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शान्ति पर्व
अध्याय २४९
नारद उवाच
मम त्वं हि निय़ोगेन श्रेय़ः परमवाप्स्यसि ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७४
सञ्जय़ उवाच
मम त्वनन्तरं कृत्यं यद्वै तत्संनिवोध मे |
३८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ८२
अर्जुन उवाच
मम त्वनुग्रहार्थाय़ प्रविशस्व पुरं स्वकम् |
२७ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
मम त्वन्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य का गतिः |
२० क
वन पर्व
अध्याय २८०
सत्यवानु उवाच
मम त्वामन्त्रय़ गुरून्न मां दोषः स्पृशेदय़म् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
मम त्वेतच्चरास्तात यथावत्प्रत्यवेदय़न् |
५८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ११४
नारद उवाच
मम दत्तो वरः कश्चित्केनचिद्व्रह्मवादिना ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
मम दीनस्य लुव्धस्य मौर्ख्येण हतचेतसः |
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
अम्वो उवाच
मम दुःखं भगवता व्यपनेय़ं यतस्ततः |
५ क
भीष्म पर्व
अध्याय १५
धृतराष्ट्र उवाच
मम दुर्मन्त्रितेनासौ यथा नार्हः स भारतः ||
१५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
श्रीभगवानु उवाच
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ||
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
वैशम्पाय़न उवाच
मम दोषोऽय़मत्यर्थं ख्यापितो यन्न सूर्यजः |
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
मम धर्मार्थय़ुक्तं हि श्रुत्वा वाक्यमनामय़म् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९६
भीष्म उवाच
मम धर्म्यं वलिं दत्त किं वा मां प्रतिपत्स्यथ |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
मम न ग्रहणे शक्तः पलाय़नपराय़णः ||
१०६ ख
आदि पर्व
अध्याय १४९
कुन्त्यु उवाच
मम पञ्च सुता व्रह्मंस्तेषामेको गमिष्यति |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३०
श्रीभगवानु उवाच
मम पाण्यङ्कितश्चापि श्रीकण्ठस्त्वं भविष्यसि ||
६५ ख
वन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
मम पापस्वभावेन भ्राता येन निपातितः |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
मम पुत्रः कथं भीमं प्रत्ययुध्यत सञ्जय़ ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
मम पुत्रः सभां भार्यां पाण्डूनां नीतवान्वलात् ||
७८ ख
वन पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
मम पुत्रः सुदुर्वुद्धिः पृथिवीं घातय़िष्यति ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ९७
वैशम्पाय़न उवाच
मम पुत्रस्तव भ्राता वीर्यवान्सुप्रिय़श्च ते |
८ क
वन पर्व
अध्याय २९१
कुन्त्यु उवाच
मम पुत्रस्य यं वै त्वं मत्त उत्पादय़िष्यसि ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
धृतराष्ट्र उवाच
मम पुत्रस्य यत्सैन्यं सौभद्रः समवारय़त् ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
मम पुत्रा दुरात्मानः सर्वे मृत्युवशं गताः |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८४
धृतराष्ट्र उवाच
मम पुत्राश्च पौत्राश्च सर्वे दुर्योधनादृते |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
मम पुत्राश्च भृत्याश्च राजानश्चैव सञ्जय़ ||
३६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
मम पुत्रेण मूढेन पापेन सुहृदद्विषा |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय ३८
शमीक उवाच
मम पुत्रेण शप्तोऽसि वालेनाकृतवुद्धिना |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १३
जरत्कारुरु उवाच
मम पूर्वे भवन्तो वै पितरः सपितामहाः |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय १९५
भीष्म उवाच
मम पैतृकमित्येवं तेऽपि पश्यन्ति पाण्डवाः ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ३५
युधिष्ठिर उवाच
मम प्रतिज्ञां च निवोध सत्यां; वृणे धर्मममृताज्जीविताच्च |
२१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९०
सञ्जय़ उवाच
मम प्राक्रोशतो राजंस्तथा देवव्रतस्य च ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय १०
रुरुरु उवाच
मम प्राणसमा भार्या दष्टासीद्भुजगेन ह |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२४
सञ्जय़ उवाच
मम प्राणसमौ चैव दिष्ट्या पश्यामि वामहम् ||
३१ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
मम प्राणानारुजन्ति नेमे वाणाः शिखण्डिनः ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १४४
कर्ण उवाच
मम प्राणेन ये शत्रूञ्शक्ताः प्रतिसमासितुम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
मम प्राणैः प्रिय़तमः क्व भीम इति दुःखितः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
मम प्रिय़ं च सुमहत्कृतं राजन्भविष्यति ||
१९१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
मम प्रिय़ं धृतराष्ट्रोऽकरिष्य; त्पुत्राणां च कृतमस्याभविष्यत् ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सत्यवानु उवाच
मम प्रिय़ं वा कर्तव्यं गच्छस्वाश्रममन्तिकात् ||
९९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५०
वैशम्पाय़न उवाच
मम प्रिय़करी चापि सततं प्रिय़दर्शने |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
मम प्रिय़श्च सततं दिष्ट्या जीवति फल्गुनः ||
४१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
मम भक्तिर्महादेवे नैष्ठिकी समपद्यत ||
८५ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
मम भर्ता विशालाक्षः पूर्णेन्दुवदनोऽरिहा ||
७६ ख
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
मम भार्या तव गुरुरिति सुन्दोऽभ्यभाषत |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय २०४
नारद उवाच
मम भार्या तव वधूरुपसुन्दोऽभ्यभाषत ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
मम भीमः सखा चैव सम्वन्धी च महावलः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
मम भोगाश्च वित्तं च त्वदधीनं सुखानि च ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय १३९
लोमश उवाच
मम भ्रात्रा कृतमिदं मय़ा तु परिरक्षितम् ||
१५ ग