उद्योग पर्व
अध्याय
८६
दुर्योधन उवाच
मंस्यत्यधोक्षजो राजन्भय़ादर्चति मामिति ||
३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
७
सञ्जय़ उवाच
मकरस्य तु तुण्डे वै कर्णो राजन्व्यवस्थितः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
मकरा इव राजेन्द्र समुद्धततरङ्गिणीम् |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
मकराश्चात्र दृश्यन्ते जले मग्ना इवाद्रय़ः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
मक्षिकाणां च सङ्घाता अनुगच्छन्ति कौरवान् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४२
युधिष्ठिर उवाच
मक्षिकान्मशकान्दंशान्व्याघ्रान्सिंहान्सरीसृपान् |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
मक्षिकामशकादीनां वपुर्धारय़तेऽपि च ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
मक्षिकासङ्घवशगो वहून्मासान्भवत्युत |
९३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
मखे निर्मथ्यमानाद्वा शमीगर्भाद्धुताशनः ||
६१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९०
भीष्म उवाच
मखेषु च समन्त्रेषु भवन्त्यवभृथाप्लुताः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
मखेष्वनभिसन्त्यज्य नास्तिक्यमभिजल्पसि |
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१७
कृष्ण उवाच
मगधानुपचक्राम भगवांश्चण्डकौशिकः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
मगधेषु जय़त्सेनः श्रीमानासीत्स पार्थिवः |
४६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
मगा व्राह्मणभूय़िष्ठाः स्वकर्मनिरता नृप |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
मगाश्च मशकाश्चैव मानसा मन्दगास्तथा ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
मग्नः स्वप्ने च मनसा त्रिर्जपेदघमर्षणम् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
युधिष्ठिर उवाच
मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे किं श्रेय़ः पुरुषस्य हि |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे धृतिः श्रेय़स्करी नृप ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
युधिष्ठिर उवाच
मग्नस्य हि परे ज्ञाने किं नु दुःखतरं भवेत् ||
७९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३६
व्रह्मो उवाच
मग्नास्तमसि दुर्वृत्ताः स्वकर्मकृतलक्षणाः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
मघवा वाग्विदां श्रेष्ठं पप्रच्छेदं वृहस्पतिम् ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
मघवानपि देवेशो रथमारुह्य सुप्रभम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१८०
वैशम्पाय़न उवाच
मघवानिव पौलोम्या सहितः सत्यभामय़ा |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६
सञ्जय़ उवाच
मघवान्समभिक्रुद्धः सहसा दानवेष्विव ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
मघाविषय़गः सोमस्तद्दिनं प्रत्यपद्यत |
२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६३
नारद उवाच
मघासु तिलपूर्णानि वर्धमानानि मानवः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
मघासु सर्पिषा युक्तं पाय़सं दक्षिणाय़ने ||
१२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३
व्यास उवाच
मघास्वङ्गारको वक्रः श्रवणे च वृहस्पतिः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
मङ्गलाचारसम्पन्नः कृतशौचः प्रय़त्नवान् ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२४
भीष्म उवाच
मङ्गलाचारय़ुक्ताश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ||
८६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२१
श्रीरु उवाच
मङ्गलानपि चापश्यन्व्राह्मणांश्चाप्यपूजय़न् ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
मङ्गलानि च कुर्वन्तः शमय़न्त्यहितान्यपि ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४७
वासुदेव उवाच
मङ्गलानि च सर्वाणि कारय़ामास चाभिभूः ||
२१ ग
वन पर्व
अध्याय
२१५
मार्कण्डेय़ उवाच
मङ्गलानि च सर्वाणि कौमाराणि त्रय़ोदश |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
मातो उवाच
मङ्गलानि पुरस्कृत्य व्राह्मणैश्चेश्वरैः सह ||
२७ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०१
शुक्र उवाच
मङ्गलार्थं स तेनास्य प्रीतो भवति दैत्यप ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
मङ्गलालम्भनं कृत्वा आत्मानमवलोक्य च |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
मङ्गलालम्भनं चैव शरीरस्य प्रतिक्रिय़ा |
६६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
मङ्गलालम्भनं योगः श्रुतमुत्थानमार्जवम् |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६८
भीष्म उवाच
मङ्गलाय़तनं देव्यस्तस्मात्पूज्याः सदैव हि ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०२
नारद उवाच
मङ्गलैः स्तुतिभिश्चापि विजय़प्रतिसंहितैः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२४
भीष्म उवाच
मङ्गलैर्वहुभिर्युक्ता भवामि निय़ता सदा ||
१६ ख
सभा पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
मङ्गलैर्वहुभिर्होमैः पुत्रकामाभिरिष्टिभिः |
२१ क
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
मङ्गल्यं मङ्गलं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८
भीष्म उवाच
मङ्गल्यरूपा रुचिरा दिव्यजीमूतनिःस्वनाः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
मङ्गल्यशव्दाः शकुना वदन्ति; हंसाः क्रौञ्चाः शतपत्राश्च चाषाः |
११ क
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
मङ्गल्यस्याप्रय़ोगं च प्रसङ्गं विषय़ेषु च |
९८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
मङ्गल्याः पुण्यनिर्घोषा वाचः शृण्वंश्च सूनृताः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
मङ्गल्यानि च गीतानि न गाय़न्ति पठन्ति च |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
मङ्गल्यान्पक्षिणश्चैव यच्चान्यदपि पूजितम् |
२१ क