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द्रोण पर्व
अध्याय १६०
सञ्जय़ उवाच
मन्यसे यच्च कौन्तेय़मर्जुनं श्रान्तमाहवे |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५९
सञ्जय़ उवाच
मन्यसे यच्च मूढ त्वं न योत्स्यति जनार्दनः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३३
अर्जुन उवाच
मन्यसे यदि तच्छक्यं मय़ा द्रष्टुमिति प्रभो |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यसे वा सभामेतामानीतामेकवाससम् |
३४ क
सभा पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
मन्यसे स च ते राजन्सुमहान्वुद्धिविप्लवः ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११
द्रोण उवाच
मन्यस्व पाण्डवं ज्येष्ठमानीतं वशमात्मनः ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय ४९
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यामहे जितानाजौ परान्प्राप्तां च मेदिनीम् ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
मन्यामहे जितानाजौ परान्प्राप्तां च मेदिनीम् ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५०
युधिष्ठिर उवाच
मन्युं च मा कृथाः पार्थ यन्मय़ोक्तोऽसि दारुणम् ||
२७ ख
आदि पर्व
अध्याय १७१
पितर ऊचुः
मन्युजोऽग्निर्दहन्नापो लोका ह्यापोमय़ाः स्मृताः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३३
मातो उवाच
मन्युना दह्यमानेन पुरुषेण मनस्विना |
१३ क
वन पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
मन्युना हि समाविष्टाः पाण्डवास्तेऽमितौजसः |
२० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
मन्युनाविष्टदेहेन सृष्टाः कालान्तकोपमाः ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
मन्युपङ्कामनाधृष्यां नदीं तरति वुद्धिमान् ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
मन्युरभ्याविशत्तीव्रः स्मृत्वा तत्तद्धनञ्जय़म् ||
६ ख
आदि पर्व
अध्याय ५
सूत उवाच
मन्युर्हि हृदय़ं मेऽद्य प्रदहन्निव तिष्ठति |
२१ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
मन्युवीर्यवलोपेतं वलात्पर्यवरोपितम् |
७६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५१
धृतराष्ट्र उवाच
मन्युस्तस्य कथं शाम्येन्मन्दान्प्रति य उत्थितः ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
मन्युस्तस्य कथं शाम्येन्मन्दान्प्रति समुत्थितः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २५७
वैशम्पाय़न उवाच
मन्ये कालश्च वलवान्दैवं च विधिनिर्मितम् |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५
सञ्जय़ उवाच
मन्ये किं तु समर्थं यद्धितं तत्सम्प्रधार्यताम् ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १७१
युधिष्ठिर उवाच
मन्ये च धृतराष्ट्रस्य पुत्रानपि वशीकृतान् ||
१४ ख
विराट पर्व
अध्याय १५
द्रौपद्यु उवाच
मन्ये चाद्यैव सुव्यक्तं परलोकं गमिष्यति ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
मन्ये चाश्रय़वान्प्राप्तो न त्वं निर्गन्तुमर्हसि ||
१७ ख
वन पर्व
अध्याय ४८
धृतराष्ट्र उवाच
मन्ये तथा तद्भवितेति सूत; यथा क्षत्ता प्राह वचः पुरा माम् |
४१ क
वन पर्व
अध्याय १०
धृतराष्ट्र उवाच
मन्ये तद्विधिनाक्रम्य कारितोऽस्मीति वै मुने ||
१ ख
वन पर्व
अध्याय २५०
वैशम्पाय़न उवाच
मन्ये तु तेषां रथसत्तमानां; कालोऽभितः प्राप्त इहोपय़ातुम् ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय ४०
उत्तर उवाच
मन्ये त्वां क्लीववेषेण चरन्तं शूलपाणिनम् |
११ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६२
भीष्म उवाच
मन्ये त्वां राक्षसं क्रूरं तथा चासि तमोवृतः |
३१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
मन्ये दुर्योधनैश्वर्याद्विशिष्टमिति सत्तमाः ||
१९ ख
आदि पर्व
अध्याय ७३
वैशम्पाय़न उवाच
मन्ये दुश्चरितं तेऽस्ति यस्येय़ं निष्कृतिः कृता ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय ११५
पाण्डुरु उवाच
मन्ये ध्रुवं मय़ोक्ता सा वचो मे प्रतिपत्स्यते ||
८ ख
विराट पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
मन्ये न कालं क्रोधस्य पश्यन्ति पतय़स्तव |
३३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
मन्ये नु ध्याय़सि जनांस्तेनासि हरिणः कृशः ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय ६१
वैशम्पाय़न उवाच
मन्ये न्याय़्यं यदत्राहं तद्धि वक्ष्यामि कौरवाः ||
१९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५०
धृतराष्ट्र उवाच
मन्ये पर्याय़धर्मोऽय़ं कालस्यात्यन्तगामिनः |
५८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
मन्ये पृथा वेपमाना कृशा धमनिसन्तता |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १२२
मैत्रेय़ उवाच
मन्ये भवत्प्रसादोऽय़ं तद्धि कर्म स्वभावतः ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
मन्ये मन्युसमुद्धूताः पुत्राणां तव संय़ुगे |
३१ क
स्त्री पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
मन्ये लोकविनाशोऽय़ं कालपर्याय़चोदितः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६७
सञ्जय़ उवाच
मन्ये वज्रधरस्यैष निनादो भैरवस्वनः |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
मन्ये वरय़ितव्यास्ता इत्यहं धीमतां वर |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५
वैशम्पाय़न उवाच
मन्ये वहुगुणा भूमिस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५७
धृतराष्ट्र उवाच
मन्ये विद्वन्वासुदेवस्य तद्व; द्युद्धे लाभः कर्णहैडिम्वय़ोर्वै ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२३
उग्रसेन उवाच
मन्ये स गुणसम्पन्नो व्रूहि तन्मम पृच्छतः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय २३
युधिष्ठिर उवाच
मन्ये साक्षाद्दृष्टमहं नरेन्द्रं; दृष्ट्वैव त्वां सञ्जय़ प्रीतिय़ोगात् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
मन्ये स्वय़ंवरकृते लोकपालाः समागताः |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय ७०
वैशम्पाय़न उवाच
मन्येऽद्य माद्रीं धर्मज्ञां कल्याणीं सर्वथैव हि ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
भीष्म उवाच
मन्येऽनुध्याय़सि जनांस्तेनासि हरिणः कृशः ||
३७ ख
वन पर्व
अध्याय १९६
वैशम्पाय़न उवाच
मन्येऽहं गुरुवत्सर्वमेकपत्न्यस्तथा स्त्रिय़ः |
५ क