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कर्ण पर्व
अध्याय १४
सञ्जय़ उवाच
मरुद्भिः प्रेषिता मेघा हिमवन्तमिवोष्णगे ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
मरुद्भिः सह जित्वारीन्मघवान्पाकशासनः |
२७ क
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
मरुद्भिः सहितः श्रीमान्साधु साध्वित्यथाव्रवीत् ||
६४ ख
सभा पर्व
अध्याय ५५
विदुर उवाच
मरुद्भिः सहितो राजन्नपि साक्षान्मरुत्पतिः ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १००
पृथिव्यु उवाच
मरुद्भ्यो देवताभ्यश्च वलिमन्तर्गृहे हरेत् ||
१२ ग
वन पर्व
अध्याय १९२
मार्कण्डेय़ उवाच
मरुधन्वसु रम्येषु आश्रमस्तस्य कौरव ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६२
विदुर उवाच
मरुप्रपाते विषमे निविष्टं कुम्भसंमितम् ||
२३ ख
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
मरुभूमिं च कार्त्स्न्येन तथैव वहुधान्यकम् ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय २४४
वैशम्पाय़न उवाच
मरुभूमेः शिरः ख्यातं तृणविन्दुसरः प्रति |
१३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
मर्तव्यमिति निश्चित्य जय़ं वापि निवर्तनम् ||
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
मर्तव्यमिति सञ्चिन्त्य प्राविशत्तु द्विषद्वलम् ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
मर्तव्ये सति जीवामि हतस्वस्तिरकिञ्चना ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १६७
गन्धर्व उवाच
मर्तुं न शक्यमित्युक्त्वा पुनरेवाश्रमं यय़ौ ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय १३०
लोमश उवाच
मर्तुकामा नरा राजन्निहाय़ान्ति सहस्रशः ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
मर्त्यता चैव भूतानाममरत्वं दिवौकसाम् |
५१ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
मर्त्यधर्मतय़ा तस्मादिति मां भय़माविशत् ||
४० ख
सभा पर्व
अध्याय ६२
वैशम्पाय़न उवाच
मर्त्यधर्मा परामृश्य पाञ्चाल्या मूर्धजानिमान् ||
३४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
मर्त्यधर्माण इह तु किमु सोमकसृञ्जय़ान् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१०
गुरुरु उवाच
मर्त्यलोकाद्विमुच्यन्ते विद्यासंय़ुक्तमानसाः |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८४
पराशर उवाच
मर्त्यलोके च राजानो ये चान्ये गृहमेधिनः |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १३२
महेश्वर उवाच
मर्त्यलोके नराः सर्वे येन स्वं भुञ्जते फलम् ||
४७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
युधिष्ठिर उवाच
मर्त्यस्य कः सहाय़ो वै पिता माता सुतो गुरुः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
मर्त्या यत्रावतिष्ठन्ते सा च कामात्प्रवर्तते ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
देवा ऊचुः
मर्त्या ह्यमर्त्याः संवृत्ता न विशेषोऽस्ति कश्चन |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५८
भीष्म उवाच
मर्त्यानां देवतानां च स्नेहादभ्येति मातरम् ||
४० ख
आदि पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
मर्त्येषु पुरुषश्रेष्ठः को वः कर्ता भविष्यति ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
मर्दते कण्टकान्सर्वान्विषमान्निस्तरत्यपि |
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९९
सञ्जय़ उवाच
मर्दमाना नरान्राजन्हय़ांश्च सुवहून्रणे |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
मर्मच्छिदं शोणितमांसदिग्धं; वैश्वानरार्कप्रतिमं महार्हम् |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
मर्मभिद्भिः शरैस्तीक्ष्णैर्जघान भरतर्षभ ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
मर्मभेदिभिरत्युग्रैर्वाणैरग्निशिखोपमैः |
२० क
कर्ण पर्व
अध्याय ३५
सञ्जय़ उवाच
मर्मस्वपि च मर्मज्ञो निनदन्व्यधमद्भृशम् ||
२६ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
मर्मस्वभ्यवधीत्क्रुद्धः पादाष्ठीलैः सुदारुणैः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
मर्मस्वमरविक्रान्तः सूतपुत्रं महारणे ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
मर्मस्वविध्यत्स चचाल दुःखा; द्धैर्यात्तु तस्थावतिमात्रधैर्यः ||
४० ग
शान्ति पर्व
अध्याय ५२
वैशम्पाय़न उवाच
मर्माणि परितप्यन्ते भ्रान्तं चेतस्तथैव च ||
८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
मर्माणि परिदूय़न्ते वदनं मम शुष्यति ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२८
सञ्जय़ उवाच
मर्माणि भित्त्वा ते सर्वे सम्भग्नाः क्षितिमाविशन् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
मर्माण्यभ्यहनद्भूय़ः स व्यथां परमामगात् ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
हंस उवाच
मर्माण्यस्थीनि हृदय़ं तथासू; न्घोरा वाचो निर्दहन्तीह पुंसाम् |
७ क
शल्य पर्व
अध्याय ११
सञ्जय़ उवाच
मर्माण्युद्दिश्य मर्मज्ञो निचखान हसन्निव ||
४८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
मर्मातिगो वाणधारस्तुमुलः शोणितोदकः ||
१६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
मर्माभिघाताच्चलितः क्रिय़ासु; पुनः पुनर्धर्ममगर्हदाजौ ||
४४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
मर्यादा निय़ताः स्वय़म्भुवा य इहेमाः; प्रभिनत्ति दशगुणा मनोनुगत्वात् |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
मर्यादा विविधाश्चैव दिवि भूमौ च संस्थिताः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
मर्यादा स्थापिता लोके दण्डसञ्ज्ञा विशां पते ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०७
सुपर्ण उवाच
मर्यादा स्थापिता व्रह्मन्यां सूर्यो नातिवर्तते ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९७
भीष्म उवाच
मर्यादां शाश्वतीं भिन्द्याद्व्राह्मणं योऽभिलङ्घय़ेत् ||
८ ग
आदि पर्व
अध्याय १०१
अणीमाण्डव्य उवाच
मर्यादां स्थापय़ाम्यद्य लोके धर्मफलोदय़ाम् |
२६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३८
पञ्चचूडो उवाच
मर्यादासु न तिष्ठन्ति स दोषः स्त्रीषु नारद ||
११ ख