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वन पर्व
अध्याय २०७
अङ्गिरा उवाच
मां च देव कुरुष्वाग्ने प्रथमं पुत्रमञ्जसा ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
वैशम्पाय़न उवाच
मां च पश्य सुदुःखार्तां व्याधविद्धां मृगीमिव ||
१२ ख
वन पर्व
अध्याय १६८
अर्जुन उवाच
मां च भीराविशत्तीव्रा तस्मिन्विगतचेतसि |
१६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३६
श्रीभगवानु उवाच
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तिय़ोगेन सेवते |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
मां च लोला परित्यज्य त्वामगाद्विवुधाधिप ||
५८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६३
धृतराष्ट्र उवाच
मां च व्रुवाणं शुश्रूष कुरूणामर्थवादिनम् |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
मां च स्थितं नागवलस्य मध्ये; युय़ुत्ससे मन्द किमल्पवुद्धे ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६६
भीष्म उवाच
मां चादृष्ट्वा कदाचित्स न गच्छति गृहान्खगः ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
मां चापि पुण्डरीकाक्ष चपलाक्षः प्रिय़ो मम ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ३६
भीमसेन उवाच
मां चापि राजञ्जानन्ति आकुमारमिमाः प्रजाः |
२७ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३
सात्यकिरु उवाच
मां चापि विषहेत्को नु कश्च भीमं दुरासदम् ||
१६ ख
आदि पर्व
अध्याय ११६
माद्र्यु उवाच
मां चाभिगम्य क्षीणोऽय़ं कामाद्भरतसत्तमः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २२०
भीष्म उवाच
मां चेदभ्यागतः कालः सदाय़ुक्तमतन्द्रितम् |
६६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
मां चेदभ्यागतः कालो दानवेश्वरमूर्जितम् |
४० क
वन पर्व
अध्याय ६७
दमय़न्त्यु उवाच
मां चेदिच्छसि जीवन्तीं मातः सत्यं व्रवीमि ते |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४६
वासुदेव उवाच
मां चैव धृतराष्ट्रं च पूर्वमेव महाद्युते |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
मां चैव शक्ता निर्जेतुं किमु मर्त्याः सुदुर्वलाः ||
५२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय ३९
श्रीभगवानु उवाच
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चय़ान् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
वैशम्पाय़न उवाच
मां ततो भावय़िष्यध्वमेषा वो भावना मम ||
५८ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
मां तु निर्जित्य सङ्ग्रामे पालय़ेमां वसुन्धराम् ||
५८ ग
वन पर्व
अध्याय १७०
अर्जुन उवाच
मां तु संहृष्टमनसं क्षिप्रं मातलिरानय़त् |
६० क
वन पर्व
अध्याय २८
वैशम्पाय़न उवाच
मां ते वनगतां दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ||
३२ ख
वन पर्व
अध्याय २२
वासुदेव उवाच
मां दृष्ट्वा रथनीडस्थं गतासुमिव भारत ||
२६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६८
भीष्म उवाच
मां द्रोणं च कृपं चैव यथा संमन्यते भवान् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
मां ध्याति पुरुषव्याघ्रस्ततो मे तद्गतं मनः ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
मां पातय़तु वीभत्सुरेवं ते विजय़ो भवेत् ||
८१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६३
कुण्डधार उवाच
मां पूजय़ित्वा भावेन यदि त्वं दुःखमाप्नुय़ाः |
४४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
मां प्रविश्य भवन्तीह मुक्ता भक्तास्तु ये मम |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६४
भीष्म उवाच
मां भोः प्रक्षिप होत्रे त्वं गच्छ स्वर्गमतन्द्रितः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२
वैशम्पाय़न उवाच
मां यक्ष्यन्तीति शान्तात्मा यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
मां वा निय़ुङ्क्ष्व सौहार्दाद्योत्स्ये भीष्मेण पाण्डव |
२८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
मां वा वृणीष्व भद्रं ते मरुत्तं वा महीपतिम् |
१९ क
शल्य पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
मां वा शल्यो रणे हन्ता तं वाहं भद्रमस्तु वः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५७
दुर्योधन उवाच
मां वा हत्वा पाण्डुपुत्रा भोक्तारः पृथिवीमिमाम् ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८६
सञ्जय़ उवाच
मां वापि मन्यते युद्धे भारद्वाजस्य धीमतः ||
२२ ग
सभा पर्व
अध्याय ३०
वैशम्पाय़न उवाच
मां वाप्यभ्यनुजानीहि सहैभिरनुजैर्विभो |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
मां स भक्षय़ते यस्माद्भक्षय़िष्ये तमप्यहम् |
३४ क
स्त्री पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
मां हत्वा न हरेद्राज्यमिति चैतत्कृतं मय़ा ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय ११६
माद्र्यु उवाच
मां हि कामय़मानोऽय़ं राजा प्रेतवशं गतः ||
२८ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३१
श्रीभगवानु उवाच
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापय़ोनय़ः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
मांसं तु कौमुदं पक्षं वर्जितं पार्थ राजभिः |
६४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५७
भीष्म उवाच
मांसं मधु सुरा मत्स्या आसवं कृसरौदनम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५९
भीष्म उवाच
मांसं मूत्रपुरीषं च प्राश्य संस्कारमर्हति ||
७० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३६
सञ्जय़ उवाच
मांसकर्दमपङ्काश्च शोणितौघाः सुदारुणाः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
मांसपिण्डोपमोऽभूत्स मुखपादान्वितः खगः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १०७
वैशम्पाय़न उवाच
मांसपेश्यास्तदा राजन्क्रमशः कालपर्ययात् ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
मांसप्रकारान्विविधाञ्शाकानि विविधानि च |
१६ क
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
मांसभारपरिश्रान्ताः पानीय़ार्थं यदृच्छय़ा ||
२२ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
मांसभारानुपाजह्रुर्भक्त्या परमय़ा विभो ||
२३ ख
शल्य पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
मांसभारानुपादाय़ प्रय़युः शिविरं प्रति ||
३४ ख