आदि पर्व
अध्याय
१०३
भीष्म उवाच
मय़ा च सत्यवत्या च कृष्णेन च महात्मना |
३ क
वन पर्व
अध्याय
८३
नारद उवाच
मय़ा च सह धर्मज्ञ तीर्थान्येतान्यनुव्रज |
१०७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
मय़ा च सार्धं वरदं विवुधैश्च महर्षिभिः |
६० क
शल्य पर्व
अध्याय
६२
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा च स्वय़मागम्य युद्धकाल उपस्थिते |
४२ क
विराट पर्व
अध्याय
५६
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा चक्रमिवाविद्धं सैन्यं द्रक्ष्यसि केवलम् ||
७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
मय़ा चापि हितं वाच्यं विद्धि मां त्वद्धितैषिणम् ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
मय़ा चाभ्यधिको वीरः पाण्डवस्तन्निवोध मे |
४७ क
आदि पर्व
अध्याय
७१
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा चेमां विप्रधर्मोक्तिसीमां; मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके |
५५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा चैतत्प्रतिज्ञातं रणमूर्धनि केशव |
२३ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा चैव भवद्भिश्च मान्य एष नराधिपः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
मय़ा चैवाभ्यनुज्ञाता गता सौभपुरं प्रति ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
मय़ा ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा तत्र प्रसादं मे कुरुष्वेति पुनः पुनः ||
२२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
वासुदेव उवाच
मय़ा तव महावाहो तस्मादत्र मनः कुरु ||
४८ ख
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा तु तस्मिन्निहते रावणे लोककण्टके |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
वासुदेव उवाच
मय़ा तु भरतश्रेष्ठ चिरदृष्टः पिता विभो |
४९ क
सभा पर्व
अध्याय
७१
विदुर उवाच
मय़ा तु भ्रंशितो राज्याद्द्रुपदः सखिविग्रहे |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा तु मोहिनी नाम माय़ैषा सम्प्रय़ोजिता |
५ क
सभा पर्व
अध्याय
२८
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा तु रक्षितव्येय़ं पुरी भरतसत्तम |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
३८
शमीक उवाच
मय़ा तु शममास्थाय़ यच्छक्यं कर्तुमद्य वै |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
अर्जुन उवाच
मय़ा तु समनुज्ञातः कृष्णेन च महात्मना |
३० क
वन पर्व
अध्याय
१३९
लोमश उवाच
मय़ा तु हिंसितस्तातो मन्यमानेन तं मृगम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
मय़ा तेऽन्तर्हितं रूपं न त्वा विद्युर्जना इति ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
मय़ा त्रय़ोदश समा भुक्तं राज्यमकण्टकम् ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२८
गर्दभ्यु उवाच
मय़ा त्वं यज्ञसंसिद्धौ निय़ुक्तो गुरुकर्मणि |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३०
श्रीभगवानु उवाच
मय़ा त्वं रक्षितो युद्धे महान्तं प्राप्तवाञ्जय़म् ||
६८ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा त्वदर्थमुक्तो हि वज्रपाणिः पुरन्दरः |
२६ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
४
कृप उवाच
मय़ा त्वां सहितं सङ्ख्ये गुप्तं च कृतवर्मणा |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
मय़ा त्वाशंसमानेन त्वत्तस्त्राणमवुद्धिना |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सात्यकिरु उवाच
मय़ा त्वेतत्प्रतिज्ञातं क्षेपे कस्मिंश्चिदेव हि |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
मय़ा त्वय़ा च पूर्वैश्च न स शक्योऽतिवर्तितुम् ||
५६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९४
गङ्गो उवाच
मय़ा दत्तं निजं पुत्रं वीरं वीर गृहान्नय़ ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१४०
सञ्जय़ उवाच
मय़ा दत्तां हि पृथिवीं न प्रशासितुमिच्छसि ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
मय़ा दाशार्णको राजा वञ्चितश्च महीपतिः |
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा दृष्टः समुद्रे च आश्रमे च कथं त्वय़म् ||
२३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
मय़ा दृष्टानि गोविन्द भवस्यामिततेजसः ||
१२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
श्रीरु उवाच
मय़ा दैत्याः परित्यक्ता विनष्टाः शाश्वतीः समाः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
मय़ा द्रक्ष्यसि निर्भिन्नं जय़द्रथवधैषिणा ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
मय़ा द्रष्टासि सर्वेषां सैन्धवस्याभिरक्षिणाम् ||
४४ ख
वन पर्व
अध्याय
१४८
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा धन्यतरो नास्ति यदार्यं दृष्टवानहम् |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा धृता धारय़ति जगद्धि सचराचरम् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५६
वासुदेव उवाच
मय़ा न निहतः पूर्वमेष युष्मत्प्रिय़ेप्सय़ा |
२६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
मय़ा नागपुरं गत्वा सभाय़ां धृतराष्ट्रजः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
५९
वृहदश्व उवाच
मय़ा निःसंशय़ं दुःखमिय़ं प्राप्स्यत्यनुत्तमा |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
४२
जरत्कारुरु उवाच
मय़ा निवर्तिता वुद्धिर्व्रह्मचर्यात्पितामहाः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा निसृष्टं पापं हि परिग्रहमभीप्सता |
३८ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
मय़ा निसृष्टेन सुदर्शनेन; वज्रेण शक्रो नमुचेरिवारेः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा पतिर्वृतो योऽसौ दुःषन्तः पुरुषोत्तमः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
८०
पुलस्त्य उवाच
मय़ा पूर्वतरं दृष्ट इति ते मेनिरे पृथक् ||
१२७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९०
द्रुपद उवाच
मय़ा प्रच्छादिता चेय़ं वचनाच्छूलपाणिनः ||
४ ख