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शान्ति पर्व
अध्याय ३४८
नाग उवाच
मनुष्याणां विशेषेण धनाध्यक्षा इति श्रुतिः ||
४ ख
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
मनुष्याणां समालम्भो न च दृष्टः कदाचन |
१० क
भीष्म पर्व
अध्याय २९
श्रीभगवानु उवाच
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धय़े |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
युधिष्ठिर उवाच
मनुष्याणामधिपतिं तन्मे व्रूहि पितामह ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
मनुष्याणामनुय़ुगं ह्रसतीति निवोध मे ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्यानुपजीवन्ति ततस्त्वमुपजीवसि ||
९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
मनुष्यापसदा ह्येते ये भवन्ति पराङ्मुखाः |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्पं महात्मनः |
२९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
मनुष्याश्वगजानां च शरीरैर्गतजीवितैः |
३९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्यास्तन्वते यज्ञांस्ते स्वर्गं प्राप्नुवन्ति च ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
मनुष्यास्तप्ततपसः सर्वागमपराय़णाः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
मनुष्येभ्यः समादत्ते शुक्रश्चित्तार्जितं धनम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
मनुष्येषु मनुष्येन्द्र न दृष्टो न च मे श्रुतः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७६
नारद उवाच
मनुष्येषु वदान्येषु स्वधर्मनिरतेषु च ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७३
भीष्म उवाच
मनुष्यो व्राह्मणश्चासि श्रोत्रिय़श्चासि काश्यप |
९ क
आदि पर्व
अध्याय ४
तमृषय़ ऊचुः
मनुष्योरगगन्धर्वकथा वेद च सर्वशः ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १०२
लोमश उवाच
मनुष्योरगगन्धर्वय़क्षकिम्पुरुषास्तथा |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ९०
भीष्म उवाच
मनुष्योरगरक्षांसि वय़ांसि पशवस्तथा ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३००
याज्ञवल्क्य उवाच
मनो ग्रसति सर्वात्मा सोऽहङ्कारः प्रजापतिः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
मनो ग्लपय़ते तीव्रं विषं गन्धेन सर्वशः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४४
व्यास उवाच
मनो नवममेषां तु वुद्धिस्तु दशमी स्मृता |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १३
सूत उवाच
मनो निविष्टमभवज्जरत्कारोर्महात्मनः ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
मनो मनसि सन्धाय़ पश्यत्यात्मानमात्मनि ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
मनो मनुष्यस्य सदा प्रीणन्ति पुरुषोत्तम ||
७८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३५
कुन्त्यु उवाच
मनो मनुष्यस्य सदा प्रीणन्ति पुरुषोत्तम ||
१४ ख
मौसल पर्व
अध्याय ९
अर्जुन उवाच
मनो मे दीर्यते येन चिन्तय़ानस्य वै मुहुः ||
१५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३२
जनक उवाच
मनो मे निर्जितं तस्माद्वशे तिष्ठति नित्यदा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
मनो मे रमतां सत्ये त्वत्प्रसादाद्धुताशन |
१०६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ३४
वासुदेव उवाच
मनो मे व्राह्मणं विद्धि वुद्धिं मे विद्धि व्राह्मणीम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २९७
युधिष्ठिर उवाच
मनो यम्य न शोचन्ति सद्भिः सन्धिर्न जीर्यते ||
५५ ख
वन पर्व
अध्याय २
शौनक उवाच
मनो यस्येन्द्रिय़ग्रामविषय़ं प्रति चोदितम् |
६४ क
वन पर्व
अध्याय २०३
व्याध उवाच
मनो वुद्धिरहङ्कारो भूतानां विषय़श्च सः ||
१६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १७८
भृगुरु उवाच
मनो वुद्धिरहङ्कारो भूतानि विषय़ाश्च सः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३९
व्यास उवाच
मनो वुद्धिश्च भावश्च त्रय़ एतेऽऽत्मय़ोनिजाः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
मनो वुद्धिश्च सप्तैता जिह्वा वैश्वानरार्चिषः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
मनो वुद्धिश्च सप्तैते योनिरित्येव शव्दिताः ||
२३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
मनो वुद्धिश्च सप्तैते विज्ञेय़ा गुणहेतवः ||
४ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २२
व्राह्मण उवाच
मनो वुद्धिश्च सप्तैते होतारः पृथगाश्रिताः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०८
गुरुरु उवाच
मनो वुद्ध्या निगृह्णीय़ाद्विषय़ान्मनसात्मनः ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९४
वसिष्ठ उवाच
मनो वुद्ध्या स्थिरं कृत्वा पाषाण इव निश्चलः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४५
सनत्सुजात उवाच
मनो व्राह्मीं लघुतामादधीत; प्रज्ञानमस्य नाम धीरा लभन्ते |
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
मनो हि परमं भूतं तदव्यक्ते प्रलीय़ते ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
मनो हि मनसा ग्राह्यं दर्शनेन च दर्शनम् ||
२४ ख
सभा पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
मनो हि मे वितरति नैकं त्वं वरमर्हसि ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
मनो ह्यदुष्टं शूराणां पर्याप्तं वै नराधिप |
२१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
मनो ह्लादय़ते यस्माच्छ्रिय़ं चापि दधाति ह |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
मनोः प्रजापते राजन्निक्ष्वाकुरभवत्सुतः |
५ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
मनोः प्रजापतेर्लोकानाप्नोति भरतर्षभ ||
११७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
भीष्म उवाच
मनोः प्रजापतेर्वादं महर्षेश्च वृहस्पतेः ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
भीष्म उवाच
मनोः प्रजापतेर्वादं सुवर्णस्य च भारत ||
२ ख