द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
माधवेनार्द्यमानस्य सागरस्येव दारुणः ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
माधुर्यगुणसम्पन्नाः सत्यसन्धा जितेन्द्रिय़ाः |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
माध्यन्दिनं ते सवनं ददतस्तात वर्तताम् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
मानं कुरुष्व गाङ्गेय़ व्राह्मणस्य रणाजिरे ||
१६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
मानं कुर्वन्धार्तराष्ट्रस्य सूत; मिथ्यावुद्धेः कुशलं तात पृच्छेः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
मानं च कीर्तिं च यशश्च नेच्छे; त्स वै प्रचारः पश्यतो व्राह्मणस्य ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८१
पराशर उवाच
मानं त्यक्त्वा यो नरो वृद्धसेवी; विद्वान्क्लीवः पश्यति प्रीतिय़ोगात् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४४
सनत्सुजात उवाच
मानं न कुर्यान्न दधीत रोष; मेष प्रथमो व्रह्मचर्यस्य पादः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६७
भीष्म उवाच
मानं विधम शत्रूणां धर्मो जय़तु नः सदा ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
२९७
युधिष्ठिर उवाच
मानं हित्वा प्रिय़ो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति |
५७ क
आदि पर्व
अध्याय
१०२
वैशम्पाय़न उवाच
मानक्रोधविहीनाश्च जना लोभविवर्जिताः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
मानघ्नस्य आत्मकामस्य चेर्ष्योः; संरम्भिणश्चार्थधर्मातिगस्य |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
मानघ्नो मानकामश्च वृद्धानां शासनातिगः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
मानदर्पादहङ्कारमहङ्कारात्ततः क्रिय़ाः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
मानना तु द्विजातीनां कर्तव्या वै महात्मनाम् |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
श्रीरु उवाच
माननां त्वहमिच्छामि भवत्यः सततं शुभाः ||
१९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
मानवा ज्ञानसंमोहात्ततः कामं प्रय़ान्ति वै ||
३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५२
कुरुरु उवाच
मानवा ये निराहारा देहं त्यक्ष्यन्त्यतन्द्रिताः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
मानवा वा विजेतारः कृष्णय़ोः सन्ति केचन ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय
५९
जनमेजय़ उवाच
मानवानां च सर्वेषां तथा वै यक्षरक्षसाम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
४०
भीष्म उवाच
मानवानां प्रमोहार्थं कृत्या नार्योऽसृजत्प्रभुः ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
मानवानां सहस्रेषु तेषु वै शुद्धय़ोनिषु |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४९
नारद उवाच
मानवानां हितार्थाय़ यय़ाचे पुनरेव च ||
२२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
मानवान्पालय़िष्यन्ति भूत्वा धर्मपराय़णाः ||
२२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
मानवीं वृषभां चैव महानद्यो जनाधिप |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
मानसं जनय़ामास तैजसं व्रह्मसत्तमम् ||
१८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
मानसं दय़ितं विप्र सर्वभूतदय़ात्मकम् ||
११ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४२
सूत उवाच
मानसं मनसाप्नोति शारीरं च शरीरवान् ||
१७ ग
सभा पर्व
अध्याय
५
नारद उवाच
मानसं वृद्धसेवाभिः सदा पार्थापकर्षसि ||
७९ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मानसं शमय़ेत्तस्माज्ज्ञानेनाग्निमिवाम्वुना |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४८
भीष्म उवाच
मानसं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिणः |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
मानसं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिणः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
मानसं सर्वभूतेषु वर्तते वै शुभाशुभे |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७
भीष्म उवाच
मानसं हि चरन्धर्मं स्वर्गलोकमवाप्नुय़ात् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मानसस्य प्रिय़ाख्यानैः सम्भोगोपनय़ैर्नृणाम् ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भृगुरु उवाच
मानसस्येह या मूर्तिर्व्रह्मत्वं समुपागता |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
मानसाज्जाय़ते व्याधिः शारीर इति निश्चय़ः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५०
वैशम्पाय़न उवाच
मानसादपि दुःखाद्धि शारीरं वलवत्तरम् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८
अश्मो उवाच
मानसानां पुनर्योनिर्दुःखानां चित्तविभ्रमः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
मानसीं स सुतां सुभ्रूं समुत्पादितवान्विभुः ||
३ ग
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मानसेन हि दुःखेन शरीरमुपतप्यते |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
मानसेनाग्निना क्रुद्धा भस्मसान्नः करिष्यति ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
मानसेनेह धर्मेण संय़ुक्ताः पुरुषाः सदा |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
मानसेषु महाराज वैश्याः कर्मोपजीविनः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
मानसैः शोकैरभिभूय़न्ते जरामृत्युकृतैश्चान्यैरिति ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१२
वासुदेव उवाच
मानसो जाय़ते व्याधिर्मनस्येवेति निश्चय़ः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७५
भीष्म उवाच
मानसो नाम विख्यातः श्रुतपूर्वो महर्षिभिः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२३
एकतद्वितत्रिता ऊचुः
मानसो नाम स जपो जप्यते तैर्महात्मभिः |
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८०
भृगुरु उवाच
मानसोऽग्निः शरीरेषु जीव इत्यभिधीय़ते |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैशम्पाय़न उवाच
मानहा भव शत्रूणां सुहृदां नन्दिवर्धनः ||
२६ ख