उद्योग पर्व
अध्याय
१३३
पुत्र उवाच
मम मातस्त्वकरुणे वैरप्रज्ञे ह्यमर्षणे ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय
२१३
इन्द्र उवाच
मम मातृष्वसेय़ा त्वं माता दाक्षाय़णी मम |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
मम मूर्ध्नि च दिव्यानां कुसुमानां सुगन्धिनाम् |
४८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५१
च्यवन उवाच
मम मूल्यं प्रय़च्छैभ्यो मत्स्यानां विक्रय़ैः सह ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
अग्निरु उवाच
मम मोक्षस्य कोऽन्तो वै व्रह्मन्ध्याय़स्व वै प्रभो |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय
३६
श्रीभगवानु उवाच
मम योनिर्महद्व्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
मम राजन्मतो युद्धे शूरो वैवस्वतोपमः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
७४
वृहदश्व उवाच
मम राज्यं प्रनष्टं यन्नाहं तत्कृतवान्स्वय़म् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
मम रामः सखा वत्से प्रीतिय़ुक्तः सुहृच्च मे |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
मम रूपाण्यथैतानि विद्धि त्वं द्विजसत्तम ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
नारद उवाच
मम रोषः समुत्पन्नस्त्वय़्येवं सम्प्रभाषति |
३३ क
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
मम लङ्का पुरी नाम्ना रम्या पारे महोदधेः ||
३३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२५
दुर्योधन उवाच
मम लुव्धस्य पापस्य तथा धर्मापचाय़िनः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७२
व्रह्मो उवाच
मम लोके सुरैः सार्धं लोके यत्रापि चेच्छति ||
४८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||
२३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२६
श्रीभगवानु उवाच
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२६
वासुदेव उवाच
मम वह्निः समुद्भूतो न वै व्यथितुमर्हथ ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८२
अर्जुन उवाच
मम वा चञ्चलापाङ्गे कच्चित्त्वं शुभमिच्छसि ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५१
वैशम्पाय़न उवाच
मम वा भाषितं किञ्चित्सर्वमेवातिवर्तते ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
मम वा मन्दभाग्यत्वान्मन्दस्ते विक्रमो युधि |
७२ क
विराट पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
मम वा वाहुविक्षेपं शत्रूनिह विजेष्यतः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६७
अर्जुन उवाच
मम वाणनिपातैश्च हतास्ते शतशोऽसुराः ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३७
भीष्म उवाच
मम वाहुसहस्रं तु पश्यन्तां सैनिका रणे |
८ क
सभा पर्व
अध्याय
५८
युधिष्ठिर उवाच
मम वित्तमसङ्ख्येय़ं यदहं वेद सौवल |
२ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४४
व्रह्मो उवाच
मम विष्णुरचिन्त्यात्मा स्वय़म्भूरिति स स्मृतः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
मम वुद्धिपरिस्पन्दाद्वधस्तस्य भविष्यति ||
८९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
मम वेदा हृताः सर्वे दानवाभ्यां वलादितः |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नारद उवाच
मम वै पितरं प्रीतः परमेष्ठ्यप्यजीजनत् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
मम वैश्याः स्वकर्मस्था मामकान्तरमाविशः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२७
सञ्जय़ उवाच
मम व्याय़च्छमानस्य समरे शत्रुसूदन |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८६
भीष्म उवाच
मम व्रतमिदं लोके नाहं युद्धात्कथञ्चन |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५२
सञ्जय़ उवाच
मम व्रवीतु भगवान्विशेषं फल्गुनस्य च ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
मम शूद्राः स्वकर्मस्था मामकान्तरमाविशः ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
मम शोकेन संविग्ना नैराश्यात्तनुमध्यमा ||
६ ग
आदि पर्व
अध्याय
२०८
नार्यु उवाच
मम सख्यश्चतस्रोऽन्याः सर्वाः कामगमाः शुभाः |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
मम सञ्जनय़न्हर्षं पुनः पुनरकीर्तय़त् ||
५४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
मम सत्रमिदं दिव्यमहं गृहपतिस्त्विह ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
मम सत्रेषु पूर्वेषां चिता मघवता सह ||
१८३ ख
वन पर्व
अध्याय
७७
वृहदश्व उवाच
मम सर्वमिदं राज्यमव्यग्रं हतकण्टकम् ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११८
सञ्जय़ उवाच
मम सर्वेऽपि राजानो जानन्त्येतन्महाव्रतम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५२
धृतराष्ट्र उवाच
मम सेनां हनिष्यन्ति ततः क्रोशामि सञ्जय़ ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
८४
वैशम्पाय़न उवाच
मम सैन्यमय़ं कक्षं प्रधक्ष्यति न संशय़ः ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
धृतराष्ट्र उवाच
मम सैन्यावशिष्टास्ते किमकुर्वत सञ्जय़ ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२३
धृतराष्ट्र उवाच
मम सैन्यावशेषस्य संनिपातः सुदारुणः |
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३४
दुर्योधन उवाच
मम सैन्येषु संरव्धा विचरन्ति दवाग्निवत् ||
७७ ख
वन पर्व
अध्याय
२४१
वैशम्पाय़न उवाच
मम स्पृहा समुत्पन्ना तां सम्पादय़ सूतज ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४६
व्राह्मण्यु उवाच
मम हि त्वद्विहीनाय़ाः सर्वकामा न आपदः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
२९८
युधिष्ठिर उवाच
मम हि भ्रातर इमे सहस्रशतय़ोधिनः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
मम ह्यमित्रे मार्जारे जीवितं सम्प्रतिष्ठितम् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
मम ह्यर्थाः सुवहवो नष्टाः स्वप्न इवागताः ||
८ ख