अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
लिङ्गं पूजय़िता नित्यं महतीं श्रिय़मश्नुते ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
लिङ्गमस्यार्चय़न्ति स्म तच्चाप्यूर्ध्वं समास्थितम् ||
८४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
लिङ्गमेवार्चय़न्ति स्म यत्तदूर्ध्वं समास्थितम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०७
गुरुरु उवाच
लिङ्गसंय़ोगहीनं यच्छरीरस्पर्शवर्जितम् |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
लिङ्गाध्यक्षः सुराध्यक्षो लोकाध्यक्षो युगावहः ||
७४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
लिङ्गानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुतः ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
लिङ्गानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुभिः ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३९
व्यास उवाच
लिङ्गानि रजसस्तानि वर्तन्ते हेत्वहेतुतः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६५
मान्धातो उवाच
लिङ्गान्तरे वर्तमाना आश्रमेषु चतुर्ष्वपि ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
लिङ्गान्यत्यर्थमेतानि न मोक्षाय़ेति मे मतिः ||
४७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३३
व्राह्मण उवाच
लिङ्गैर्वहुभिरव्यग्रैरेका वुद्धिरुपास्यते ||
५ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
लिप्यन्ते न हि दोषेण न चैतत्पातकं विदुः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
लिप्समानाः शरीराणि मांसशोणितभोजनाः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
लिप्समानो हि तेनाशु कक्षेऽग्निरिव वर्धते ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४३
सनत्सुजात उवाच
लिप्समानोऽन्तरं तेषां मृगाणामिव लुव्धकः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
लिप्सुर्वा कञ्चिदेवार्थं त्वरमाणो विचक्षणः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०९
गुरुरु उवाच
लिप्सेत मनसा यश्च सङ्कल्पादैश्वरं गुणम् |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
लीनं तु तस्य गात्रेषु मार्जारस्याथ मूषकम् |
८२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
लीनस्तु तस्य गात्रेषु पलितो देशकालवित् |
८३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
स्त्र्यु उवाच
लीलाय़न्त्यः कुलं घ्नन्ति कूलानीव सरिद्वराः |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५६
भीष्म उवाच
लीलय़ा चैव कुर्वन्ति सावज्ञास्तस्य शासनम् |
५७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
लीलय़ाल्पं यथा गात्रात्प्रमृज्यादात्मनो रजः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९७
भीष्म उवाच
लीलय़ाल्पं यथा गात्रात्प्रमृज्याद्रजसः पुमान् |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
लीय़तेऽप्रतिवुद्धत्वादवुद्धजनसेवनात् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९३
वसिष्ठ उवाच
लीय़तेऽप्रतिवुद्धत्वादेवमेष ह्यवुद्धिमान् ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४२
व्रह्मो उवाच
लीय़न्ते प्रतिलोमानि जाय़न्ते चोत्तरोत्तरम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
लीय़न्ते प्रतिलोमानि सृज्यन्ते चान्तरात्मना ||
३१ ख
आदि पर्व
अध्याय
११९
वैशम्पाय़न उवाच
लुप्तधर्मक्रिय़ाचारो घोरः कालो भविष्यति ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
लुप्तप्रज्ञः परेणासि धर्मं दर्शय़ वै सुतान् |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२८
युधिष्ठिर उवाच
लुप्ताय़ां तु प्रकृतौ येन कर्म; निष्पादय़ेत्तत्परीप्सेद्विहीनः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४७
भीष्म उवाच
लुप्यमानाः स्वधर्मेण क्षत्रिय़ो रक्षति प्रजाः ||
४३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
लुलुवुश्च तदा केशान्क्रोशन्त्यस्तत्र तत्र ह ||
६६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
लुव्धं हन्यात्सम्प्रदानेन नित्यं; लुव्धस्तृप्तिं परवित्तस्य नैति |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६२
भीष्म उवाच
लुव्धः क्रूरस्त्यक्तधर्मा निकृतः शठ एव च |
६ क
शल्य पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
लुव्धः पापसहाय़श्च सुहृदां शासनातिगः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
लुव्धः पापेन मनसा चरन्नसममात्मनः ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
लुव्धकेन महाभागा पापे नैवाकरोन्मतिम् ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
लुव्धकेन सह स्वर्गं गताः पुण्येन कर्मणा ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
लुव्धकोऽर्जुनको नाम गौतम्याः समुपानय़त् ||
११ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
लुव्धा दुर्वृत्तभूय़िष्ठा न ताञ्शोचितुमर्हसि ||
१८३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
लुव्धा व्रुवाणा मत्स्यस्य विषय़ं प्राविशन्वनात् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९८
व्याध उवाच
लुव्धाः पापं व्यवस्यन्ति नरा नातिवहुश्रुताः |
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
लुव्धानां शुचय़ो द्वेष्याः कातराणां तरस्विनः |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
लुव्धाश्चानृतकाश्चैव पुष्ये जाय़न्ति भारत ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
लुव्धे दोषाः सम्भवन्तीह सर्वे; तस्माद्राजा न प्रगृह्णीत लुव्धान् ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
लुव्धेभ्यो जाय़ते लुव्धः समेभ्यो जाय़ते समः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२५५
तुलाधार उवाच
लुव्धैर्वित्तपरैर्व्रह्मन्नास्तिकैः सम्प्रवर्तितम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
लुव्धोऽसीति ||
४१ घ
द्रोण पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
लुव्धोऽय़ं क्षत्रिय़ान्हन्ति व्याघ्रः क्षुद्रमृगानिव ||
७१ ख