शान्ति पर्व
अध्याय
२६३
भीष्म उवाच
मय़ा स्नेहमविज्ञाय़ तत्र मे क्षन्तुमर्हसि ||
५० ख
वन पर्व
अध्याय
१९
वासुदेव उवाच
मय़ा स्पर्धन्ति सततं किं नु वक्ष्यामि तानहम् ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
मय़ा हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा; युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
९२
लोमश उवाच
मय़ा हि दृष्टा दैतेय़ा दानवाश्च महीपते |
५ क
वन पर्व
अध्याय
७५
दमय़न्त्यु उवाच
मय़ा हि देवानुत्सृज्य वृतस्त्वं निषधाधिप ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
मय़ा हि राजन्सदिगीश्वरा दिशो; विजित्य सर्वा भवतः कृता वशे |
९४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
मय़ा हि विश्वं यद्व्रह्म त्वच्चरौ संनिवेशितम् |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा हि सुमहत्तप्तं तपः परमदारुणम् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
व्यास उवाच
मय़ा हि सुमहत्तप्तं तपः परमदारुणम् |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
मय़ा हिमवतः शृङ्गमेकेनाध्युषितं चिरम् |
५० क
आदि पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
मय़ा हीय़ं पूर्ववृता भार्यार्थे वरवर्णिनी |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
मय़ा ह्यत्राहितं व्रह्म तप आस्थाय़ दारुणम् |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
शुनःसख उवाच
मय़ा ह्यन्तर्हितानीह विसानीमानि पश्यत |
७८ क
वन पर्व
अध्याय
२७०
मार्कण्डेय़ उवाच
मय़ा ह्यपहृता भार्या सीता नामास्य जानकी |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२
युधिष्ठिर उवाच
मय़ा ह्यवध्या वहवो घातिता राज्यकारणात् |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५०
नारद उवाच
मय़ा ह्युक्तं मृषा भद्रे भविता नेह किञ्चन ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा ह्युत्सृज्य सुहृदः स्वधर्मं स्वजनं तथा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
मय़ा ह्युपाय़ो दृष्टोऽय़ं विचार्य मतिमात्मनः |
५१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा ह्येषा हि ध्रिय़ते पातालस्थेन भोगिना ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
१२२
लोमश उवाच
मय़ाटन्त्येह वल्मीके दृष्टं सत्त्वमभिज्वलत् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
प्रतीप उवाच
मय़ातिवृत्तमेतत्ते यन्मां चोदय़सि प्रिय़म् |
८ क
विराट पर्व
अध्याय
१५
द्रौपद्यु उवाच
मय़ात्र शक्यं किं कर्तुं विराटे धर्मदूषणम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०६
याज्ञवल्क्य उवाच
मय़ादित्यादवाप्तानि यजूंषि मिथिलाधिप ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
मय़ाधितिष्ठता दत्तो दानवेभ्यो महान्वरः ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
मय़ाध्यक्षेण प्रकृतिः सूय़ते सचराचरम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
सञ्जय़ उवाच
मय़ानार्येण संरुद्धो द्रोणात्प्राप्याभय़ं रणे ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ानुशिष्टो भविता सर्वभूतवरप्रदः ||
६९ ग
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ापकृष्टः कौन्तेय़ो मृत्योर्दंष्ट्रान्तरं गतः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
वासुदेव उवाच
मय़ापि च यथा दृष्टो देवदेवः पुरा विभुः |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११३
भीष्म उवाच
मय़ापि चोक्तं तव शास्त्रदृष्ट्या; त्वमत्र युक्तः प्रचरस्व राजन् ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६१
धृतराष्ट्र उवाच
मय़ापि चोक्तास्ते वीरा वचनं धर्मसंहितम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
२८१
सावित्र्यु उवाच
मय़ापि तत्र गन्तव्यमेष धर्मः सनातनः ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
मय़ापि तव कार्त्स्न्येन यथावदनुवर्णितम् |
११३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६७
भीष्म उवाच
मय़ापि भवते सर्वं यथावदुपवर्णितम् ||
१८ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
गरुड उवाच
मय़ापि सुमहत्कर्म कृतं दैतेय़विग्रहे ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ापि हि महावाहो त्वत्प्रिय़ार्थमरिन्दम |
४१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१२
धृतराष्ट्र उवाच
मय़ाप्यवश्यं वक्तव्यं प्रीत्या ते नृपसत्तम ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
मय़ाप्युक्तं यत्क्षमं कौरवाणां; हितं पथ्यं धृतराष्ट्रस्य चैव |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
मय़ाप्युपचितो धर्मस्ततोऽर्धं प्रतिगृह्यताम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
४६
काश्यप उवाच
मय़ाभिपन्नं तं चापि न सर्पो धर्षय़िष्यति ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ाभिपन्नं त्राय़ेरन्वलमास्थाय़ न त्रय़ः ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ाभिपन्नः पूर्वं हि राक्षसोऽय़मिहागतः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
श्रीरु उवाच
मय़ाभिपन्ना ऋध्यन्ते ऋषय़ो देवतास्तथा ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१७
वासुदेव उवाच
मय़ाभिपन्नो दुष्टात्मा ससौभो विनशिष्यति ||
३२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
मय़ाभिभूतः सैनिकानां प्रवर्हा; नसावपश्यन्रुधिरेण प्रदिग्धान् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
मय़ाभिभूतविज्ञाना विचेष्टन्ते न कामतः ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ाभिमन्त्रितः शश्वज्जातवेदाः प्रशंसति |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७०
भीष्म उवाच
मय़ाभिषिक्तो राजेन्द्र यवीय़ानपि धर्मतः |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
मय़ार्थ इति जानाति तेनासि हरिणः कृशः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
५३
नल उवाच
मय़ाशेषं प्रमाणं तु भवन्तस्त्रिदशेश्वराः ||
२१ ख