उद्योग पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
मा वो वधीदर्जुनो देवगुप्तः; क्षिप्रं याचध्वं पाण्डवं लोकवीरम् ||
५८ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८३
वैशम्पाय़न उवाच
मा वो विद्युः पार्थिवाः केचनेह; यास्यावहे शिविराय़ैव तावत् |
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५८
सञ्जय़ उवाच
मा व्यथां कुरु कौन्तेय़ नैतत्त्वय़्युपपद्यते |
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
मा व्यथां कुरु राधेय़ नैतत्त्वय़्युपपद्यते ||
८ ग
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
मा शव्दः सुखसुप्तानां भ्रातृणां मे भवेदिति ||
२१ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
मा शिरोऽस्य पदा मर्दीर्मा धर्मस्तेऽत्यगान्महान् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
वासुदेव उवाच
मा शुचः किञ्चिदेवान्यत्तत्रानिष्टं भविष्यति ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९६
भीष्म उवाच
मा शुचः कौरवेन्द्र त्वं श्रुत्वैतत्परमं पदम् ||
४५ ख
वन पर्व
अध्याय
२७६
मार्कण्डेय़ उवाच
मा शुचः पुरुषव्याघ्र क्षत्रिय़ोऽसि परन्तप |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
मा शुचः पुरुषव्याघ्र पूर्वैरेष सनातनः |
६७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३८
श्रीभगवानु उवाच
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
मा शुचश्चपलाक्षं त्वं पुण्डरीकनिभेक्षणे ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
मा शुचस्तनय़ं भद्रे गतः स परमां गतिम् ||
१७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
मा शुचो धृतराष्ट्र त्वं नैष भीमस्त्वय़ा हतः |
२३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
मा शुचो न हि शोच्यास्ते सङ्ग्रामे निधनं गताः ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
मा शुचो भरतश्रेष्ठ दिष्टमेतत्पुरातनम् ||
३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
मा शुचो भरतश्रेष्ठ न त्वं शोचितुमर्हसि |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
मा शुचो भरतश्रेष्ठ प्रकरिष्ये प्रिय़ं तव ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
मा शोकं कुरु वार्ष्णेय़ि कुमारं प्रति सस्नुषा |
१२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४७
नारद उवाच
मा शोचिथास्त्वं नृपतिं गतः स परमां गतिम् ||
७ ख
सभा पर्व
अध्याय
४१
शिशुपाल उवाच
मा साहसमितीदं सा सततं वाशते किल |
२० क
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
मा सिंहं जम्वुकेनेव घातय़ामः शिखण्डिना ||
१८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
मा सूतपुत्र मानेन सौवर्णं हस्तिषड्गवम् |
१८ क
विराट पर्व
अध्याय
१३
द्रौपद्यु उवाच
मा सूतपुत्र हृष्यस्व माद्य त्यक्ष्यसि जीवितम् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
मा सूतपुत्राह्वय़ राजपुत्रं; महावीर्यं केसरिणं यथैव |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
मा सोमदत्तेः पदवीं गमय़ेत्सात्यकिं वृषः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
मा स्प्राक्षीः सधु जानीष्व स्वशास्त्रमनुपालय़ |
७० क
शान्ति पर्व
अध्याय
९८
भीष्म उवाच
मा स्म तांस्तादृशांस्तात जनिष्ठाः पुरुषाधमान् |
२० क
वन पर्व
अध्याय
२३५
वैशम्पाय़न उवाच
मा स्म तात पुनः कार्षीरीदृशं साहसं क्वचित् |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९२
उतथ्य उवाच
मा स्म तात वले स्थेय़ा वाधिष्ठा मापि दुर्वलम् |
१८ क
वन पर्व
अध्याय
१३३
अष्टावक्र उवाच
मा स्म ते ते गृहे राजञ्शात्रवाणामपि ध्रुवम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
मा स्म ते व्राह्मणं दृष्ट्वा धनस्थं प्रचलेन्मनः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
भीष्म उवाच
मा स्म धर्मं परित्याक्षीस्त्वं हि धर्मविदुत्तमः ||
५६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
मा स्म पुण्यकृतां लोकान्प्राप्नुय़ां शूरसंमतान् ||
२४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
मा स्म यज्ञकृतां प्रीतिं प्राप्नुय़ां सज्जनोचिताम् |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
मा स्म युध्यस्व कौन्तेय़ मा च वीरान्समासदः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
मा स्म लुव्धांश्च मूर्खांश्च कामे चार्थेषु यूय़ुजः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
व्रह्मो उवाच
मा स्म शक्र वलिं हिंसीर्न वलिर्वधमर्हति |
१० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
मा स्म शोके मनः कार्षीर्दिष्टेन व्यथते वुधः |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनय़ेत्पुत्रमीदृशम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
मा स्माधर्मेण लाभेन लिप्सेथास्त्वं धनागमम् |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
वृषादर्भिरु उवाच
मा स्माभक्ष्ये भावमेवं कुरुध्वं; पुष्ट्यर्थं वै किं प्रय़च्छाम्यहं वः ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
मा स्मैवं साहसं वत्स पुनः कार्षीः कथञ्चन |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
मा स्वां प्रतिज्ञां जहत प्रवीराः; स्वं वीरधर्मं परिपालय़ध्वम् ||
७९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
मा ह स्म कस्यचिद्गेहे जनी राज्ञः खरीमृदुः |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय
६८
भीमसेन उवाच
मा ह स्म सुकृताँल्लोकान्गच्छेत्पार्थो वृकोदरः |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय
६९
विदुर उवाच
मा हार्षीः साम्पराय़े त्वं वुद्धिं तामृषिपूजिताम् ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३५
कुन्त्यु उवाच
मां च कुशलिनीं व्रूय़ास्तेषु भूय़ो जनार्दन |
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
मां च कृष्ण समाश्रित्य कृतः शस्त्रसमुद्यमः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
मां च ते समुदीक्षन्तः प्रपतिष्यन्ति विह्वलाः ||
३० ख