chevron_left  मौलश्चarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १२१
भीष्म उवाच
मौलश्च नरशार्दूल शास्त्रोक्तश्च तथापरः ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
मौलापि पुरुषव्याघ्र किमु नाना समुत्थिता ||
१८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
मौलीधराश्च राजेन्द्र तथाकुञ्चितमूर्धजाः |
२५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
मौष्टिकानां मलं शण्डाः शण्डानां राजय़ाजकाः ||
७० ख
मौसल पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
मौसलं ते परिश्रुत्य दुःखशोकसमन्विताः |
११ क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
मौसलं पर्व च ततो घोरं समनुवर्ण्यते |
६८ क
मौसल पर्व
अध्याय ९
अर्जुन उवाच
मौसले वृष्णिवीराणां विनाशो व्रह्मशापजः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
म्रिय़तां तावुभौ क्षिप्रं स्यातां वा वैरिणावुभौ ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
म्रिय़ते याचमानो वै तमनु म्रिय़ते ददत् |
५ क
शल्य पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
म्रिय़ते रुदतां मध्ये ज्ञातीनां न स पूरुषः ||
३२ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
म्रिय़माणे दुराधर्षे भीमो राजानमव्रवीत् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
म्रिय़माणौ च सम्प्रेक्ष्य मङ्किस्तत्राव्रवीदिदम् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
म्रिय़ेतापि न भज्येत नैव जह्यात्स्वकं मतम् |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११९
नारद उवाच
म्लानस्रग्भ्रष्टविज्ञानः प्रभ्रष्टमुकुटाङ्गदः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७७
भृगुरु उवाच
म्लाय़ते चैव शीते न स्पर्शस्तेनात्र विद्यते ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
म्लेच्छभूतं जगत्सर्वं निश्क्रिय़ं यज्ञवर्जितम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
म्लेच्छभूतं जगत्सर्वं भविष्यति युधिष्ठिर |
४५ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
म्लेच्छाः क्रूराः सर्वभक्षा दारुणाः सर्वकर्मसु |
५२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३०
सञ्जय़ उवाच
म्लेच्छाः स्वसञ्ज्ञानिय़ता नानुक्त इतरो जनः ||
८० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४
नारद उवाच
म्लेच्छाचार्याश्च राजानः प्राच्योदीच्याश्च भारत ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
म्लेच्छानशातय़त्सर्वान्समेतानस्त्रमाय़या ||
४४ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
म्लेच्छानां पापकर्तॄणां हिमवद्दुर्गवासिनाम् ||
३७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
म्लेच्छाश्च नानाय़ुधवीर्यवन्तः; समागताः पाण्डवार्थे निविष्टाः ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
म्लेच्छाश्च पार्वतीय़ाश्च यवनाश्च निपातिताः ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५१
सञ्जय़ उवाच
म्लेच्छाश्च पार्वतीय़ाश्च सागरानूपवासिनः |
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
म्लेच्छाश्च वहुसाहस्राः किमन्यद्भागधेय़तः ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
म्लेच्छाश्च वहुसाहस्राः शकाश्च यवनैः सह |
१८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
वैशम्पाय़न उवाच
म्लेच्छाश्चान्ये वहुविधाः पूर्वं विनिकृता रणे ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
म्लेच्छाश्चार्याश्च ये तत्र ददृशुः शुश्रुवुस्तदा |
१०३ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
म्लेच्छीभूतं जगत्सर्वं भविष्यति च भारत |
३७ क
वन पर्व
अध्याय २६६
मार्कण्डेय़ उवाच
मय़स्य किल दैत्यस्य तदासीद्वेश्म राघव |
४० क
आदि पर्व
अध्याय २
सूत उवाच
मय़स्य मोक्षो ज्वलनाद्भुजङ्गस्य च मोक्षणम् |
९४ ख
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
मय़ा किल रणे युद्धं काङ्क्षमाणः स सौभराट् ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
मय़ा कुरूणां परिपाल्यमाहवे; वलं यथा तेन महात्मना तथा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा कृतं सुरश्रेष्ठा यावत्कल्पक्षय़ादिति |
६० ख
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
मय़ा कृतान्यकार्याणि तानि मे क्षन्तुमर्हसि ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
मय़ा कृत्यमिति जानामि शल्य; प्रय़ाहि तस्माद्द्विषतामनीकम् ||
५० ख
द्रोण पर्व
अध्याय २
कर्ण उवाच
मय़ा कृत्यमिति जानामि सूत; तस्माच्छत्रून्धार्तराष्ट्रस्य जेष्ये ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
मय़ा क्रतुशतैरिष्टं वहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
मय़ा क्रुद्देन समरे पाण्डवार्थे निपातिताम् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
मय़ा क्षुद्रेण निकृता पापेनाकृतवुद्धिना ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८१
युधिष्ठिर उवाच
मय़ा गवां पुरीषं वै श्रिय़ा जुष्टमिति श्रुतम् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३६
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा गुरुप्रसादेन दुर्विज्ञेय़ोऽकृतात्मभिः |
५७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा गोकर्णमासाद्य तपस्तप्त्वा शतं समाः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १
काल उवाच
मय़ा च तत्कृतं कर्म येनाय़ं मे मृतः सुतः |
७२ क
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा च दुष्पुत्रवशानुगेन; यथा कुरूणामय़मन्तकालः ||
२४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ९
सञ्जय़ उवाच
मय़ा च पापकर्मासौ धृष्टद्युम्नो महीपते |
५१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७५
होत्रवाहन उवाच
मय़ा च प्रत्यभिज्ञाता वंशस्य परिकीर्तनात् |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच
मय़ा च भवतां सम्यक्छुश्रूषा या कृतानघाः |
३ क
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
मय़ा च विप्र दत्तोऽय़ं वरस्ते व्रह्मरूपिणा |
४१ क