द्रोण पर्व
अध्याय
१२६
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततः प्राय़ाद्द्रोणः पाण्डवसृञ्जय़ान् |
३९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततः शौरी रथं तं लोकविश्रुतम् |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
एवमुक्त्वा ततः श्रीमान्मन्त्रिभिश्चानुमोदितः |
१ क
आदि पर्व
अध्याय
१६६
गन्धर्व उवाच
एवमुक्त्वा ततः सद्यस्तं प्राणैर्विप्रय़ुज्य सः |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय
१९
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा ततः सर्वे भ्रातरो विपुलौजसः |
१२ क
शल्य पर्व
अध्याय
५१
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा ततः साध्वी देहं त्यक्त्वा दिवं गता ||
२१ ग
आदि पर्व
अध्याय
१३७
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा ततश्चक्रे ज्ञातिभिः परिवारितः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय
१६२
गन्धर्व उवाच
एवमुक्त्वा ततस्तूर्णं जगामोर्ध्वमनिन्दिता |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६९
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो द्रोणस्तव पुत्रं महाद्युतिः |
६८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो भल्लं सौभद्रः परवीरहा |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८३
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो भीममन्तर्धानगतस्तदा |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो भीमो द्रोणपुत्रमरिन्दमः |
५२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०४
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो भीष्मं पञ्चभिर्नतपर्वभिः |
४८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो भीष्मो द्रोणमाचार्यसत्तमम् |
४२ क
सभा पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा ततो भीष्मो विरराम महाय़शाः |
१ क
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा ततो भूय़ो विसञ्ज्ञो निपपात ह ||
४३ ग
वन पर्व
अध्याय
६२
वृहदश्व उवाच
एवमुक्त्वा ततो भैमीं राजमाता विशां पते |
४२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजंस्तेऽभ्यवर्तन्त संय़ुगे |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९३
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्कर्णमाह जनेश्वरः |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्काशिकन्यां न्यवर्तत |
३६ क
शल्य पर्व
अध्याय
४०
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्नृषीन्सर्वान्प्रतापवान् |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महाय़ोगेश्वरो हरिः |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजा वीक्षां चक्रे समन्ततः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८५
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजा सर्वसैन्येन पाण्डवः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो राज्ये स्थापय़ित्वा जय़द्रथम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७७
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा ततो रामः सह तैर्व्रह्मवादिभिः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१८७
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा ततो रामो विनिःश्वस्य महामनाः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो वाक्यं तिष्ठंश्चापवरासिमान् |
७९ क
आदि पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा ततो वाहुं प्रगृह्य पुरुषादकः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
एवमुक्त्वा ततो वीर हय़ान्सञ्चोद्य सङ्गरे |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७३
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो वीरो यय़ौ मध्येन भारतीम् |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततो व्याधाः सम्प्रहृष्टा धनार्थिनः |
३४ क
वन पर्व
अध्याय
१०२
लोमश उवाच
एवमुक्त्वा ततोऽगच्छत्समुद्रं सरितां पतिम् |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
२१३
मार्कण्डेय़ उवाच
एवमुक्त्वा ततोऽपश्यत्केशिनं स्थितमग्रतः ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३४
जनमेजय़ उवाच
एवमुक्त्वा तदा रामो यातः शत्रुनिवर्हणः |
३ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा तदात्मानमात्मा कृष्णस्य पाण्डवः |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा तव पिता तूष्णीमासीद्विशां पते |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा तु कौन्तेय़ः सोऽवप्लुत्य रथोत्तमात् |
२७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७७
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा तु कौन्तेय़ो धनुर्ज्यामवमृज्य च |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५३
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा तु गाङ्गेय़ो धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् |
२९ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा तु गान्धारी कुरूणामाविकर्तनम् |
१ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा तु गान्धारी युधिष्ठिरमपृच्छत |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४२
सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा तु तं कर्णो रथेन रथिनां वरः |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१०४
लोमश उवाच
एवमुक्त्वा तु तं रुद्रस्तत्रैवान्तरधीय़त ||
१५ ग
वन पर्व
अध्याय
२८७
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा तु तं विप्रमभिपूज्य यथाविधि |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२८८
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा तु तां कन्यां कुन्तिभोजो महाय़शाः |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१५
शल्य उवाच
एवमुक्त्वा तु तां देवीं विसृज्य च वराननाम् |
२० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७७
वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा तु तान्वीरान्युय़ुधे कुरुपुङ्गवः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
एवमुक्त्वा तु देवेन्द्रं दुःखादाकुलितेन्द्रिय़ः |
१०५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१
नारद उवाच
एवमुक्त्वा तु नृपतिं प्रय़ातौ स्वो यथेप्सितम् |
२२ क