chevron_left  मृगाश्चarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
मृगाश्च घोरसंनादाः शिवाश्चाशिवदर्शनाः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय २१९
वैशम्पाय़न उवाच
मृगाश्च महिषाश्चैव शतशः पक्षिणस्तथा |
२ क
शल्य पर्व
अध्याय १०
सञ्जय़ उवाच
मृगाश्च माहिषाश्चापि पक्षिणश्च विशां पते |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
मृगीं च मृगमन्दां च हरिं भद्रमनामपि ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
मृगेन्द्राः प्रतिनन्दन्ति रविरस्तं च गच्छति ||
९४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
मृगेष्विव महाराज चरन्व्याघ्रो महावलः ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
मृगैर्मृगाणां ग्रहणं पक्षिणां पक्षिभिर्यथा |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
मृगैश्च विविधाकारैर्हाहाभूतमचेतनम् |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय १०९
मृग उवाच
मृगो भूत्वा मृगैः सार्धं चरामि गहने वने |
२७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
मृगो वध्यति शस्त्रेण गते संवत्सरे तु सः |
८८ क
वन पर्व
अध्याय ११०
लोमश उवाच
मृग्यां जातः स तेजस्वी काश्यपस्य सुतः प्रभुः |
४ क
वन पर्व
अध्याय ६५
वृहदश्व उवाच
मृगय़ध्वं नलं चैव दमय़न्तीं च मे सुताम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २२८
वैशम्पाय़न उवाच
मृगय़ा चोचिता राजन्नस्मिन्काले सुतस्य ते |
५ क
वन पर्व
अध्याय २२८
धृतराष्ट्र उवाच
मृगय़ा शोभना तात गवां च समवेक्षणम् |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १२०
वैशम्पाय़न उवाच
मृगय़ां चरतो राज्ञः शन्तनोस्तु यदृच्छय़ा |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २२८
शकुनिरु उवाच
मृगय़ां चैव नो गन्तुमिच्छा संवर्धते भृशम् |
२० क
वन पर्व
अध्याय १७५
वैशम्पाय़न उवाच
मृगय़ां परिधावन्स समेषु मरुधन्वसु |
११ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
मृगय़ां पानमक्षांश्च ग्राम्ये चैवातिसक्तताम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २४८
वैशम्पाय़न उवाच
मृगय़ां पुरुषव्याघ्रा व्राह्मणार्थे परन्तपाः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९७
भीष्म उवाच
मृगय़ां विचरन्कश्चिद्विजने जनकात्मजः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
मृगय़ाक्षास्तथा पानं स्त्रिय़श्च भरतर्षभ |
६० क
उद्योग पर्व
अध्याय ९४
राम उवाच
मृगय़ाणोऽन्वगच्छत्तौ तापसावपराजितौ ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय १६३
अर्जुन उवाच
मृगय़ाधर्ममुत्सृज्य किमर्थं ताडितस्त्वय़ा ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२
भीष्म उवाच
मृगय़ामस्मि निर्यातो वलैः परिवृतो दृढम् |
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय २१२
वैशम्पाय़न उवाच
मृगय़ाव्यपदेशेन यौगपद्येन भारत ||
५ ख
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
मृगय़ित्वा यथान्याय़ं विदितार्थाः स्म तत्त्वतः |
१५ क
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
मृगय़ित्वा वहून्ग्रामान्राष्ट्राणि नगराणि च ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
मृगय़िष्यन्ति ते भद्रे भर्तारं पुरुषा मम ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
मृगय़ूथान्यथौत्सुक्याच्छव्दं चक्रुस्ततस्ततः ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
मृगय़ूथैरनुद्विग्नैस्तत्र तत्र समाश्रितैः |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२७
भीष्म उवाच
मृगय़ूथैर्द्रुतैर्भीतैर्हरपार्श्वमुपागतैः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२०
भीष्म उवाच
मृजावान्स्यात्स्वय़ूथ्येषु भावानि चरणैः क्षिपेत् |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
मृजय़ा रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
मृतं च यन्न मुञ्चति समर्जय़स्व तद्धनम् ||
४५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४०
विदुर उवाच
मृतं पुत्रं दुःखपुष्टं मनुष्या; उत्क्षिप्य राजन्स्वगृहान्निर्हरन्ति |
१४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
वासुदेव उवाच
मृतं प्रत्यागतमिव दृष्ट्वा पार्थं धनञ्जय़म् ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१७
नारद उवाच
मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति |
९ क
स्त्री पर्व
अध्याय २६
वासुदेव उवाच
मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
युधिष्ठिर उवाच
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः |
३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
युधिष्ठिर उवाच
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
वृहस्पतिरु उवाच
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः |
१३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
युधिष्ठिर उवाच
मृतं शरीररहितं सूक्ष्ममव्यक्ततां गतम् |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय ४५
सूत उवाच
मृतं सर्पं धनुष्कोट्या समुत्क्षिप्य धरातलात् |
२७ क
आदि पर्व
अध्याय ४६
मन्त्रिण ऊचुः
मृतं सर्पं समासक्तं पित्रा ते जनमेजय़ |
४ क
वन पर्व
अध्याय २९७
यक्ष उवाच
मृतः कथं स्यात्पुरुषः कथं राष्ट्रं मृतं भवेत् |
५८ क
वन पर्व
अध्याय २८५
सूर्य उवाच
मृतः कीर्तिं न जानाति जीवन्कीर्तिं समश्नुते ||
५ ग
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
मृतः श्रूय़ेत यो जीवन्परेय़ुः पशवो यथा |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
भीष्म उवाच
मृतचेलपरिस्तीर्णं निर्माल्यकृतभूषणम् |
२९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४८
भीष्म उवाच
मृतचेलप्रतिच्छन्नं भिन्नभाजनभोजिनम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३७
सूत उवाच
मृतधारं गुरुं श्रुत्वा पर्यतप्यत मन्युना ||
१ ख