन्दशार्णाधिपतेः सुता ||
३ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १८९
भीष्म उवाच
भार्या तु तस्य राजेन्द्र द्रुपदस्य महीपतेः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८७
पराशर उवाच
भार्या दासाश्च पुत्राश्च स्वमर्थमनुय़ुञ्जते ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
भार्या देशोऽथ मित्राणि पुत्रसम्वन्धिवान्धवाः |
९४ क
आदि पर्व
अध्याय १४६
व्राह्मण्यु उवाच
भार्या पुत्रोऽथ दुहिता सर्वमात्मार्थमिष्यते |
३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
भार्या मता माद्रवतीसुतस्य; ज्येष्ठस्य सेय़ं कमलाय़ताक्षी ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
सत्यवानु उवाच
भार्या माता पिता पुत्रो हन्यते पुरुषे हते |
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
भार्या मूलं त्रिवर्गस्य भार्या मित्रं मरिष्यतः ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय २६२
मार्कण्डेय़ उवाच
भार्या मे भव सुश्रोणि तापसं त्यज राघवम् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २५१
जय़द्रथ उवाच
भार्या मे भव सुश्रोणि त्यजैनान्सुखमाप्नुहि |
१८ क
वन पर्व
अध्याय २६५
मार्कण्डेय़ उवाच
भार्या मे भव सुश्रोणि यथा मन्दोदरी तथा ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६७
दुःषन्त उवाच
भार्या मे भव सुश्रोणि व्रूहि किं करवाणि ते ||
१ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २४
गान्धार्यु उवाच
भार्या यूपध्वजस्यैषा करसंमितमध्यमा |
१६ क