शान्ति पर्व
अध्याय
२७४
भीष्म उवाच
मानुषेषु तु धर्मज्ञ ज्वरो नामैष विश्रुतः |
५४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषेषु न मे तात दृष्टपूर्वा न च श्रुता |
१० क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
मानुषेषु प्रय़ोक्ष्यामि विनास्त्रप्रतिघातनम् ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषेषु भवत्वेका जरारोगविवर्जिता ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषेषु मनुष्येन्द्र सम्भूता ये दिवौकसः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषेषु महाभागे न त्वेवान्येषु जन्तुषु |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
मानुषेषु महाराज धर्माधर्मौ प्रवर्ततः |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
१३
अर्जुन उवाच
मानुषेषु महावाहो प्रादुर्भूतोऽसि केशव ||
१८ ख
आदि पर्व
अध्याय
९३
शन्तनुरु उवाच
मानुषेषूदपद्यन्त तन्ममाचक्ष्व जाह्नवि ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१०
इन्द्र उवाच
मानुषेष्वथ वा गोषु नैतदल्पं भविष्यति ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
मानुषेष्वपि चान्येषु दृष्टपूर्वा न च श्रुता |
१३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११८
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषैः सह भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ||
२५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषैरपि गन्धर्वैर्मा युद्धे चेत आधिथाः ||
४९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६
वृहस्पतिरु उवाच
मानुषो नहुषो राजा देवर्षिगणतेजसा |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
१७०
मातलिरु उवाच
मानुषो मृत्युरेतेषां निर्दिष्टो व्रह्मणा पुरा ||
१२ ग
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषो वलवान्गन्धो घ्राणं तर्पय़तीव मे ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
मानुषौ जनय़ित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि ||
५२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३२
महेश्वर उवाच
मानुष्यं लभते चापि हीनाय़ुस्तत्र जाय़ते ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
मानुष्यं स्वर्गवासश्च तिर्यग्योनिश्च तत्त्रिधा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
मानुष्यमसुखं प्राप्य यः सज्जति स मुह्यति |
८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०२
भीष्म उवाच
मानुष्यस्तत्र सर्वाः स्म क्रिय़ास्तस्य महात्मनः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
मानुष्यान्निरय़स्थानमानन्त्यं प्रतिपद्यते ||
३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५३
वासुदेव उवाच
मानुष्ये वर्तमाने तु कृपणं याचिता मय़ा |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
माने दम्भे तथा स्नेहे सदृशास्ते कुटुम्विभिः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६९
भीष्म उवाच
मानेन च यथार्हेण सान्त्वेन विविधेन च ||
६० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२६
सञ्जय़ उवाच
मानेन दर्पेण च दह्यमानः; क्रोधेन दीप्यन्निव निःश्वसित्वा ||
४१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११९
नारद उवाच
मानेन भ्रष्टः स्वर्गस्ते नार्हस्त्वं पार्थिवात्मज |
७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
मानेन रक्ष्यते धान्यमश्वान्रक्षत्यनुक्रमः |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
मान्धातरेवं जानीहि राजा लोकस्य रक्षिता ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४
वैशम्पाय़न उवाच
मान्धाता चाम्वरीषश्च तथा राजन्विराजसे ||
३७ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
मान्धाता यत्र राजर्षिर्यत्र राजा भगीरथः |
२५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८०
भीष्म उवाच
मान्धाता यौवनाश्वश्च यय़ातिर्नहुषस्तथा |
५ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
युधिष्ठिर उवाच
मान्धाता राजशार्दूलस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
मान्धाता वै मुचुकुन्दश्च राजा; भूरिद्युम्नो नैषधः सोमकश्च ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
मान्धातारं यौवनाश्वं मृतं शुश्रुम सृञ्जय़ |
७४ क
वन पर्व
अध्याय
१२६
लोमश उवाच
मान्धातेति च नामास्य चक्रुः सेन्द्रा दिवौकसः ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
मान्धातेति ततस्तस्य नाम चक्रे शतक्रतुः ||
७७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
भीष्म उवाच
मान्धात्रा प्रकृतं प्रश्नं वृहस्पतिरभाषत ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
मान्धात्रे यौवनाश्वाय़ प्रीतिमानभ्यभाषत ||
१ ख
आदि पर्व
अध्याय
१८५
वैशम्पाय़न उवाच
मान्यः पुरोधा द्रुपदस्य राज्ञ; स्तस्मै प्रय़ोज्याभ्यधिकैव पूजा |
२१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७२
सञ्जय़ उवाच
मान्यमाचार्यतनय़ं रूक्षं कापुरुषो यथा ||
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
मान्यमाना न मन्यन्ते दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
मान्यानां तत्र वृद्धानां कृत्वा पादाभिवन्दनम् |
४० क
वन पर्व
अध्याय
२२२
वैशम्पाय़न उवाच
मान्यानां मानसत्कारा ये चान्ये विदिता मय़ा ||
३२ ग
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
मान्यान्मानय़िता जन्म कुले महति विन्दति |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२२
सञ्जय़ उवाच
मानय़ंस्तव पुत्रस्य वाल्यात्प्रभृति सौहृदम् |
६७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
मानय़न्तः सदा युक्ता विवर्धन्ते गणा नृप ||
२० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०५
नारद उवाच
मानय़न्ति च मां सर्वे त्रिदशा यज्ञसंस्तरे ||
१३ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
मानय़ित्वा मुहूर्तं च गुरुपुत्रं महाहवे ||
२६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
मापय़ामास कौरव्यो यज्ञवाटं यथाविधि ||
१२ ख