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शल्य पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
मम ह्येतदशक्तं वै वाजिवृन्दमरिन्दम |
२५ क
वन पर्व
अध्याय ७१
दमय़न्त्यु उवाच
मम ह्लादय़ते चेतो नल एष महीपतिः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
ममज्जेव मही तस्य भूरिभारावपीडिता |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय ९८
भीष्म उवाच
ममता नाम तस्यासीद्भार्या परमसंमता ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १३
वासुदेव उवाच
ममता यस्य द्रव्येषु मृत्योरास्ये स वर्तते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
ममत्वं च न विन्देय़ुर्यदि राजा न पालय़ेत् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
ममत्वं न प्रजानीय़ुर्यदि दण्डो न पालय़ेत् ||
३८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १३
वासुदेव उवाच
ममत्वं यस्य नैव स्यात्किं तय़ा स करिष्यति ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय ५०
दुर्योधन उवाच
ममत्वं हि न कर्तव्यमैश्वर्ये वा धनेऽपि वा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
ममत्वमनय़ा नित्यमहङ्कारकृतात्मकम् |
३७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
ममत्वेनाभिभूतः स तत्रैव परिवर्तते ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
ममत्वेनावृतो नित्यं तत्रैव परिवर्तते |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
ममन्थुर्दक्षिणं चोरुमृषय़स्तस्य मन्त्रतः |
१०१ क
कर्ण पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
ममर्द कर्णस्तरसा सिंहो मृगगणानिव ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय १४१
युधिष्ठिर उवाच
ममागमनमाकाङ्क्षन्गङ्गाद्वारे समाहितः |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
ममाज्ञय़ा द्विजश्रेष्ठ द्रोणपुत्रोऽभिषिच्यताम् |
३८ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
ममात्मजं सत्यवतस्तथौरसं; भवेदुभाभ्यामिह यत्कुलोद्वहम् |
४४ क
वन पर्व
अध्याय १६४
इन्द्र उवाच
ममात्मजस्य वचनं सूपपन्नमिदं तव ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
ममात्मभावमिच्छन्तो यतन्ते परमात्मना ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७६
अम्वो उवाच
ममात्र व्यसनस्यास्य भीष्मो मूलं महाव्रतः |
३८ क
आदि पर्व
अध्याय ४८
सूत उवाच
ममाद्य त्वं सभृत्यस्य मोक्षार्थं वेदवित्तमम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
ममानपत्यः पृथिवीपतिः पिता; भवेत्पितुः पुत्रशतं ममौरसम् |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
ममानाथस्य सुभृशं पुत्रैर्हीनस्य सर्वशः |
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
ममानिवेद्य भैक्षं नोपय़ोक्तव्यमिति ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
ममानुकम्पय़ा त्वेतत्पुच्छमुत्सार्य गम्यताम् ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३३९
व्रह्मो उवाच
ममान्तरात्मा तव च ये चान्ये देहसञ्ज्ञिताः |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
धृतराष्ट्र उवाच
ममापराधात्तत्सर्वमिति ज्ञेय़ं तु कौरवाः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय ११७
राम उवाच
ममापराधात्तैः क्षुद्रैर्हतस्त्वं तात वालिशैः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
धृतराष्ट्र उवाच
ममापि च मतिः सौम्य भवत्येवं यथात्थ माम् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
ममापि तावद्व्रुवतः शृणु यत्प्रतिभाति माम् ||
१२९ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय २
कृप उवाच
ममापि तु वचः किञ्चिच्छृणुष्वाद्य महाभुज ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
ममापि त्वं विजानीहि स्वमर्थं परिगृह्णतः ||
१०१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
गौतम उवाच
ममापि त्वं शक्र शिवं ददस्व; त्वय़ा दत्तं प्रतिगृह्णामि नागम् ||
५९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०३
गरुड उवाच
ममापि दक्षस्य सुता जननी कश्यपः पिता |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १८७
वैशम्पाय़न उवाच
ममापि दारसम्वन्धः कार्यस्तावद्विशां पते ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
ममापि न तथा राज्ञि राज्ये वुद्धिर्यथा पुरा |
३० क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
ममापि निम्नोऽद्य न पाति भक्ता; न्मन्ये न नित्यं परिपाति धर्मः ||
४३ ग
वन पर्व
अध्याय २
युधिष्ठिर उवाच
ममापि परमा भक्तिर्व्राह्मणेषु सदा द्विजाः |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १९९
द्रुपद उवाच
ममापि परमो हर्षः सम्वन्धेऽस्मिन्कृते विभो ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
ममापि पुत्रि भर्ता ते प्रसादं कर्तुमर्हति |
२३ क
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
ममापि भक्तिरुत्पन्ना स त्वं कुरु वचो मम ||
७ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३४२
भीष्म उवाच
ममापि मतिराविग्ना मेघलेखेव वाय़ुना ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
ममापि मानः परमः सदा त्वय़ि; व्रवीम्यतस्त्वां परमाच्च सौहृदात् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
युधिष्ठिर उवाच
ममापि रक्षणं भीमः करिष्यति महावलः ||
४२ ख
वन पर्व
अध्याय ४६
धृतराष्ट्र उवाच
ममापि वचनं सूत न शुश्रूषति मन्दभाक् |
३४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४३
जनमेजय़ उवाच
ममापि वरदो व्यासो दर्शय़ेत्पितरं यदि |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
ममापि शापो न भवेद्भवता दत्त इति ||
१३० घ
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
ममापि श्रूय़तां किञ्चिच्छ्रुत्वा च क्रिय़तां क्षमम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १५०
वैशम्पाय़न उवाच
ममापि सफलं चक्षुः स्मारितश्चास्मि राघवम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय ७०
वृहदश्व उवाच
ममापि सूत पश्य त्वं सङ्ख्याने परमं वलम् ||
७ ख