chevron_left  फल्गुनाद्वासुदेवाद्वाarrow_drop_down
शल्य पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
फल्गुनाद्वासुदेवाद्वा पाञ्चालेभ्योऽथ वा पुनः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६३
नारद उवाच
फल्गुनीपूर्वसमय़े व्राह्मणानामुपोषितः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८९
भीष्म उवाच
फल्गुनीषु ददच्छ्राद्धं सुभगः श्राद्धदो भवेत् |
६ क
वन पर्व
अध्याय ४६
धृतराष्ट्र उवाच
फल्गुनेन सहाय़ार्थे वह्नेर्दामोदरेण च ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
फल्गुनो गात्रसंरुद्धो देवदेवेन भारत ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ७
सञ्जय़ उवाच
फल्गुशेषा महावाहो तृणैस्तुल्या मता मम ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
फाणितासवसंय़ुक्तैर्मनुष्याणां विधीय़ते ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
फाल्गुनिं समरे क्रुद्धो विव्याध वहुभिः शरैः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
फाल्गुनिर्द्विषतां मध्ये विव्याध परमेषुणा ||
१० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
फुल्लता पङ्कजेनेव वक्त्रेणाभ्युत्स्मय़न्वली |
१९ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
फुल्लपद्मपलाशाक्ष्यास्तमोध्वस्त इवांशुमान् ||
७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय १८
गान्धार्यु उवाच
फुल्लपद्मप्रकाशानि पुण्डरीकाक्ष योषिताम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
फुल्लपद्मविचित्राणि पुष्पितानि वनानि च |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
फुल्लपद्मविशालाक्षं वालं पश्यामि भारत ||
८३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९८
सञ्जय़ उवाच
फुल्लाशोकनिभः पार्थः शुशुभे रणमूर्धनि ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
फेनं नोपय़ुङ्क्ते ||
५० घ
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
फेनधर्मा महाराज फलधर्मा तथैव च ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
फेनपा ऋषय़श्चैव तं धर्मं प्रतिपेदिरे |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १००
नारद उवाच
फेनपा नाम नाम्ना ते फेनाहाराश्च मातले |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ५८
वैशम्पाय़न उवाच
फेनपांश्च तथा वत्सान्न दुहन्ति स्म मानवाः |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
फेनपात्रोपमे देहे जीवे शकुनिवत्स्थिते |
६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२९
महेश्वर उवाच
फेनपानामृषीणां यो धर्मो धर्मविदां सदा |
३६ क
वन पर्व
अध्याय १०८
लोमश उवाच
फेनपुञ्जाकुलजला हंसानामिव पङ्क्तय़ः ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
फेनमपि भवान्न पातुमर्हतीति ||
४९ घ
वन पर्व
अध्याय १६६
अर्जुन उवाच
फेनवत्यः प्रकीर्णाश्च संहताश्च समुच्छ्रिताः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३
व्यास उवाच
फेनाय़मानाः कूपाश्च नर्दन्ति वृषभा इव |
३२ ख