भीष्म पर्व
अध्याय
११४
सञ्जय़ उवाच
छन्दतो मृत्युरित्येवं तस्य चास्तु वरस्तथा ||
९९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
छन्दतो वर्ततां विप्र यथा वदति वा भवान् ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
छन्दांसि तस्य रोमाणि अक्षरं च सरस्वती ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
छन्दांसि दीक्षा यज्ञाश्च दक्षिणाः पावको हविः |
२२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
छन्दांसि नाम क्षत्रिय़ तान्यथर्वा; जगौ पुरस्तादृषिसर्ग एषः |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
३७
श्रीभगवानु उवाच
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
१९०
वामदेव उवाच
छन्दांसि वै मादृशं संवहन्ति; लोकेऽमुष्मिन्पार्थिव यानि सन्ति |
६२ क
वन पर्व
अध्याय
७३
केशिन्यु उवाच
छन्देन चोदकं तस्य वहत्यावर्जितं द्रुतम् |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३०
इन्द्र उवाच
छन्दोदेव इति ख्यातः स्त्रीणां पूज्यो भविष्यसि |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
छन्दोविदस्ते य उ तानधीत्य; न वेद्यवेदस्य विदुर्न वेद्यम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
छन्दोवृत्तैश्च विविधैरन्वितं विदुषां प्रिय़म् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
छन्द्यमाना वरेणाथ सा वव्रे मत्पराजय़म् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
छन्द्यमानो वरेणाथ व्रह्मणा स पुनः पुनः |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४
व्यास उवाच
छन्द्यमानोऽपि व्रह्मर्षिः पार्थिवेन महात्मना |
१८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४
भीष्म उवाच
छन्दय़ामास चैवैनां वरेण वरवर्णिनीम् ||
२१ ख
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
छन्नं तथा तं सत्रेण पाण्डवं प्रेक्ष्य भारत ||
३६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
पूजन्यु उवाच
छन्नं सन्तिष्ठते वैरं गूढोऽग्निरिव दारुषु ||
४० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
छन्नमाय़ोधनं रेजे कुण्डलाङ्गदधारिभिः |
१२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
छन्नमाय़ोधनं रेजे रक्ताभ्रमिव शारदम् ||
१३० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११३
सञ्जय़ उवाच
छन्नमाय़ोधनं रेजे शिरोभिश्च सकुण्डलैः |
११ क
विराट पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
छन्नमाय़ोधनं सर्वं शरीरैर्गतचेतसाम् |
८ क
वन पर्व
अध्याय
३६
भीमसेन उवाच
छन्नमिच्छसि कौन्तेय़ योऽस्मान्संवर्तुमिच्छसि ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२९९
वैशम्पाय़न उवाच
छन्नेनोष्य कृतं कर्म द्विषतां वलनिग्रहे ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
छागमग्निर्गुणोपेतमिला पुष्पफलं वहु ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
२१७
मार्कण्डेय़ उवाच
छागवक्त्रेण सहितो नवकः परिकीर्त्यते ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
छागस्तु निधनं प्राप्य पूर्णे संवत्सरे ततः |
६१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
२८
यतिरु उवाच
छागार्थे वर्तते यज्ञो भवतः किं प्रय़ोजनम् ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२४
भीष्म उवाच
छागेनाजेन यष्टव्यमेवमुक्तं वचस्तदा ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
छादितः पाण्डवैः शूरैः समन्ताद्भरतर्षभ |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७५
सञ्जय़ उवाच
छाद्यमानं शरव्रातैः शतानीकं यशस्विनम् |
५० क
द्रोण पर्व
अध्याय
४४
सञ्जय़ उवाच
छाद्यमानं शरव्रातैर्हृष्टो दुर्योधनोऽभवत् |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३७
सञ्जय़ उवाच
छाद्यमानं शरैर्दृष्ट्वा युय़ुधानं युधिष्ठिरः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७९
सञ्जय़ उवाच
छाद्यमानः शरौघेण हृष्टरूपतरोऽभवत् |
४४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
छाद्यमानस्तु नागैः स ध्यात्वा राक्षसपुङ्गवः |
६८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
छाद्यमानौ ततस्तौ तु माद्रीपुत्रौ न चेलतुः ||
२८ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
छाद्यमानौ भृशं कृष्णौ शरैर्दृष्ट्वा महारणे ||
३८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
छादय़ञ्शरवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् ||
२२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
छादय़ञ्शरवर्षेण वारय़ामास भारत ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
छादय़न्तः शरव्रातैः परिवव्रुर्धनञ्जय़म् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
छादय़न्तः शरव्रातैर्मेघा इव दिवाकरम् ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
छादय़न्तः शरैः पार्थं मेघा इव दिवाकरम् ||
४४ ख
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
छादय़न्तु शराः पार्थं शलभा इव पादपम् ||
४ ख
विराट पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
छादय़न्तु शराः सूर्यं राज्ञामाय़ुर्निरोधिनः ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
छादय़न्तो महाघोषाः खं दिशश्च वलाहकाः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
छादय़न्तो महाराज द्रौपदेय़ान्महारथान् |
१० क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
छादय़न्तौ च सहसा परस्परवधैषिणौ ||
७७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०७
सञ्जय़ उवाच
छादय़न्तौ हि शत्रुघ्नावन्योन्यं साय़कैः शितैः |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
छादय़न्निषुजालेन महता मोहय़न्निव ||
४४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
छादय़ानं शरैर्घोरैस्तमेकमनुवव्रिरे ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३५
सञ्जय़ उवाच
छादय़ामास च शरैर्निःश्वसन्पन्नगो यथा ||
३५ ख