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शल्य पर्व
अध्याय २२
सञ्जय़ उवाच
मन्दीभूते ततः शव्दे पाण्डवानां महद्वलम् |
८१ क
आदि पर्व
अध्याय १२५
वैशम्पाय़न उवाच
मन्दीभूते समाजे च वादित्रस्य च निस्वने ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
मन्देनैश्वर्यकामेन लोभात्पापमिदं कृतम् ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय २९१
कुन्त्यु उवाच
मन्निमित्तं कुलस्यास्य लोके कीर्तिर्नशेत्ततः ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
मन्निमित्तं भय़ं चापि न कार्यमिति वीर्यवान् ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८९
युधिष्ठिर उवाच
मन्निमित्तं हि स सदा पार्थः सुखविवर्जितः |
३ क
वन पर्व
अध्याय २९१
वैशम्पाय़न उवाच
मन्निमित्तः कथं न स्यात्क्रुद्धादस्माद्विभावसोः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय १५९
वैश्रवण उवाच
मन्निय़ुक्ता मनुष्येन्द्र सर्वे च गिरिवासिनः |
११ ख
आदि पर्व
अध्याय ११३
वैशम्पाय़न उवाच
मन्निय़ोगात्सुकेशान्ते द्विजातेस्तपसाधिकात् |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
मन्निय़ोगाद्भजन्तीं तां भजेथा इत्युवाच तम् ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
मन्निय़ोगाद्यत क्षिप्रमपत्योत्पादनं प्रति ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
मन्निय़ोगान्महाभाग धर्मं कर्तुमिहार्हसि ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय १६१
गन्धर्व उवाच
मन्मथाग्निपरीतात्मा सन्दिग्धाक्षरय़ा गिरा ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
३४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |
६५ क
आदि पर्व
अध्याय ७
सूत उवाच
मन्मुखेनैव हूय़न्ते भुञ्जते च हुतं हविः |
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
मन्यते कर्शय़ित्वा तु क्षमा साध्विति शम्वरः |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यते चैव लोकस्ते स्त्रीभावान्मय़ि सङ्गतम् |
४१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
मन्यते छिन्नवाहुं मां भूरिश्रवसमाहवे |
५९ क
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यते जितमात्मानं यद्येष विजिता वय़म् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यते तद्भय़ं व्येतु भवतो राजसत्तम ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
मन्यते तावदात्मानमन्येभ्यो रूपवत्तरम् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यते पापकं कृत्वा न कश्चिद्वेत्ति मामिति |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
मन्यते पुरुषोऽऽत्मानं दिविष्ठमिव शोभितम् ||
५३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
मन्यते सिंहमात्मानं यावत्सिंहं न पश्यति ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय १९२
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यते हि वृतं पुत्रं ज्येष्ठं द्रुपदकन्यया |
१९ क
वन पर्व
अध्याय २२७
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यतेऽभ्यधिकांश्चापि तपोय़ोगेन पाण्डवान् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
मन्यतेऽय़ं ह्यवुद्धित्वात्तथैव सुकृतान्यपि ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सात्यकिरु उवाच
मन्यध्वं मृतमित्येवमेतद्वो वुद्धिलाघवम् |
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४२
व्रह्मो उवाच
मन्यन्ते कृतमित्येव विदित्वैतानि पण्डिताः ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय १४५
व्राह्मण उवाच
मन्यन्ते केचिदधिकं स्नेहं पुत्रे पितुर्नराः |
३६ क
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यन्ते ते यथा सर्वे तथा यात्रा विधीय़ताम् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
मन्यन्ते ध्रुवमेवैनं ये नरास्तत्त्वदर्शिनः ||
४९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
मन्यन्ते मुनय़ो वुद्ध्या तत्प्रधानं प्रचक्षते ||
३२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०३
याज्ञवल्क्य उवाच
मन्यन्ते यतय़ः शुद्धा अध्यात्मविगतज्वराः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५१
भीष्म उवाच
मन्यन्ते वलवन्तस्तं दुर्वलैः सम्प्रवर्तितम् |
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
ऋषय़ ऊचुः
मन्यन्ते व्राह्मणा एवं प्राज्ञास्तत्त्वार्थदर्शिनः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
मन्यन्ते सन्तमात्मानमसन्तमपि विश्रुतम् ||
४३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४८
व्रह्मो उवाच
मन्यन्ते सर्वमप्येतदव्यक्तप्रभवाव्ययम् ||
१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
मन्यन्तेऽद्य कथं तेषामहं भिन्द्यां मनोरथम् ||
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय २१२
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यमानः कुले जातमात्मानं पुरुषः क्वचित् ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
मन्यमानः प्रभावं च कृष्णस्यामिततेजसः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
मन्यमानः स तं राजन्प्रत्यादेशमिवात्मनः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यमानः स सङ्केतमागारं प्राविशच्च तम् |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८३
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यमानः स्ववीर्यं तन्मागधः प्राहिणोच्छरान् ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५३
तुलाधार उवाच
मन्यमानस्ततो धर्मं चटकप्रभवं द्विज |
५० ख
भीष्म पर्व
अध्याय ८४
सञ्जय़ उवाच
मन्यमाना हि तत्सत्यं सभाय़ां तस्य भाषितम् ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
भीम उवाच
मन्यमानो हतं कर्णं धर्मराजो युधिष्ठिरः |
७३ क
सभा पर्व
अध्याय ४२
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यमानो हि कः सत्सु पुरुषः परिकीर्तय़ेत् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १६९
गन्धर्व उवाच
मन्यसे यं तु तातेति नैष तातस्तवानघ |
८ क