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शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
मद्राधिपं पत्रिभिरुग्रवेगैः; स्तनान्तरे धर्मसुतो निजघ्ने ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८१
सञ्जय़ उवाच
मद्राधिपं समभित्यज्य सङ्ख्ये; स्वभागमाप्तं तमनन्तकीर्तिः |
१२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
मद्राधिपश्चापि युधिष्ठिरस्य; शरैश्चतुर्भिर्निजघान वाहान् |
२४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
मद्राधिपश्चापि विमूढचेता; स्तूर्णं रथेनापहृतध्वजेन |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
मद्राधिपस्याधिरथिस्तदैवं; वचो निशम्याप्रिय़मप्रतीतः |
१ क
वन पर्व
अध्याय २८३
मार्कण्डेय़ उवाच
मद्राधिपस्याश्वपतेर्मालव्यां सुमहावलम् ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
मद्राधिपो हतः शल्यः शकुनिः सौवलस्तथा |
२५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
मद्रास्त्रिगर्ताः साम्वष्ठाः प्रतीच्योदीच्यवासिनः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
मद्रेशं सादितं दृष्ट्वा सौभाद्रेणाशुगै रणे |
३ क
द्रोण पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
मद्रेशस्तं चतुःषष्ट्या शरैर्विद्ध्वानदद्भृशम् ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २३
सञ्जय़ उवाच
मद्रेश्वर रणे शूर परसैन्यभय़ङ्कर ||
२ ख
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
मद्रेश्वरं समासेदुः पीडय़न्तः समन्ततः ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
मद्रेश्वरः क्षुरप्रेण तदा चिच्छेद मारिष |
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
मद्रेश्वरमवाकीर्य सिंहनादमथानदत् ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११२
सञ्जय़ उवाच
मद्रेश्वरश्च समरे धर्मपुत्रं महारथम् |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७९
सञ्जय़ उवाच
मद्रेश्वरस्तु समरे यमाभ्यां सह सङ्गतः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
मद्रेश्वरो रणे जिष्णुं ताडय़ामास रोषितः ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
मद्रेय़स्तु ततः क्रुद्धो दुर्मुखं दशभिः शरैः |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
मद्वचश्चापि भूय़स्ते वक्तव्यः स सुय़ोधनः |
७ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
मद्वधाय़ श्रुतो ह्येष लोके चाप्यतिविश्रुतः |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय १११
सञ्जय़ उवाच
मद्वधे क्रिय़तां यत्नो मम चेदिच्छसि प्रिय़म् ||
१५ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
मद्वाक्यं नानृतं लोके कश्चित्कुर्यात्समाप्नुहि ||
३९ ख
वन पर्व
अध्याय २३८
वैशम्पाय़न उवाच
मद्वाक्यमेतद्राजेन्द्र यद्येवं न करिष्यसि |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
द्रोण उवाच
मद्वाक्यसमकालं च शिरोऽस्य विनिपात्यताम् |
४८ क
आदि पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
मद्वाक्यसमकालं ते मोक्तव्योऽत्र भवेच्छरः |
५९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३९
वाय़ुरु उवाच
मद्वाक्यान्मुञ्च मे भार्यां कस्माद्वा हृतवानसि ||
१७ घ
वन पर्व
अध्याय १६७
अर्जुन उवाच
मद्वाणैर्वध्यमानास्ते समुद्विग्नाः स्म दानवाः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
मद्वाहुवलसंस्तव्धौ नित्यं पुरुषमानिनौ ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय २८४
कर्ण उवाच
मद्विधस्याय़शस्यं हि न युक्तं प्राणरक्षणम् |
२८ क
आदि पर्व
अध्याय ९२
स्त्र्यु उवाच
मद्विधा मानुषी धात्री न चैवास्तीह काचन ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय १८७
देव उवाच
मद्विधानेन विहिता मम देहविहारिणः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६५
मान्धातो उवाच
मद्विधैश्च कथं स्थाप्याः सर्वे ते दस्युजीविनः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
मद्विनाशात्परिद्यूनाविति मे वर्तते मतिः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
मद्विलापनमेतत्तु प्रतिवुद्धोऽस्मि सन्त्यज ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ५९
वृहदश्व उवाच
मद्विहीना त्विय़ं गच्छेत्कदाचित्स्वजनं प्रति ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४७
भीष्म उवाच
मद्विय़ोगेन सुश्रोणि विय़ुक्ता धर्मसेतुना ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
मदय़न्ती जगामर्षिं वसिष्ठमिति नः श्रुतम् ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५६
सौदास उवाच
मदय़न्तीं च दृष्ट्वा सोऽज्ञापय़त्स्वं प्रय़ोजनम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२६
व्यास उवाच
मदय़न्तीं प्रिय़ां दत्त्वा तय़ा सह दिवं गतः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
मधु ईशन्तस्तदा सञ्चरन्ति घोरम् |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०५
गुरुरु उवाच
मधु तैलं पय़ः सर्पिर्मांसानि लवणं गुडः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
मधु पश्यति संमोहात्प्रपातं नानुपश्यति ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
मधु पश्यसि दुर्वुद्धे प्रपातं नानुपश्यसि ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय २२५
वैशम्पाय़न उवाच
मधु प्रपश्यन्ति न तु प्रपातं; वृकोदरं चैव धनञ्जय़ं च ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
मधु मांसं च ये नित्यं वर्जय़न्तीह धार्मिकाः |
७३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
मधु मांसं च ये नित्यं वर्जय़न्तीह मानवाः |
२१ क
स्त्री पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
मधु यः केवलं दृष्ट्वा प्रपातं नानुपश्यति |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
मधु लिप्सुर्हि नापश्यं प्रपातमिदमीदृशम् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
मधु वै माध्विको लव्ध्वा प्रपातं नाववुध्यते |
४ क
वन पर्व
अध्याय १९४
मार्कण्डेय़ उवाच
मधुकैटभय़ो राजञ्शिरसी मधुसूदनः |
३० ख