उद्योग पर्व
अध्याय
७४
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा प्रणुन्नान्मातङ्गान्रथिनः सादिनस्तथा ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
मय़ा प्रतिज्ञा महती जय़द्रथवधे कृता |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३५२
नाग उवाच
मय़ा प्रत्यभ्यनुज्ञातस्ततो यास्यसि व्राह्मण ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४१
च्यवन उवाच
मय़ा प्रमथितः सद्यः सोमं पास्यसि वै मखे ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२८
श्रीभगवानु उवाच
मय़ा प्रमाणं हि कृतं लोकः समनुवर्तते ||
२२ ग
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
मय़ा प्रलव्धो व्रह्मर्षिरनागाः सुमहातपाः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा प्रशमिते पश्चात्त्वमेष्यसि वनात्पुनः |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
मय़ा प्रसन्नेन तवार्जुनेदं; रूपं परं दर्शितमात्मय़ोगात् |
४७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
मय़ा प्रेम्णा समाख्यातं न भीः कार्या तपोधनाः ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३००
याज्ञवल्क्य उवाच
मय़ा प्रोक्तानुपूर्व्येण संहारमपि मे शृणु ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८५
भीष्म उवाच
मय़ा प्रय़ुक्तं जज्वाल युगान्तमिव दर्शय़त् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४४
कर्ण उवाच
मय़ा प्लवेन सङ्ग्रामं तितीर्षन्ति दुरत्ययम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
मय़ा भरतशार्दूल किं भूय़ः श्रोतुमिच्छसि ||
९३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
मय़ा भवतु निर्वृत्तं वैरमादित्यनन्दन |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२९०
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा मन्त्रवलं ज्ञातुमाहूतस्त्वं विभावसो |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
मय़ा यज्जय़लुव्धेन पुरा तप्तं महत्तपः ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
गरुड उवाच
मय़ा योऽहं विशिष्टः सन्वहामीमं सवान्धवम् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
३९
सूत उवाच
मय़ा वञ्चय़ितव्योऽसौ क उपाय़ो भवेदिति ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
मय़ा वध्योऽभविष्यत्स भैमसेनिर्घटोत्कचः ||
२५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा वरय़ितव्योऽभूच्छाल्वस्तस्मिन्स्वय़ंवरे |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय
३६
सूत उवाच
मय़ा विद्धो मृगो नष्टः कच्चित्त्वं दृष्टवानसि ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
मय़ा विनाशलिङ्गानि स्वप्ने दृष्टानि तस्य वै ||
६३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
मय़ा विनिर्जिताः सर्वे मरुतश्च शचीपते ||
७६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७९
भीष्म उवाच
मय़ा विनिहतं देवी रोदतामद्य पार्थिव ||
४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा विनिहतं सङ्ख्ये प्रेक्षते दुर्मरं वत ||
४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६१
वासुदेव उवाच
मय़ा विमुक्तः कौन्तेय़ त्वय़्यद्य कृतकर्मणि ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
मय़ा वै श्राविते वाक्ये जहास धृतराष्ट्रजः |
१४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३३
व्राह्मण उवाच
मय़ा व्याप्तमिदं सर्वं यत्किञ्चिज्जगतीगतम् ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
मय़ा शत्रौ हते कस्मात्पापे धर्मं न मन्यसे ||
३८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
मय़ा शाल्वपतिः पूर्वं मनसाभिवृतो वरः |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
मय़ा शाल्वपतिर्वीर मनसाभिवृतः पतिः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
मय़ा श्रुतं च ते युद्धं जामदग्न्येन वै सह ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
मय़ा श्रुतमिदं पूर्वं पुराणे भृगुनन्दन |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
मय़ा श्रुतश्च द्रोणेन चक्रव्यूहो विनिर्मितः |
२० क
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा स पुरुषव्याघ्रो जिष्णुः सत्यपराक्रमः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
मय़ा संमन्त्र्य पश्चाच्च न हिंस्याः सचिवास्त्वय़ा |
३८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३४
उमो उवाच
मय़ा संमानिताश्चैव भविष्यन्ति सरिद्वराः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
मय़ा संश्लेषिता भूमिरद्भिर्व्योम च वाय़ुना |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा समुद्यतान्पाशान्वारुणाननिवारणान् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा सम्वन्धकं तुल्यमिति राजन्पुनः पुनः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
मय़ा सराजका वाणैर्नुन्ना नङ्क्ष्यन्ति सैन्धवाः ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
२३७
दुर्योधन उवाच
मय़ा सह महावाहो कृतश्चोभय़तः क्षय़ः ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा सहाकरोद्विद्यां गुरोः श्राम्यन्समाहितः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा साक्षान्महादेवो दृष्ट इत्येव भारत ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
मय़ा सार्धं महावाहो धार्तराष्ट्रेण चाभिभो ||
४० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३८
वासुदेव उवाच
मय़ा सार्धमितो यातमद्य त्वां तात पाण्डवाः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
मय़ा सृष्टः पुरा व्रह्मा मद्यज्ञमय़जत्स्वय़म् |
५७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
मय़ा सैन्धवको राजा हतः स्वाञ्शोचय़िष्यति ||
४७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा सौभपतिः पूर्वं मनसाभिवृतः पतिः |
४८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
मय़ा स्नेहपरीतेन न विमृष्टः कुलान्वय़ः ||
४२ ख