शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
मूढो ग्राहय़ितुं स्वार्थं सङ्गत्या यदि शक्यते ||
४३ ख
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
मूढो नैकृतिकश्चापि चपलश्च द्विजोत्तम |
७ क
वन पर्व
अध्याय
३०
युधिष्ठिर उवाच
मूढो यदि क्लिश्यमानः क्रुध्यतेऽशक्तिमान्नरः |
१० क
सभा पर्व
अध्याय
६०
द्रौपद्यु उवाच
मूढो राजा द्यूतमदेन मत्त; आहो नान्यत्कैतवमस्य किञ्चित् ||
५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५९
विदुर उवाच
मूढो राजा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो; न मे वाचः पथ्यरूपाः शृणोति ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
मूढोऽय़ं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
मूत्रं न तिष्ठता कार्यं न भस्मनि न गोव्रजे |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
मूत्रतश्चासृजच्चापि यवनान्क्रोधमूर्च्छिता ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
मूत्रश्लेष्मपुरीषाणां स्पर्शैश्च भृशदारुणैः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३
नारद उवाच
मूत्रश्लेष्माशनः पाप निरय़ं प्रतिपत्स्यसे ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९४
वसिष्ठ उवाच
मूत्रोत्सर्गे पुरीषे च भोजने च नराधिप |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९४
राम उवाच
मूत्रय़न्ते च सततं रुदन्ति च हसन्ति च ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या दरिद्राणां महाधनाः |
५८ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
४
विदुर उवाच
मूर्खानिति परानाह नात्मानं समवेक्षते |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
मूर्खो हि जल्पतां पुंसां श्रुत्वा वाचः शुभाशुभाः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
७२
भीष्म उवाच
मूर्खो ह्यधिकृतोऽर्थेषु कार्याणामविशारदः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
मूर्खोऽपि प्राप्नोति कदाचिदर्था; न्कालो हि कार्यं प्रति निर्विशेषः ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
मूर्च्छितः पुनराश्वस्तः सञ्जय़ं वाक्यमव्रवीत् ||
१६० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
मूर्छय़ाभिपरीताङ्गो ध्वजय़ष्टिमुपाश्रितः ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
मूर्छय़ाभिपरीताङ्गौ व्याय़ामेन च मोहितौ ||
३० ग
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
मूर्तिमत्यश्च सरितो वेदाश्चैव सनातनाः |
११ क
वन पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
मूर्तिमद्विष्ठितं पार्श्वे ददृशुर्देवदानवाः ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
मूर्तिमन्तं हि तं विद्धि नित्यं कर्मजितात्मकम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
मूर्तिमन्तः पितृगणांश्चतुरः पश्य सत्तम |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९१
वसिष्ठ उवाच
मूर्तिमन्तममूर्तात्मा विश्वं शम्भुः स्वय़म्भुवः |
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
वसिष्ठ उवाच
मूर्तिमन्ति च सामानि यजूंषि च सहस्रशः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
मूर्तिमन्ति तथास्त्राणि सर्वतेजोमय़ानि च |
१२१ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
मूर्तिमन्मे स्थितं पार्श्वे प्रसन्ने गोवृषध्वजे ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३३
भीष्म उवाच
मूर्तिमानिति तं विद्धि तात कर्मगुणात्मकम् ||
१७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
देवा ऊचुः
मूर्तिसर्वस्वमादाय़ त्रैलोक्यस्य ततस्ततः |
६६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६१
भीष्म उवाच
मूर्तिस्तेऽहं सुराः काय़श्चन्द्रादित्यौ च चक्षुषी ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
द्रोण उवाच
मूर्तीरीक्षष्व नो देव प्रहारैर्जर्जरीकृताः |
६० क
वन पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
मूर्त्यमूर्तिधरैः सार्धं पितृभिर्लोकभावनैः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
२६२
मार्कण्डेय़ उवाच
मूर्धजेषु निजग्राह खमुपाचक्रमे ततः ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
मूर्धजेषु निजग्राह पदा चोरस्यताडय़त् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०५
याज्ञवल्क्य उवाच
मूर्धतश्चोत्पतेद्धूमः सद्योमृत्युनिदर्शनम् ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२८३
मार्कण्डेय़ उवाच
मूर्धभिः पतिताः सर्वे विस्मय़ोत्फुल्ललोचनाः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
उशनो उवाच
मूर्धा यस्य त्वनन्तं च स्थानं दानवसत्तम |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
७
धृतराष्ट्र उवाच
मूर्धानं च तवाघ्रातुमिच्छामि मनुजाधिप |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
मूर्धानं सिन्धुराजस्य पातय़िष्यामि भूतले ||
३३ ख
वन पर्व
अध्याय
२०३
व्याध उवाच
मूर्धानमाश्रितो वह्निः शरीरं परिपालय़न् |
१५ क
सभा पर्व
अध्याय
१४
कृष्ण उवाच
मूर्धाभिषिक्तं नृपतिं प्रधानपुरुषं वलात् |
१५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय
१
सञ्जय़ उवाच
मूर्धाभिषिक्तस्य शिरः पादेन परिमृद्नता ||
५८ ख
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
मूर्धाभिषिक्तास्ते चैनं राजानः पर्युपासते ||
२ ख
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
मूर्ध्ना दिव्यं मणिं विभ्रद्यं तं भूतमणिं विदुः ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०६
भगीरथ उवाच
मूर्ध्ना धारां महादेवः शिरसा यामधारय़त् |
२६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
कृष्ण उवाच
मूर्ध्ना निपत्य निय़तस्तेजःसंनिचय़े ततः |
१ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
मूर्ध्ना प्रणम्य चरणाविदं वचनमव्रवीत् ||
५१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
व्यास उवाच
मूर्ध्ना प्रणम्य वरदं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः |
८३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
मूर्ध्नि केशवमाघ्राय़ पर्यष्वजत वाहुना ||
३६ ख