उद्योग पर्व
अध्याय
१३२
विदुरो उवाच
महार्हमाल्याभरणां सुमृष्टाम्वरवाससम् |
१५ क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
महार्हमाल्याभरणाः सुवर्णाश्चन्दनोक्षिताः |
४५ क
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
महार्हमाल्याभरणाः सुवस्त्राश्चन्दनोक्षिताः |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
२२३
द्रौपद्यु उवाच
महार्हमाल्याभरणाङ्गरागा; भर्तारमाराधय़ पुण्यगन्धा ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
महार्हरत्नौघविचित्रमावभौ; दिवं यथा निर्मलतारकाचितम् ||
८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६६
सञ्जय़ उवाच
महार्हरूपं द्विषतां भय़ङ्करं; विभाति चात्यर्थसुखं सुगन्धि तत् |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१४
सञ्जय़ उवाच
महार्हवर्माभरणा नानारूपाम्वराय़ुधाः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
१९०
वैशम्पाय़न उवाच
महार्हवस्त्रा वरचन्दनोक्षिताः; कृताभिषेकाः कृतमङ्गलक्रिय़ाः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
महार्हशय़्यास्तरणोचिताः सदा; क्षितावनाथा इव शेरते हताः ||
४६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
महार्हाणि च वासांसि धारय़ाम्यहमेकदा ||
२३ ख
वन पर्व
अध्याय
९५
लोमश उवाच
महार्हाण्युत्सृजैतानि वासांस्याभरणानि च ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
महार्हान्वृष्णिशार्दूल सदा सम्पूजय़ाम्यहम् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०१
नारद उवाच
महार्हाभरणोपेतौ विरजोम्वरधारिणौ ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१४
वैशम्पाय़न उवाच
महार्हासनय़ो राजंस्ततस्तौ संनिषीदतुः ||
२७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५४
भीष्म उवाच
महार्हे शय़ने दिव्ये शय़ानं भृगुनन्दनम् ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२८४
वैशम्पाय़न उवाच
महार्हे शय़ने वीरं स्पर्ध्यास्तरणसंवृते |
७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
महार्हेभ्योऽथ यानेभ्यो विक्रोशन्त्यो निपेतिरे ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०१
सञ्जय़ उवाच
महावंशवनस्येव दह्यमानस्य पर्वते ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
महावक्षा महोरस्को अन्तरात्मा मृगालय़ः ||
८४ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
महावनं गच्छति कौरवेन्द्रे; शोकेनार्ता राजमार्गं प्रपेदुः ||
१३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
५७
धृतराष्ट्र उवाच
महावनमिव छिन्नं यदा द्रक्ष्यसि पातितम् |
२८ क
विराट पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
महावनमिव छिन्नं शिश्ये विगलितद्रुमम् ||
२८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२८
सञ्जय़ उवाच
महावनमिव छिन्नमभवत्तावकं वलम् ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
महावने तीव्रमदौ वारणाविव यूथपौ ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३८
सञ्जय़ उवाच
महावने दाव इव प्रदीप्ते; यथा प्रभा भास्करस्यापि नश्येत् |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
महावने मृगगणा दावाग्निग्रसिता यथा |
१८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
महावने व्यवोध्यन्त श्वापदानां रुतेन ते ||
१७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
महावने हस्तिशिशुं परिद्यूनममातृकम् ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
जनमेजय़ उवाच
महावराहसृष्टा च पिण्डोत्पत्तिः पुरातनी ||
१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी |
७१ क
आदि पर्व
अध्याय
२०
सूत उवाच
महावलं गरुडमुपेत्य खेचरं; परावरं वरदमजय़्यविक्रमम् ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
महावलं घोरतरं प्रवृद्धं; जातं हरिं पर्वतकन्दरेषु |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१०
शल्य उवाच
महावलं महाकाय़ं न मे श्रेय़ो भविष्यति ||
३५ ख
विराट पर्व
अध्याय
२
युधिष्ठिर उवाच
महावलं महावाहुमजितं कुरुनन्दनम् |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३०
सञ्जय़ उवाच
महावलः कमलविवुद्धलोचनो; युधिष्ठिरं नृपतिमपूजय़द्वली ||
३७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७२
महेश्वर उवाच
महावलत्वं च तथा तेजश्चाग्र्यं सुरेश्वर ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय
२५२
द्रौपद्यु उवाच
महावला किं त्विह दुर्वलेव; सौवीरराजस्य मताहमस्मि |
१३ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
महावला महावेगा महापारिषदास्तथा ||
१०६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
११
सञ्जय़ उवाच
महावला महासत्त्वाः प्रजागुणसमन्विताः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय
७०
सञ्जय़ उवाच
महावला रणे शूराः पाञ्चालानन्ववारय़न् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१७
सूत उवाच
महावला विगलितमेघवर्चसः; सहस्रशो गगनमभिप्रपद्य ह ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
महावलानतिरथान्वीरान्समरशोभिनः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
महावलानां वलिभिर्दानवानां यथा सुरैः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
२६
मार्कण्डेय़ उवाच
महावलान्पर्वतकूटमात्रा; न्विषाणिनः पश्य गजान्नरेन्द्र |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
४०
विदुर उवाच
महावलान्पश्य महानुभावा; न्प्रशास्य भूमिं धनधान्यपूर्णाम् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१५८
वैशम्पाय़न उवाच
महावलान्महाघोरान्भीमसेनेन पातितान् ||
५ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
महावलास्तत्र सदा राजन्मुदितमानसाः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
३१
सञ्जय़ उवाच
महावलास्ते कुपिताः परस्परं; निषूदय़न्तः प्रविचेरुरोजसा ||
७६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
महावलैर्भीमरवैः संरम्भोद्वृत्तलोचनैः ||
७७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
४७
सञ्जय़ उवाच
महावलो नरकस्तत्र भौमो; जहारादित्या मणिकुण्डले शुभे ||
७४ ख