chevron_left  मिषतःarrow_drop_down
आदि पर्व
अध्याय १९६
कर्ण उवाच
मिषतः सर्वलोकस्य स्थास्यते त्वय़ि तद्ध्रुवम् |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३९
सञ्जय़ उवाच
मिषतस्ते महावाहो जेष्यामि युधि कौरवान् |
३३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
मिषतां पाण्डवेय़ानां न तत्संस्मर्तुमिच्छसि ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
मिषतां पाण्डुपुत्राणां न तस्य स्मर्तुमर्हसि ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
मिषतां पाण्डुपुत्राणां पाञ्चालानां च पश्यताम् |
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
मिषतां योधमुख्यानां सैन्धवो विनिपातितः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
मिषतां सर्वभूतानामुन्ममाथ महार्णवम् ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
मिषतां सर्वसैन्यानां त्वदीय़ानां विशां पते ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
मिषतां सर्वसैन्यानां द्रोणानीकमुपाद्रवन् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
मिषतां सर्वसैन्यानामनय़द्यमसादनम् ||
३२ ख
मौसल पर्व
अध्याय ८
वैशम्पाय़न उवाच
मिषतां सर्वय़ोधानां ततस्ताः प्रमदोत्तमाः |
५७ क
वन पर्व
अध्याय १२३
लोमश उवाच
मिषतो देवराजस्य सत्यमेतद्व्रवीमि वाम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
मिषतो देवलस्यापि ततोऽर्धं हृतवानहम् |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२०
सञ्जय़ उवाच
मिषतो भीमसेनस्य सात्वतस्य च भारत ||
५८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
मिषतो भीमसेनस्य हैडिम्वेः पार्षतस्य च |
११५ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
मिषतो वारय़िष्यामि सर्वलोकस्य पश्यतः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
मीनकूर्मसमूहानां नानाशस्त्रासिपाणिनाम् |
४६ क
आदि पर्व
अध्याय ५७
वैशम्पाय़न उवाच
मीनभावमनुप्राप्ता वभूव यमुनाचरी ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५६
भीष्म उवाच
मीमांसित्वोभय़ं देवाः सममन्नमकल्पय़न् ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६३
सञ्जय़ उवाच
मुक्तं मुक्तं द्रोणचापात्तज्जघान धनञ्जय़ः ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३८
जनमेजय़ उवाच
मुक्तः कथं चास्य शिरो लग्नं केन च हेतुना ||
८ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
मुक्तः कथञ्चिद्धर्मात्मन्व्यग्रस्य कृतवर्मणः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९६
जनमेजय़ उवाच
मुक्तः शापात्ततः क्रोधो धर्मो ह्यासीद्युधिष्ठिरः ||
१४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
मुक्तकेशा विकवचा विरथाश्छिन्नकार्मुकाः |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
मुक्तकेशा विकवचा विरथाश्छिन्नकार्मुकाः |
७७ क
विराट पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
मुक्तकेशा व्यदृश्यन्त स्थिताः प्राञ्जलय़स्तदा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
मुक्तमात्रे ततस्तस्मिन्रूपाण्यासन्सहस्रशः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
मुक्तरागश्चराम्येकः पदे परमके स्थितः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
मुक्तवान्दानवेन्द्राणां पराभावाय़ भारत ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
मुक्तशस्त्रं परावृत्तं पलाय़नपराय़णम् |
३ क
आदि पर्व
अध्याय १७३
गन्धर्व उवाच
मुक्तशापश्च राजर्षिः कालेन महता ततः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
युधिष्ठिर उवाच
मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
मुक्तश्च विविधैः सङ्गैस्तस्य प्रेत्य महत्फलम् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मुक्तश्च व्यसनादस्मात्सौम्याहमपि नाम ते |
७९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
मुक्तश्चास्म्यवशः पापात्ततो दुःखविनाशनः |
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
भीष्म उवाच
मुक्तसङ्गः स्थितो राज्ये विशिष्टोऽन्यैस्त्रिदण्डिभिः ||
३७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७७
भीष्म उवाच
मुक्ता वीतभय़ा लोके चरन्ति सुखिनो नराः |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ६१
सञ्जय़ उवाच
मुक्ता वीरक्षय़ादस्मात्सङ्ग्रामान्निहतद्विषः |
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
मुक्ता वीरक्षय़ादस्मात्सङ्ग्रामान्निहतद्विषः |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६९
सञ्जय़ उवाच
मुक्ता वीरक्षय़ादस्मात्सङ्ग्रामाल्लोमहर्षणात् |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय १८०
वैशम्पाय़न उवाच
मुक्ता हि तस्माज्जतुवेश्मदाहा; न्मय़ा श्रुताः पाण्डुसुताः पृथा च ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
मुक्तांश्चावसथे सक्तांस्तेनासि हरिणः कृशः ||
३२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
मुक्ताः पर्यपतन्राजन्मृद्नन्तः शिविरे जनम् ||
८९ ख
आदि पर्व
अध्याय १२४
वैशम्पाय़न उवाच
मुक्ताजालपरिक्षिप्तं वैडूर्यमणिभूषितम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २०
भीष्म उवाच
मुक्ताजालपरिक्षिप्तैर्मणिरत्नविभूषितैः |
३७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
मुक्ताजालप्रतिच्छन्नान्प्रैषीत्कर्णरथं प्रति ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२१
श्रीभगवानु उवाच
मुक्तानां तु गतिर्व्रह्मन्क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः |
३९ क
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
मुक्तान्हव्यवहाच्चैनान्संय़ुक्तान्द्रुपदेन च ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
मुक्तावज्रमणिस्वर्णैर्भूषितं तदय़स्मय़म् |
५ क