शान्ति पर्व
अध्याय
३०९
भीष्म उवाच
मासर्तुसञ्ज्ञापरिवर्तकेन; सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन |
९० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
मासादूर्ध्वं नरव्याघ्र नोपवासो विधीय़ते |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
मासानष्टौ पार्षतेन रौरवेण नवैव तु |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
३२
श्रीभगवानु उवाच
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८८
भीष्म उवाच
मासानेकादश प्रीतिः पितॄणां माहिषेण तु |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
मासार्धं च क्षय़ं सोमो नित्यमेव गमिष्यति |
६८ क
शल्य पर्व
अध्याय
३४
वैशम्पाय़न उवाच
मासार्धं च सदा वृद्धिं सत्यमेतद्वचो मम ||
६८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
मासार्धमासगणितं विषमं लोकसञ्चरम् |
५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३९
व्रह्मो उवाच
मासार्धमासवर्षाणि ऋतवः सन्धय़स्तथा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१७
वलिरु उवाच
मासार्धमासवेश्मानमहोरात्राभिसंवृतम् |
४६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११
शकुनिरु उवाच
मासार्धमासा ऋतव आदित्यशशितारकम् ||
१४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
मासार्धमासा ऋतवः सन्ध्ये संवत्सरश्च सः ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
मासार्धमासा ऋतवः सन्ध्ये संवत्सरश्च सः ||
६७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
मासार्धमासा ऋतवस्तथा रात्र्यहनी नृप ||
१३ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय
१५
कृष्ण उवाच
मासार्धमासा ऋतवो रात्र्यः संवत्सराः क्षणाः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२९
वासुदेव उवाच
मासार्धमासानथ नक्षत्रय़ोगा; नतन्द्रितश्चन्द्रमा अभ्युपैति |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९३
भीष्म उवाच
मासार्धमासौ नोपवसेद्यत्तपो मन्यते जनः |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
९२
अग्निरु उवाच
मासार्धे कृष्णपक्षस्य कुर्यान्निवपनानि वै |
१९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०९
अङ्गिरा उवाच
मासि मासि त्रिरात्राणि कृत्वा वर्षाणि द्वादश |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
मासि मासि समाय़ान्ति पुण्येन महतान्विताः ||
१६६ ग
वन पर्व
अध्याय
८१
पुलस्त्य उवाच
मासि मासि समाय़ान्ति संनिहित्यां न संशय़ः ||
१६९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
मासि मास्यश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
मासे च दशमे प्राप्ते तदा भरतसत्तम |
४९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
मासे चतुर्थे सम्प्राप्ते श्वापदः सम्प्रजाय़ते |
८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
मासे मासे समश्नंस्तु त्रिभिर्वर्षैः प्रमुच्यते ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०२
कण्व उवाच
मासेनान्येन सुमुखं भक्षय़िष्य इति प्रभो ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९५
वैशम्पाय़न उवाच
मासेनेति च तेनोक्तो धार्तराष्ट्रः सुदुर्मतिः |
४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४८
सञ्जय़ उवाच
मासेऽपतिष्यः पञ्चमे त्वं प्रकृच्छ्रे; न वा गर्भोऽप्यभविष्यः पृथाय़ाः |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
मासोपवासी मूलाशी फलाहारस्तथैव च ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११०
भीष्म उवाच
मासोपवासी वर्षैस्तु दशभिः स्वर्गमुत्तमम् |
१३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२७
व्यास उवाच
मासोर्मिणर्तुवेगेन पक्षोलपतृणेन च ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१६१
वैशम्पाय़न उवाच
मासोऽथ कृच्छ्रेण तदा व्यतीत; स्तस्मिन्नगे भारत भारतानाम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३१
कुन्त्यु उवाच
मास्तं गमस्त्वं कृपणो विश्रूय़स्व स्वकर्मणा |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
मास्माकं क्षत्रिय़कुले जन्म कश्चिदवाप्नुय़ात् |
२१ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
संवर्त उवाच
मास्मानेवं त्वं पुनरागाः कथं चि; द्वृहस्पतिं परिदातुं मरुत्ते |
१९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४९
सञ्जय़ उवाच
मास्मान्क्रूरैर्वाक्प्रतोदैस्तुद त्वं; भूय़ो राजन्कोपय़न्नल्पभाग्यान् ||
८७ ख
वन पर्व
अध्याय
२८५
सूर्य उवाच
मास्मै ते कुण्डले दद्या भिक्षवे वज्रपाणय़े ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८१
भीष्म उवाच
माहात्म्यं च गवां भूय़ः श्रूय़तां गदतो मम ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६४
सञ्जय़ उवाच
माहात्म्यं ते श्रुतं राजन्केशवस्य महात्मनः ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
माहात्म्यं देवकीमातस्तच्च ते रूपमैश्वरम् ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
गुरुरु उवाच
माहात्म्यं देवदेवस्य विष्णोरमिततेजसः |
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४४
वासुदेव उवाच
माहात्म्यं द्विजमुख्यस्य सर्वमाख्यातवांस्तदा ||
४९ ख
वन पर्व
अध्याय
१८२
वैशम्पाय़न उवाच
माहात्म्यं द्विजमुख्यानां श्रोतुमिच्छाम कथ्यताम् ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१०३
कण्व उवाच
माहात्म्यं यत्तदा विष्णोर्योऽय़ं चक्रगदाधरः ||
३५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३०
कुन्त्यु उवाच
माहात्म्यं वलमोजश्च नित्यमाशंसितं मय़ा ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७६
भीष्म उवाच
माहात्म्यं वलमौदार्यं तव कुन्त्यन्वय़ाचत ||
२३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
माहात्म्यं विजय़ं चैव भूय़ः प्राप्नुहि शाश्वतम् ||
३० ख
वन पर्व
अध्याय
१५०
वैशम्पाय़न उवाच
माहात्म्यमनुभावं च स्मरन्दाशरथेर्ययौ ||
१७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१
सूत उवाच
माहात्म्यमपि चास्तिक्यं सत्यता शौचमार्जवम् ||
१८१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७१
युधिष्ठिर उवाच
माहात्म्यमपि चैवोक्तमुद्देशेन गवां प्रभो ||
१ ख