उद्योग पर्व
अध्याय
५०
धृतराष्ट्र उवाच
महेन्द्र इव वज्रेण दानवान्देवसत्तमः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
२७८
नारद उवाच
महेन्द्र इव शूरश्च वसुधेव क्षमान्वितः ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय
११७
वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्र उष्य तां रात्रिं प्रय़यौ दक्षिणामुखः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
शल्य उवाच
महेन्द्र दानवान्हत्वा लोकास्त्रातास्त्वय़ा विभो |
१६ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
महेन्द्रं चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम् |
१०४ क
वन पर्व
अध्याय
२५२
वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्रकल्पान्निरतान्स्वकर्मसु; स्थितान्समूहेष्वपि यक्षरक्षसाम् ||
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रकेतवः शुभ्रा महेन्द्रसदनेष्विव |
३१ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१८
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रकेतवः शुभ्रा महेन्द्रसदनेष्विव ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय
२०७
वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्रपर्वतं दृष्ट्वा तापसैरुपशोभितम् |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रप्रतिमं कार्ष्णिं छादय़ामास पत्रिभिः ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
महेन्द्रभवनाद्वीरः पारिजातमुपानय़त् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५०
जनमेजय़ उवाच
महेन्द्रमिव चादित्यैरभिगुप्तं महारथैः |
३ क
सभा पर्व
अध्याय
४९
दुर्योधन उवाच
महेन्द्रमिव देवेन्द्रं दिवि सप्तर्षय़ो यथा ||
१२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१५४
जनमेजय़ उवाच
महेन्द्रमिव शत्रूणां ध्वंसनं शरवृष्टिभिः ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७३
वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्रवज्रप्रतिमैराय़सैर्निशितैः शरैः ||
२९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
६५
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रवज्रप्रतिमैश्च साय़कै; र्महेन्द्रवृत्राविव सम्प्रजह्रतुः ||
७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रवज्राभिहतं महावनं; यथाद्रिशृङ्गं धरणीतले तथा ||
३८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५१
भीष्म उवाच
महेन्द्रवाणी त्रिदिवा नीलिका च सरस्वती ||
२२ ग
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रवाहप्रतिमो महात्मा; वज्राहतं शृङ्गमिवाचलस्य ||
५१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रविष्णुप्रतिमावनिन्दितौ; रथाश्वनागप्रवरप्रमाथिनौ |
४३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रशत्रवो येन हिरण्यपुरवासिनः |
१७ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्रसदनप्रख्यां प्रविवेश सभां ततः ||
३१ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्रसदने राजा तपसा दग्धकिल्विषः ||
९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्रसदृशः शौर्ये स्थैर्ये च हिमवानिव |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९६
कण्व उवाच
महेन्द्रसदृशीं चैव मातलिः प्रत्यपद्यत ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५५
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रसमवीर्येण वध्यमाना महाचमूः |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०२
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रसमवीर्येण वध्यमाना महाचमूः |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
६९
शकुन्तलो उवाच
महेन्द्रस्य कुवेरस्य यमस्य वरुणस्य च |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
२०३
नारद उवाच
महेन्द्रस्यापि नेत्राणां पार्श्वतः पृष्ठतोऽग्रतः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
महेन्द्रानुचरा ये च देवसद्मनिवासिनः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्राशनिनिर्दग्धः पादपोऽङ्कुरवानिव ||
३६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१७५
होत्रवाहन उवाच
महेन्द्रे वै गिरिश्रेष्ठे रामं नित्यमुपासते |
२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रेण यथा वृत्रो यथा रामेण रावणः |
५२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
महेन्द्रेणेव वीरेण पाल्यमानां किरीटिना ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
८५
वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्रो नाम कौरव्य भार्गवस्य महात्मनः ||
१६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
१०
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रो मलय़ः सह्यः शुक्तिमानृक्षवानपि |
१० क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
महेन्द्रो लोकपालेभ्यो लोकपालास्तु पुत्रक |
६६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२२
सञ्जय़ उवाच
महेन्द्रय़ानप्रतिमं रथं तु; सोपस्करं हाटकरत्नचित्रम् |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१०
भीष्म उवाच
महेश्वरः प्रसन्नात्मा चकार मनसा मतिम् ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
महेश्वरपदं गच्छेद्व्रह्मचारी समाहितः |
१०३ क
वन पर्व
अध्याय
८२
पुलस्त्य उवाच
महेश्वरपदे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ||
१०३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
महेश्वरप्रणीतश्च पुराणे निश्चय़ं गतः ||
८३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३७
श्रीभगवानु उवाच
महेश्वरप्रसादेन नैतद्वचनमन्यथा ||
४६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४
उपमन्युरु उवाच
महेश्वरभुजोत्सृष्टं निमेषार्धान्न संशय़ः ||
१२९ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
महेश्वरशरोद्धूतं पपात त्रिपुरं यथा ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
महेश्वरश्च भूतानां महतामीश्वरश्च सः ||
७४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४६
वासुदेव उवाच
महेश्वरश्च लोकानां महतामीश्वरश्च सः |
२९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
महेश्वरसमः क्रोधे भीमः प्रहरतां वरः ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२६
अङ्गिरा उवाच
महेश्वरस्य निष्ठाने यो नरस्त्वभिषिच्यते |
१४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
महेश्वरे त्वारुहति जानुभ्यामगमन्महीम् |
१११ क