वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
मतिरुत्क्रमणीय़ा ते प्रय़ागमरणं प्रति ||
७८ ख
सभा पर्व
अध्याय
५१
दुर्योधन उवाच
मतिसाम्यं द्वय़ोर्नास्ति कार्येषु कुरुनन्दन ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९७
मनुरु उवाच
मतिस्त्वतिगता ज्ञानं ज्ञानं त्वभिगतं परम् ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८६
भीष्म उवाच
मतिस्मृतिसमाय़ुक्तं विनीतं समदर्शनम् |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
मतो मम रथो वीर परवीररथारुजः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
मतो मे वहुमाय़ावी रथय़ूथपय़ूथपः ||
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
मतो मेऽतिरथो राजन्द्रोणशिष्यो महारथः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२२
धृतराष्ट्र उवाच
मतो हि मे शक्रसमो धनञ्जय़ः; सनातनो वृष्णिवीरश्च विष्णुः ||
३१ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
मतौ मम रथोदारौ पाण्डवानां न संशय़ः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
सञ्जय़ उवाच
मतौ मे सर्वसैन्येषु भीमसेनश्च पाण्डवः ||
५४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
श्रीभगवानु उवाच
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः |
५५ क
वन पर्व
अध्याय
२१
वासुदेव उवाच
मत्कार्मुकविनिर्मुक्ता दानवानां महारणे |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
मत्कार्मुकविनिर्मुक्ताः पार्थमाशीविषोपमाः |
१५ क
उद्योग पर्व
अध्याय
५४
दुर्योधन उवाच
मत्कृते दुःखमापन्नं क्लेशं प्राप्तमनन्तकम् ||
१४ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
मत्कृते भ्रातृसौहार्दाद्राज्यात्प्रभ्रंशनं गताः |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
मत्कृते भ्रातृसौहार्दाद्राज्याद्भ्रष्टास्तथा सुखात् |
१३ क
वन पर्व
अध्याय
१२८
लोमश उवाच
मत्कृते हि महाभागः पच्यते नरकाग्निना ||
१२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
राजो उवाच
मत्कृते ह्युपदेशेन त्वय़ा प्राप्तमिदं फलम् ||
५१ ग
वन पर्व
अध्याय
२८१
सत्यवानु उवाच
मत्कृतेन हि तावद्य सन्तापं परमेष्यतः |
९३ क
वन पर्व
अध्याय
१४४
वैशम्पाय़न उवाच
मत्कृतेऽद्य वरार्हाय़ाः श्यामतां समुपागतम् ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मय़ि ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय
५४
युधिष्ठिर उवाच
मत्तः कैतवकेनैव यज्जितोऽस्मि दुरोदरम् |
१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय़ |
७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तः पुत्रमदेनैव विधर्मे पथि वर्तते ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३३
विदुर उवाच
मत्तः प्रमत्त उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धो वुभुक्षितः ||
८२ ख
वन पर्व
अध्याय
१८७
देव उवाच
मत्तः प्रादुर्भवन्त्येते मामेव प्रविशन्ति च ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३५
प्रह्राद उवाच
मत्तः श्रेय़ानङ्गिरा वै सुधन्वा त्वद्विरोचन |
२८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२६
भीष्म उवाच
मत्तः सर्वं सम्भवति जगत्स्थावरजङ्गमम् |
४० क
शान्ति पर्व
अध्याय
५४
वासुदेव उवाच
मत्तः सर्वेऽभिनिर्वृत्ता भावाः सदसदात्मकाः ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
६०
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तः सुप्तानि भूतानि न हिंसन्ति भय़ङ्कराः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तकारण्डवय़ुतां चक्रवाकोपशोभिताम् |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
मत्तद्विरदविक्रान्तं शालपोतमिवोद्गतम् ||
२८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९६
सञ्जय़ उवाच
मत्तद्विरदसङ्काशं मत्तद्विरदगामिनम् |
७ क
वन पर्व
अध्याय
२२९
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तभ्रमरजुष्टानि वर्हिणाभिरुतानि च |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१८
गान्धार्यु उवाच
मत्तमातङ्गदर्पाणां पश्यन्त्यद्य पृथग्जनाः ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तवर्हिणसङ्घुष्टं कोकिलैश्च सदामदैः ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तवर्हिणसङ्घुष्टं प्रविवेश महद्वनम् ||
२४ ग
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तवारणताम्राक्षो मत्तवारणवारणः ||
३१ ख
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तवारणविक्रान्तो मत्तवारणवेगवान् |
३१ क
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तवारणशार्दूलभुजगेन्द्रनिषेविताम् ||
२२ ख
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तवारणय़ूथानि पङ्कक्लिन्नानि भारत |
१९ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
मत्तस्येव गजेन्द्रस्य गतिमास्थाय़ सोऽव्रजत् ||
१० ख
आदि पर्व
अध्याय
४७
सूत उवाच
मत्ता इव च मातङ्गा महाकाय़ा महावलाः ||
२४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय
७
द्रौणिरु उवाच
मत्ता इव महानागा विनदन्तो मुहुर्मुहुः ||
३३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
मत्ता रुधिरगन्धेन वहवोऽत्र विचेतसः |
७३ क
विराट पर्व
अध्याय
३६
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तांश्च दश मातङ्गान्मुञ्च मां त्वं वृहन्नडे ||
४० ख
वन पर्व
अध्याय
१७९
वैशम्पाय़न उवाच
मत्ताः परिपतन्ति स्म दर्दुराश्चैव दर्पिताः ||
८ ख
मौसल पर्व
अध्याय
४
वैशम्पाय़न उवाच
मत्ताः परिपतन्ति स्म पोथय़न्तः परस्परम् ||
४० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
मत्तात्प्रमत्तात्पोगण्डादुन्मत्ताच्च विशेषतः |
२७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
६३
वैशम्पाय़न उवाच
मत्तानां वारणेन्द्राणां निवेशं च यथाविधि |
११ क