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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
मनश्चक्रे तेन वित्तेन यष्टुं; ततोऽमात्यैर्मन्त्रय़ामास भूय़ः ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
मनश्चक्रे महातेजा युद्धाय़ भरतर्षभ ||
१३ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
वैशम्पाय़न उवाच
मनश्चक्रे महादाने कार्त्तिक्यां जनमेजय़ ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय १५
युधिष्ठिर उवाच
मनश्चक्षुर्विहीनस्य कीदृशं जीवितं भवेत् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९९
याज्ञवल्क्य उवाच
मनश्चरति राजेन्द्र चरितं सर्वमिन्द्रिय़ैः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३३५
व्यास उवाच
मनश्चापि ततो भूतमव्यक्तगुणलक्षणम् |
८० क
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
व्यास उवाच
मनश्चापि सदा युङ्क्ते भूतात्मा हृदय़ाश्रितः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ७५
भीष्म उवाच
मनश्च्युता मनएवोपपन्नाः; सन्धुक्षध्वं सौम्यरूपोग्ररूपाः ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
मनसः पञ्चभूतानि विद्या इत्यभिचक्षते ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १५
कृष्ण उवाच
मनसः परमा योनिः स्वभावश्चापि शाश्वतः |
३७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
मनसः परमां योनिं खं वाय़ुं ज्योतिषां निधिम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
मनसः परमो ह्यात्मा इन्द्रिय़ेभ्यः परं मनः ||
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६४
सञ्जय़ उवाच
मनसः प्रीतिजननं कृपं वचनमव्रवीत् |
३६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
मनसश्च पृथिव्याश्च पुण्यतीर्थास्तथापरे |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
मनसश्च प्रिय़ानर्थान्वीर क्षिप्रमवाप्नुहि ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
भीष्म उवाच
मनसश्च समाधिर्मे वर्धेताहरहः शुभे |
१३ क
वन पर्व
अध्याय १७८
युधिष्ठिर उवाच
मनसश्चापि वुद्धेश्च व्रूहि मे लक्षणं परम् |
२४ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
मनसश्चाप्यभिप्रेतं यत्ते शत्रुनिवर्हण |
४३ क
विराट पर्व
अध्याय ३२
विराट उवाच
मनसश्चाप्यभिप्रेतं यद्वः शत्रुनिवर्हणाः ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
मनसश्चेन्द्रिय़ाणां च कृत्वैकाग्र्यं समाहितः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४२
व्यास उवाच
मनसश्चेन्द्रिय़ाणां च ह्यैकाग्र्यं परमं तपः |
४ क
वन पर्व
अध्याय २४६
व्यास उवाच
मनसश्चेन्द्रिय़ाणां चाप्यैकाग्र्यं निश्चितं तपः ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३१
शुक उवाच
मनसश्चेन्द्रिय़ाणां चाप्यैकाग्र्यं समवाप्यते |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
मनसस्तु गुणश्चिन्ता प्रज्ञय़ा स तु गृह्यते |
३२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६७
असित उवाच
मनसस्तु परा वुद्धिः क्षेत्रज्ञो वुद्धितः परः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २५
श्रीभगवानु उवाच
मनसस्तु परा वुद्धिर्यो वुद्धेः परतस्तु सः ||
४२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २४०
व्यास उवाच
मनसस्तु परा वुद्धिर्वुद्धेरात्मा परो मतः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३८
व्यास उवाच
मनसस्तु परा वुद्धिर्वुद्धेरात्मा महान्परः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०९
गुरुरु उवाच
मनसस्तु प्रलीनत्वात्तत्तदाहुर्निदर्शनम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९८
याज्ञवल्क्य उवाच
मनसस्तु समुद्भूता महाभूता नराधिप |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२२
भीष्म उवाच
मनसा कर्मणा वाचा नापराध्यन्ति कस्यचित् ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२१
श्रीरु उवाच
मनसा कर्मणा वाचा भक्तमासीदनावृतम् ||
५७ ख
वन पर्व
अध्याय २०४
वृद्धावू ऊचतुः
मनसा कर्मणा वाचा शुश्रूषा नैव हीय़ते |
११ क
वन पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
मनसा कृतशौचा वै शुद्धास्तीर्थानि गच्छत ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
मनसा क्लिश्यमानस्तु समाधानं च कारय़ेत् |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २५
व्राह्मण उवाच
मनसा गम्यते यच्च यच्च वाचा निरुद्यते |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
मनसा गोषु न द्रुह्येद्गोवृत्तिर्गोनुकम्पकः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय ४१
भगवानु उवाच
मनसा चक्षुषा वाचा धनुषा च निपात्यते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९७
मनुरु उवाच
मनसा चान्यदाकाङ्क्षन्परं न प्रतिपद्यते ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९९
मनुरु उवाच
मनसा चान्यदाकाङ्क्षन्परं न प्रतिपद्यते ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २१
व्राह्मण्यु उवाच
मनसा चिन्तितं वाक्यं यदा समभिपद्यते ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय २
व्यास उवाच
मनसा चिन्तितमपि सर्वं वेत्स्यति सञ्जय़ः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४४
व्राह्मण उवाच
मनसा चिन्तितस्येव प्रीतिस्निग्धस्य दर्शनम् |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ८२
व्रह्मो उवाच
मनसा चिन्तिता भोगास्त्वय़ा वै दिव्यमानुषाः |
३७ क
शल्य पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
मनसा चिन्तिता ह्यर्था धर्मार्थकुशलैस्तदा |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९१
भगवानु उवाच
मनसा चिन्तय़न्पापं कर्मणा नाभिरोचय़न् |
७ क
आदि पर्व
अध्याय ६७
वैशम्पाय़न उवाच
मनसा चिन्तय़न्प्राय़ात्काश्यपं प्रति पार्थिवः ||
२१ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४३
व्रह्मो उवाच
मनसा चिन्तय़ानोऽर्थान्वुद्ध्या चैव व्यवस्यति |
२३ क
वन पर्व
अध्याय ९४
लोमश उवाच
मनसा चिन्तय़ामास कस्मै दद्यां सुतामिति ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
मनसा चिन्तय़ामास किमय़ं लभतामिति ||
४५ ख