अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
एतद्धर्ममनुस्मृत्य न वृथा साधय़ेद्धनम् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
एतद्धि कुरवः सर्वे मन्यन्ते धर्मसंहितम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
एतद्धि तव धर्मात्मंस्तपसः पूज्यते फलम् |
५५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३५
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्धि त्रितय़ं श्रेष्ठं सर्वभूतेषु भारत |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ||
४२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्धि नित्यं यत्नेन पदं रक्ष्यं परन्तप |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३४५
व्राह्मण उवाच
एतद्धि परमं कार्यमेतन्मे फलमीप्सितम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
एतद्धि परमं कृत्यं सर्वेषां नः परन्तपाः ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९
भीष्म उवाच
एतद्धि परमं तेजो व्राह्मणस्येह दृश्यते |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
एतद्धि परमं नार्याः कार्यं लोके सनातनम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
एतद्धि परमं व्रह्म स्वय़ं गीतं स्वय़म्भुवा |
१५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
एतद्धि परमं श्रेय़ो न मेऽत्रास्ति विचारणा ||
२१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९७
विदुर उवाच
एतद्धि परमं श्रेय़ो मेनाते तव भारत ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
एतद्धि परमं श्रेय़ो लोकानां भरतर्षभ ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२०
सञ्जय़ उवाच
एतद्धि पुरुषव्याघ्र महदभ्युद्यतं मय़ा |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१९५
भीष्म उवाच
एतद्धि पुरुषव्याघ्र हितं सर्वजनस्य च ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४
द्रुपद उवाच
एतद्धि पुरुषेणाग्रे कार्यं सुनय़मिच्छता ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७२
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्धि भीमनिर्ह्रादं विश्रुतं गाण्डिवं धनुः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
१
युधिष्ठिर उवाच
एतद्धि मम कार्याणां परमं हृदि संस्थितम् |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
एतद्धि योगं योगानां किमन्यद्योगलक्षणम् |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८४
धृतराष्ट्र उवाच
एतद्धि रुचिराकारैः प्रासादैरुपशोभितम् |
२० क
आदि पर्व
अध्याय
१०७
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्धि व्रूत मे सत्यं यदत्र भविता ध्रुवम् ||
२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
एतद्धि सकलं कृष्ण सञ्जय़ो मां यदव्रवीत् ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
एतद्धि सर्वकार्याणां परमं कृत्यमाहवे ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्धि सर्वमाचष्ट वृष्णिचक्रस्य वेदवित् ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
एतद्धि सर्वशास्त्राणां शास्त्रमुत्तमसञ्ज्ञितम् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्ध्यपि तपो राजन्पुराणमिति नः श्रुतम् |
७० क
विराट पर्व
अध्याय
४८
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्ध्वजाग्रं पार्थस्य दूरतः सम्प्रकाशते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
एतद्धय़शिरः कृत्वा नानामूर्तिभिरावृतम् |
४९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
एतद्धय़शिरो राजन्नाख्यानं तव कीर्तितम् |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२२
भीष्म उवाच
एतद्भगवते सर्वमिति तत्प्रेक्षितं सदा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२४
युधिष्ठिर उवाच
एतद्भवन्तं पृच्छामि तद्भवान्प्रव्रवीतु मे ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१३
शुक उवाच
एतद्भवन्तं पृच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति |
२१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
युधिष्ठिर उवाच
एतद्भवन्तं पृच्छामि तन्मे वक्तुमिहार्हसि ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्भवन्तः सञ्चिन्त्य महर्षेरस्य धीमतः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
एतद्भित्त्वा गजानीकं प्रवेक्ष्याम्यरिवाहिनीम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
वैशम्पाय़न उवाच
एतद्भीष्मस्य वचनं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः |
३७ क
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
एतद्यशस्यं भगवेदनं च; स्वर्ग्यं तथा शत्रुनिवर्हणं च |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
एतद्यशस्यमाय़ुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् |
१४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
एतद्युधिष्ठिरो ज्ञात्वा याथातथ्येन भारत |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३५
श्रीभगवानु उवाच
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ||
१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
एतद्यो वेद विधिवत्स मुक्तः स्याद्द्विजर्षभाः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
एतद्योनीनि भूतानि तत्र का परिदेवना ||
१७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय़ |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४९
सञ्जय़ उवाच
एतद्रक्षो रणे तूर्णं दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
एतद्राजकुलद्वारमाकुमारः स्मराम्यहम् ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
२ ग
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
६ ग
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
१० ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||
१४ ग