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आदि पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
मा भैः प्राणभय़ाद्राजन्क्षमिणो व्राह्मणा वय़म् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ६३
वृहदश्व उवाच
मा भैरिति नलश्चोक्त्वा मध्यमग्नेः प्रविश्य तम् |
३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १८३
भीष्म उवाच
मा भैरिति समं सर्वे स्वस्ति तेऽस्त्विति चासकृत् ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय १६२
गन्धर्व उवाच
मा भैर्मनुजशार्दूल भद्रं चास्तु तवानघ ||
६ ग
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
मा भैष्ट दुःखेन कुजीवितेन; नूनं कृतं परलोकेषु पापम् |
४० क
वन पर्व
अध्याय १५४
वैशम्पाय़न उवाच
मा भैष्ट राक्षसान्मूढाद्गतिरस्य मय़ा हृता ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
मा भैष्टेति प्रतिश्रुत्य यय़ावभिमुखोऽर्जुनम् ||
५० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
मा भैष्टेत्यव्रवीत्कर्णो ह्यभितो मामितेति च ||
४१ ख
सभा पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
मा भैस्त्वं कुरुशार्दूल श्वा सिंहं हन्तुमर्हति |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ९
इन्द्र उवाच
मा भैस्त्वं क्षिप्रमेतद्वै कुरुष्व वचनं मम |
२७ क
विराट पर्व
अध्याय ३६
वैशम्पाय़न उवाच
मा भैस्त्वं राजपुत्राग्र्य क्षत्रिय़ोऽसि परन्तप |
४४ क
विराट पर्व
अध्याय ४१
वैशम्पाय़न उवाच
मा भैस्त्वं राजपुत्राग्र्य क्षत्रिय़ोऽसि परन्तप |
१० क
आदि पर्व
अध्याय १४०
भीम उवाच
मा भैस्त्वं विपुलश्रोणि नैष कश्चिन्मय़ि स्थिते |
७ क
वन पर्व
अध्याय १९०
वैशम्पाय़न उवाच
मा मण्डूकाञ्जिघांस त्वं कोपं सन्धारय़ाच्युत |
३४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३१
कुन्त्यु उवाच
मा मध्ये मा जघन्ये त्वं माधो भूस्तिष्ठ चोर्जितः ||
१२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
मा मा सुवीरकं कश्चिद्याचतां दय़ितो मम |
८८ क
आदि पर्व
अध्याय १८२
अर्जुन उवाच
मा मां नरेन्द्र त्वमधर्मभाजं; कृथा न धर्मो ह्ययमीप्सितोऽन्यैः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
मा मां परित्यजेत्यन्ये चुक्रुशुः पतिता रणे ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १७१
भीष्म उवाच
मा मां योजय़ लोभेन वृथा त्वं वित्तकामुक ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
मा मित्रध्रुक्पार्थिवानां जघन्यः; पापां कीर्तिं प्राप्स्यसे कौरवेन्द्र ||
४८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २९
व्राह्मण उवाच
मा मुञ्च वीर नाराचान्व्रूहि किं करवाणि ते ||
४ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
मा मे श्रिय़ा सङ्गमनं तय़ास्तु; यस्याः कृते भक्तजनं त्यजेय़म् ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
भीष्म उवाच
मा मे हार्षीर्हस्तिनं पुत्रमेनं; दुःखात्पुष्टं धृतराष्ट्राकृतज्ञ |
८ क
उद्योग पर्व
अध्याय १७९
भीष्म उवाच
मा मैवं पुत्र निर्वन्धं कुरु विप्रेण पार्थिव |
२४ क
वन पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
मा मैवमिति सक्रोधैर्भर्त्सय़द्भिः समन्ततः ||
१२ ग
द्रोण पर्व
अध्याय १४२
सञ्जय़ उवाच
मा युध्यस्व रणे वीर विशिष्टै रथिभिः सह |
१४ क
कर्ण पर्व
अध्याय १७
सञ्जय़ उवाच
मा योत्सीर्गुरुभिः सार्धं वलवद्भिश्च पाण्डव |
९४ क
वन पर्व
अध्याय १३१
श्येन उवाच
मा राजन्मार्गमाज्ञाय़ कदलीस्कन्धमारुह ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय १८७
युधिष्ठिर उवाच
मा राजन्विमना भूस्त्वं पाञ्चाल्य प्रीतिरस्तु ते |
८ क
आदि पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
मा रोदीस्तात मा मातर्मा स्वसस्त्वमिति व्रुवन् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय २५३
वैशम्पाय़न उवाच
मा वः प्रिय़ाय़ाः सुनसं सुलोचनं; चन्द्रप्रभाच्छं वदनं प्रसन्नम् |
२० क
उद्योग पर्व
अध्याय १२३
वैशम्पाय़न उवाच
मा वचो लघुवुद्धीनां समास्थास्त्वं परन्तप ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
मा वधीः कासि कस्यासि किं हिंससि सुतानिति |
४७ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
मा वधीरिति पार्थस्तं दय़ावानभ्यभाषत ||
५९ ग
शान्ति पर्व
अध्याय १३३
कापव्य उवाच
मा वधीस्त्वं स्त्रिय़ं भीरुं मा शिशुं मा तपस्विनम् |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय २९
वासुदेव उवाच
मा वनं छिन्धि सव्याघ्रं मा व्याघ्रान्नीनशो वनात् ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
मा वनं छिन्धि सव्याघ्रं मा व्याघ्रान्नीनशो वनात् ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
राजो उवाच
मा वा भूत्सहभोज्यं नौ मदीय़ं फलमाप्नुहि |
८२ क
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
मा वालानामशिष्टानामभिमंस्था मतिं प्रभो |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
मा विघ्नं मा च मे पापं मा च मे परिपन्थिनः |
५१ क
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
मा विचारय़ |
१०४ ग
शान्ति पर्व
अध्याय ३४
वैशम्पाय़न उवाच
मा विषादं कृथा राजन्क्षत्रधर्ममनुस्मर |
२ क
वन पर्व
अध्याय २४०
दानवा ऊचुः
मा विषादं नय़स्वास्मान्नैतत्त्वय़्युपपद्यते |
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
मा विषादे मनः पार्थ कृथाः कालो हि दुर्जय़ः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २६३
मार्कण्डेय़ उवाच
मा विषीद नरव्याघ्र नैष कश्चिन्मय़ि स्थिते |
३२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ९५
सञ्जय़ उवाच
मा वृकेणेव शार्दूलं घातय़ेम शिखण्डिना ||
१५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
दुर्योधन उवाच
मा वृथा गर्ज कौन्तेय़ शारदाभ्रमिवाजलम् |
४९ क
आदि पर्व
अध्याय २२१
वैशम्पाय़न उवाच
मा वै कुलविनाशाय़ स्नेहं कार्षीः सुतेषु नः |
१४ क
वन पर्व
अध्याय २८१
सावित्र्यु उवाच
मा वै द्वितीय़ं मा तृतीय़ं च वाञ्छे; तस्मात्सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय १८९
व्रह्मो उवाच
मा वो मर्त्यसकाशाद्वै भय़ं भवतु कर्हिचित् ||
५ ख